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पहलू, अख़लाक़ को मारने में भीड़ क्यों नहीं डरती?
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
आम तौर पर अपराधी अपने अपराध को छिपाने के लिए कई तरीक़ों का इस्तेमाल करता है.
वो हत्या करने के लिए अँधेरा होने का इंतज़ार करता है, अपने शिकार को उस वक़्त दबोचता है जब कोई गवाह मौजूद न हो, हत्या के बाद हथियार को ग़ायब कर देता है और पूरी कोशिश करता है कि अपराध का कोई सबूत या निशान मौक़े पर बचा न रहे.
लेकिन उस अपराधी के दिमाग़ को कैसे समझा जाए जो अपने शिकार को दिन के खुले उजाले में घेरता है, चलती सड़क पर भीड़ के बीच में उसे पकड़ता है और हत्या करते वक़्त अपने साथियों से सबूत के तौर पर वीडियो तैयार करने को कहता है?
राजस्थान के अलवर शहर के पास एक अप्रैल को ट्रैफ़िक भरे हाइवे पर पहलू ख़ान को चारों ओर से घेर कर पीटे जाने का वीडियो ग़ौर से देखेंगे तो पाएँगे कि उसे पीटने वाले लड़के आम क़स्बाई लड़कों जैसे ही थे.
पहलू ख़ान का मामला
कुछ जींस-टी शर्ट में थे और कुछ पैंट क़मीज़ पहने हुए थे. वीडियो देखकर पूरे विश्वास से कहना मुश्किल है पर उनमें से ज़्यादातर निम्न मध्यमवर्ग के परिवारों के नौजवान नज़र आते हैं.
वो पहलू ख़ान को सड़क के बीच से खदेड़ते हुए, पीटते हुए हाइवे के फ़ुटपाथ पर लाते हैं. पूरे हंगामे में सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने हुए पहलू ख़ान फ़ुटपाथ पर बैठ जाते हैं जैसे शिकारी कुत्तों के बीच घिरा हुआ कोई मेमना हो.
हमलावर लड़कों के सिर पर ख़ून सवार है और वो जितना उन्हें पीटते हैं उनका ग़ुस्सा उतना ही बढ़ता जाता है. यहाँ तक कि पहलू ख़ान और उसके साथियों को पीट-पीट कर अधमरा कर देने के बावजूद उनके सिर से ख़ून नहीं उतरता.
दो हमलावर लड़के वहाँ खड़ी सफ़ेद रंग की एक गाड़ी के स्टील के बोनट को पूरी ताक़त लगाकर मोड़ देते हैं और जब अंदर से इंजन दिखने लगता है तो उनमें से एक भारी पत्थर उठाकर इंजन पर दे मारता है.
पवित्र कर्म?
वीडियो देखकर ये पता नहीं चलता कि उसके बाद मौक़ा-ए-वारदात पर क्या हुआ. पर बाद में ख़बरें छपती हैं कि पहलू ख़ान को पुलिस अस्पताल ले गई और उनके सीने और पेट में लगी गंभीर चोटों के कारण उनकी मौत हो गई.
जींस-टी शर्ट या क़मीज़-पैंट पहने उन लड़कों ने आख़िर कब ये तय किया कि वो गौमाता को क़साइयों के चंगुल से छुड़ाने के मिशन में शामिल होंगे और ज़रूरी हुआ तो इसके लिए वो हर सज़ा भुगतने को तैयार रहेंगे?
कौन-सा वो पहला मौक़ा था जब किसी ने उन्हें बताया कि गौ को बचाना और गौ को बचाने से ज़्यादा गायों की ख़रीद-फ़रोख़्त करने वालों को आतंकित करना, उन्हें सड़कों-चौराहों पर पीटना और उनकी हत्या कर देना एक पवित्र कर्म है?
किसने उन्हें बताया कि कौन उनका दुश्मन है और दुश्मन की पहचान कैसे की जाए? और कहाँ से उन्हें ये भरोसा मिला कि अगर वो पकड़े भी गए तो क़ानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा क्योंकि वो जो कुछ कर रहे हैं वो राष्ट्र-निर्माण और समाज-निर्माण की एक आवश्यक शर्त है?
दादरी कांड
पहलू ख़ान के हमलावरों को ये भरोसा ख़ुद से नहीं मिला बल्कि समाज के प्रतिष्ठित लोग उन्हें ये भरोसा दिलाते हैं.
