ब्लॉगः हिन्दू राष्ट्र में रहने में कोई आपत्ति नहीं

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली

मैं एक भारतीय मुस्लिम की हैसियत से पूरे होश के साथ ये कहना चाहता हूँ कि अगर भारत एक हिन्दू राष्ट्र बन जाए तो मुझे आपत्ति नहीं.

लेकिन गोवा में 14-17 जून को हुए एक सम्मलेन में हिन्दू संगठनों ने जिस हिन्दू राष्ट्र की मांग की है और जिस हिन्दू राष्ट्र की आज कल्पना की जा रही है वो हिंदुत्ववादी राष्ट्र है. मैं एक हिन्दू राष्ट्र में रह सकता हूँ, हिंदुत्ववादी राष्ट्र में नहीं.

मैंने ये फैसला 1997 में आज़ादी की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर लिया था.

पवित्र शहर आयोध्या में विश्व हिन्दू परिषद् के एक युवा अधिकारी ने मुझसे अपने हिन्दू राष्ट्र की कल्पना शेयर की थी.

तेज़ होती हिन्दू राष्ट्र की मांग

उनकी नज़र में अगर मुसलमान और ईसाई अपने हिन्दू पूर्वजों को मानें और वैसा ही करें जैसा उनके पूर्वज करते थे तो वो भारत में रह सकते हैं.

उसके बाद से मैंने इस तरह के विचार को प्रकट करते हुए कई लोगों को सुना है- कभी पूर्वजों को पहचानने और कभी घर वापसी का तर्क देकर.

हिंदुत्ववादी विचारधारा के सत्ता पर काबिज़ होने के बाद से हिन्दू राष्ट्र की मांग बढ़ती जा रही है.

कोई कहता है 2021 तक ये काम पूरा हो जाएगा तो कोई और एलान करता है कि 2023 तक भारत एक हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा.

पता नहीं खुले ज़ेहन वाले मेरे हिन्दू दोस्त मुझे क्यों दिलासा देते हैं कि फ़िलहाल बीजेपी के सत्ता में रहने के बावजूद भारत एक हिंदुत्ववादी राष्ट्र नहीं बन सका है.

हिंदू भी हो जाएंगे दूसरे दर्ज़े के नागरिक

वो ये स्वीकार करते हैं कि ऐसी कोशिशें हो रही हैं, माहौल तैयार किया जा रहा है, लेकिन अभी ऐसा हुआ नहीं है.

मुझे लगता है कि मुझे दिलासा देने की बजाय वो खुद को इत्मीनान दिलाना चाहते हैं कि भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं बनेगा.

उन्हें डर है कि हिंदुत्ववादी राष्ट्र में कट्टरपंथी हिंदू राज करेंगे. उनका विरोध करने वाले हिन्दू भी, अल्पसंख्यकों की तरह, दूसरे दर्जे के शहरी बन कर रह जाएंगे.

मेरे 'सेक्युलर' हिन्दू दोस्त कहते हैं कि हिंदुत्व विचारधारा समाज को बांटने का काम करती है. ये विचारधारा 80 प्रतिशत हिन्दुओं को 14 प्रतिशत मुसलमानों से डराती है, उन्हें असुरक्षित महसूस कराती है.

उनका कहना है कि ये लिंचिंग या पीट-पीट कर मार देने को बढ़ावा देती है. हिंदुत्व का विकास सेकुलरिज़्म का हमेशा विरोध करके हुआ है.

तरह तरह की परिभाषा

मेरे कई हिन्दू दोस्त कहते हैं कि हिंदुत्व ने हिंदू धर्म का उसी तरह से अपहरण कर लिया है जैसे अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने इस्लाम का अपहरण किया हुआ है.

अब धर्म गुरुओं की बजाय वो बताते हैं कि आप अच्छे हिन्दू कैसे बन सकते हैं. अब हिन्दू धर्म की परिभाषा उनसे सुनने को मिलती है.

लेकिन मैं अपने युवा पाठकों को बताना चाहूंगा कि अपने देश में हमेशा से ऐसा नहीं था. मैं जब छोटा था तो हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल कभी-कभार हो जाया करता था.

'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के प्रसिद्ध संपादक स्वर्गीय गिरिलाल जैन ने इस शब्द के इस्तेमाल को बढ़ाना शुरू किया था.

ये बाबरी मस्जिद के गिराए जाने से कुछ समय पहले की बात है. आरएसएस का वजूद तो था, लेकिन राष्ट्रीय चेतना के मुख्यधारा में नहीं.

हिन्दू धर्म का योगदान

मैं उस समय हिन्दू धर्म को महसूस कर सकता था, हिन्दुओं के सभी त्यौहार में एक भारतीय की तरह हिस्सा लेकर एन्जॉय करता था.

मेरे एक धार्मिक और संस्कारी दोस्त दिनकर पाठक के घर में परिवार के एक सदस्य की तरह मैं समय बिताया करता था.

उनकी नानी इतनी धार्मिक थीं कि चमड़े के इस्तेमाल के कारण नलके का पानी नहीं पिया करती थीं. लेकिन धार्मिक होने के बावजूद कभी तंगनज़री का सबूत नहीं दिया था.

