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अब तक का सबसे कांटे का राष्ट्रपति चुनाव
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 1969 में राष्ट्रपति चुनाव कराने की नौबत तब आई जब 3 मई को अचानक दिल का दौरा पड़ने से राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की मौत हो गई.
उप राष्ट्रपति वराह गिरी वैंकट गिरी कार्यवाहक राष्ट्पति बन गए. इंदिरा गाँधी चाहती थीं कि वो ही राष्ट्पति भी बने.
उधर इंदिरा का आर्थिक नीतियों से परेशान सिंडिकेट की मर्ज़ी थी कि इंदिरा को किसी भी हालत में राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनने की छूट न दी जाए.
उसके लिए इंदिरा को सरेआम अपमानित करने का ये अच्छा मौका था.
अपनी पसंद का राष्ट्रपति उम्मीवार चुनवा कर वो देश को ये भी बताना चाहते थे कि कांग्रेस में चलती किसकी है.
इंदिरा गांधी को पेशकश
राष्ट्रपति पद के कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा की पहली पसंद वित्त मंत्री मोरारजी देसाई थे.
लेकिन जब वो इस मद्दे पर बात करने मोरारजी देसाई के पास गए तो उन्होंने कहा, 'मुझे आप मंत्रिमंडल में ही रहने दीजिए, वर्ना ये औरत देश को कम्यूनिस्टों को बेच देगी.'
उधर जब इंदिरा को पता चला कि कांग्रेस कार्यसमिति गिरि की उम्मीदवारी का समर्थन नहीं करेगी तो उन्होंने जगजीवन राम को इस पद के लिए उतारने के बारे में विचार किया.
लेकिन इस दौरान पता चला कि जगजीवन राम के साथ कई विवाद जुड़े हुए थे. मसलन उन्होंने पिछले दस सालों से अपना टैक्स रिटर्न नहीं फ़ाइल किया था.
कामराज ने अपनी समझ में एक बहुत बड़ा मास्टर स्ट्रोक चलने की कोशिश की जब उन्होंने स्वयं इंदिरा गाँधी को राष्ट्रपति बनाने की पेशकश कर दी.
नीलम संजीव रेड्डी की उम्मीदवारी
लेकिन वो उनके झाँसे में नहीं आईं. तब कामराज और सिंडिकेट के दूसरे नेताओं ने इस पद के लिए नीलम संजीव रेड्डी को उम्मीदवार बनाने का फ़ैसला किया.
छप्पन वर्षीय रेड्डी उस समय लोकसभाध्यक्ष के पद पर काम कर रहे थे और 1960 और 1962 के बीच कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके थे.
वो इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल के सदस्य भी थे, लेकिन उन्होंने 1967 के चुनाव के बाद उन्हें अपने कैबिनेट में नहीं लिया था.
रेड्डी के नाम का ऐलान इंदिरा गांधी को बिल्कुल भी हज़म नहीं हुआ.
वो इससे परेशान हो गईं कि उन्होंने उप राष्ट्रपति वी वी गिरि के पास जा कर उन्हें इस पद के लिए लड़ने के लिए तैयार कर लिया.
सिंडिकेट के नेता
75 वर्षीय गिरि ने तब सार्वजनिक रूप से ऐलान कर दिया कि अगर कांग्रेस उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं भी बनाती तब भी वो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेंगे.
उधर इंदिरा गांधी ने ऐलान किया कि उनके दल के लोग इस चुनाव में अपनी 'अंतरात्मा की आवाज़' पर वोट करें.
चुनावी लड़ाई उस समय दिलचस्प हो गई जब सिंडिकेट के नेताओं ने रेड्डी को जितवाने के लिए दक्षिणपंथी जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी से संपर्क किया.
इंदिरा गांधी ने भी सभी मुख्यमंत्रियों से संपर्क कर गिरि को जिताने की अपील की. इनमें उन राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल थे, जहाँ उनकी पार्टी सत्ता में नहीं थी.
16 अगस्त को चुनाव होने के बाद 20 अगस्त, 1969 को वोटों की गिनती शुरू हुई. इंदिरा के बेटे राजीव गांधी का उस दिन जन्म दिन था.
कामराज कैंप
जब मतों की गिनती शुरू हुई तो कभी गिरी आगे होते तो कभी रेड्डी.
इंदिरा गांधी की नज़दीकी दोस्त पुपुल जयकर उनकी जीवनी में लिखती हैं, 'जब रेडियो पर मतगणना के ट्रेंड आ रहे थे तो मैं इंदिरा से मिलने उनके घर गई. पहले राउंड में गिरि की जीत नहीं हो पाई थी, इसलिए कामराज के कैंप में खुशियाँ मनाई जा रही थीं.
जब मैं वहाँ पहुंची तो इंदिरा 'बीथोवन' का संगीत सुन रही थीं. मैंने उनसे कहा कि दूसरे राउंड की मतगणना का मतलाब है गिरि की हार. वो मुस्करा कर बोलीं, इतना निराश मत हो पुपुल. मुक़ाबला कड़ा है, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूँ.'
पहले राउंड की समाप्ति पर किसी को बहुमत नहीं मिला, फिर दूसरी पसंद के वोटों की गिनती की गई. अंत में इंदिरा के उम्मीदवार वी वी गिरि ने कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को सिर्फ़ 14650 मतों के मामूली अंतर से हरा दिया.
कांग्रेस का बंटवारा
गिरि को इंदिरा के अलावा कम्यूनिस्टों, अकालियों, निर्दलियों और डीएमके का समर्थन भी मिला.
जो लोग समझते थे कि इंदिरा गांधी एक गूंगी गुड़िया साबित होंगी और उनके इशारों पर चलेंगी, वो ग़लत साबित हुए. इंदिरा उन सब पर भारी पड़ीं.
लेकिन इसके साथ ही कहानी का अंत नहीं हुआ. नवंबर, 1969 में कांग्रेस कार्य समिति की दो समानांतर बैठकें हुई.
एक पार्टी दफ़्तर पर और दूसरी प्रधानमंत्री निवास पर. अपने जन्म के 84 साल बाद पहली बार हुआ कि कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई थी.
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