सितंबर 2015 में दिल्ली के पास दादरी इलाक़े में अख़लाक़ नाम के अधेड़ को उनके घर से खींचकर निकालने और पीट-पीट कर हत्या कर डालने की घटना को देश के संस्कृति मंत्री महेश चंद्र शर्मा महज़ एक "दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना" बताते हैं. भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सदस्य तरुण विजय अपने लेखों में अख़लाक़ की हत्या के कारण और निवारण टाइप के लेख लिखते हैं.
पर देश भर में गौमाता को बचाने और राष्ट्र-निर्माण के लिए कुछ कर गुज़रने की 'शहीदी तमन्ना' पाल रहे लड़कों को असली संदेशा और भरोसा तब मिलता है जब अख़लाक़ की हत्या के एक अभियुक्त की बीमारी से जेल में मृत्यु हो जाती है और उसके शव को राष्ट्रध्वज तिरंगे में लपेट कर सार्वजनिक रूप से ऐसे रखा जाता है जैसे उसने देश की सीमाओं पर दुश्मन से लड़ते हुए शहादत हासिल कर ली हो.
हत्या के इस अभियुक्त के तिरंगे में लिपटे शव के सामने दोनों हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए संस्कृति मंत्री महेश चंद्र शर्मा की तस्वीर एक बार फिर टीवी चैनलों और अख़बारों के ज़रिए देश भर में पहुँचती है.
हत्यारी भीड़
प्रतीक में कहें तो पहलू ख़ान के हत्यारे टीवी पर प्रसारित इन तस्वीरों को देख रहे होते हैं. वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य' में छपे लेख को भी पढ़ रहे होते हैं जिसमें कहा जाता है, "वेद का आदेश है कि गौहत्या करने वाले पातकी के प्राण ले लो".
नोबेल पुरस्कार विजेता कॉरनेड लोरेंज़ ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'ऑन एग्रेशन' में हत्यारी भीड़ की मानसिकता और उसकी उग्रता के कारण समझने की कोशिश की है.
पाकिस्तान के विचारक परवेज़ हुदभॉय लोरेंज़ की इस किताब के हवाले से कहते हैं कि, ''अपने समुदाय की अस्मिता को बचाने का पवित्र ख़्याल मन में लिए जो लोग ऐसी हत्यारी भीड़ का हिस्सा बनते हैं वो ख़ुद को एक महान काम को अंजाम देने वाला मानते हैं. हत्या करने से पहले उनकी रीढ़ की हड्डी में एक सनसनी ऊपर से नीचे तक दौड़ जाती है. ऐसी हत्यारी भीड़ के सामने वो दुश्मन साक्षात मौजूद होता है जिसकी तस्वीर उनके अवचेतन में बरसों से धीरे-धीरे बनाई जाती है.''
आख़िर क्या कारण है कि अयोध्या के पास बजरंग दल के 'आत्मरक्षा शिविरों' में हथियार चलाने की ट्रेनिंग देते वक़्त राष्ट्रद्रोहियों को टोपी और दाढ़ी वाला ही दिखाया जाता है?
धर्म, राष्ट्र और समाज
'राष्ट्रद्रोही' की ऐसी तस्वीरें किसी पशुमेले से गायें ख़रीद कर ले जा रहे पहलू ख़ान के चेहरे से कितनी मिलती-जुलती हैं. वही सिर से चिपकी टोपी, वही मुसलमानों वाली दाढ़ी और ऊपर से टैम्पो में भरी हुई जीवित गायें.
ये वो क्षण होता है जब 'गोरक्षक' को धर्म, राष्ट्र और समाज के प्रति अपना कर्तव्य याद आ जाता है और राष्ट्रद्रोहियों को सबक़ सिखाने का मौक़ा सामने होता है और उसे किसी का भय नहीं होता.
सड़क चलते 'न्याय' करने वाली भीड़ आख़िर कैसे काम करती है, सत्ता और शासन कैसे उन्हें मदद करता है, कैसे सोशल मीडिया ऐसे विजिलांटी समूहों के लिए अफ़वाहों को सच मानने और सच को अफ़वाह में बदल देने का काम करता है — इस हफ़्ते इन्हीं सवालों पर बीबीसी हिन्दी विशेष रिपोर्टों और विश्लेषणों की श्रृंखला की शुरुआत कर रहा है. पढ़िएगा और अपनी राय भेजिएगा.
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