मैंने हिन्दू धर्म की कोख से तो जन्म नहीं लिया, इसकी गोद में परवान ज़रूर चढ़ा हूँ. मेरे विचारों को संवारने में हिन्दू धर्म का योगदान काफी रहा है.

सर्व धर्म समभाव

केंद्र में हिंदुत्व विचारधारा के सत्ता में आने से काफ़ी समय पहले मैं विदेश में रहता था. तब मैं हिन्दू और हिंदुस्तान की आलोचना करने वालों को आड़े हाथों लेता था.

अब भी जब कोई हिंदुत्व और हिन्दू धर्म का नाम एक सांस में लेता है तो मुझे हिन्दू धर्म के बचाव में आना पड़ता है. मैं मुस्लिम समाज में हिन्दू धर्म की वकालत करता हूँ.

दिलचस्प बात ये है कि मेरे ख़िलाफ़ कोई फ़तवा जारी नहीं करता. शायद उन्हें अंदाज़ा है कि मैं अपना ईमान बेच कर हिन्दू धर्म के पक्ष में नहीं आता.

हिन्दू दोस्त भी जानते हैं कि हिन्दू धर्म से मेरा प्यार गहरा है, इस धर्म के प्रति मेरा सम्मान सच्चा है.

हिन्दू धर्म के बारे में एक बात आज भी कही जाती है कि इसका सामान्य सिद्धांत 'सर्व धर्म सांभाव' है, जिसका मतलब है कि सभी धर्म (सत्य) एक दूसरे के समान या सामंजस्यपूर्ण हैं.

हिन्दू धर्म के दर्शनशास्त्र में 'जियो और जीने दो' के महत्व से किसी को इंकार नहीं.

मुझे हिन्दू धर्म को समझने के लिए या इसका आदर करने में किसी हिंदुत्व फ़िलोसोफ़ी की ज़रूरत नहीं.

हिन्दुइज़्म का असली चेहरा

वैसे भी हिंदुत्ववादियों के जन्म से पहले से भारत एक हिन्दू राष्ट्र नहीं तो हिन्दू समाज ज़रूर रहा है और मुझे इसमें कुछ आश्चर्य नहीं होता.

अगर हिन्दू आबादी का 80 प्रतिशत हैं तो उनकी ही चलेगी. हमारे और आपके रोकने न रोकने से क्या फ़र्क़ पड़ता है.

देश की आज़ादी के समय जैसे पाकिस्तान एक इस्लामी राष्ट्र बना, भारत के पास हिन्दू राष्ट्र बनने का विकल्प था.

लेकिन उस समय संविधान को बनाने वाले अधिकतर विलायत से पढ़ कर आये हिन्दू थे.

उन्होंने भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय विविधता को देखते हुए भारत को एक सेक्युलर राष्ट्र बनाया.

मेरे विचार में ये हिन्दू धर्म की एक बड़ी जीत थी. धर्म के नाम पर देश के विभाजन के बावजूद भारत को एक हिन्दू राष्ट्र न घोषित करना हिन्दू धर्म के आत्मविश्वास को जताता था. वो हिन्दुइज़्म का असली चेहरा था.

क्या हम पाकिस्तान की राह पर जा रहे हैं?

हिंदुत्ववाद भारत को, अनजाने में ही सही, पाकिस्तान की राह पर ले जाना चाहता है. ज़रा सोचिये क्या आप किसी ऐसे देश की तरफ़ अपने देश को जाने देंगे जहाँ सुन्नी बहुसंख्यक, शिया, हिन्दू और मसीही समुदायों पर आसानी से ज़ुल्म ढाता हो?

हिंदुत्ववादी राष्ट्र बनने से पहले ही गौरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों को पीट-पीट कर मारा जा रहा है. उस दिशा में जाना कितना सही होगा?

अगर नेपाल वाला हिन्दू राष्ट भारत में आये तो इसका स्वागत है. कुछ साल पहले तक नेपाल सरकारी तौर पर एक हिन्दू राष्ट्र था.

हिन्दू राष्ट्र के अंतर्गत वहां मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यक खुश थे. अब जब कि नेपाल एक सेक्युलर स्टेट बन चुका है. वहां दूसरे समुदायों के साथ कुछ मुस्लिम नागरिकों ने हिन्दू राष्ट्र की वापसी की मांग की है.

मुझे नेपाल जैसे हिन्दू राष्ट्र में रहने में कोई आपत्ति नहीं. मुझे शिवजी के ज़माने का हिन्दू राष्ट्र भी मंज़ूर है. उनके काल में मुस्लिम प्रजा सुखी थी.

मुझे लगता है कि हिन्दू राष्ट्र नहीं तो हम हिन्दू समाज में ज़रूर रह रहे हैं. भारत की अधिकतर रीति-रिवाज हिन्दू धर्म से जुड़े हैं.

भारत का अतीत हिन्दू धर्म से जुड़ा है, इसकी संस्कृति हिन्दू धर्म का एक अटूट हिस्सा है.

असली हिन्दू धर्म सेक्युलर है. हम ये सब पहले ही स्थापित कर चुके हैं. संविधान ने जड़ें पकड़ ली हैं. ऐसे में एक हिन्दू राष्ट्र की मांग रस्मी लगती है.

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