बिहार: जब नकल बना राजनीतिक हथियार

    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

बिहार इंटरमीडिएट के नतीजे अभी भी चर्चा में हैं. इस बार इंटर में करीब आठ लाख छात्र फेल रहे हैं.

बीते महीने 30 मई को नतीजे जारी करते हुए शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव आरके महाजन ने जोर देकर कहा था कि परीक्षा में नकल रोकने और पारदर्शी मूल्यांकन के कारण ऐसे परिणाम सामने आए हैं.

बिहार सरकार अभी भले ही नकल रोकने का दावा कर रही हो लेकिन इसी बिहार ने एक ऐसा भी दौर देखा था जब सरकारी संरक्षण में राजनीतिक हथियार के तौर पर परीक्षा में चोरी कराई गई.

जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान 1974-75 में ऐसा हुआ था. तब इंटर की परीक्षा विश्वविद्यालय स्तर पर होती थी.

दरअसल जय प्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन के लिए छात्रों से एक साल मांगा था. इसका एक मतलब परीक्षा का बहिष्कार भी था. तब के राजनीतिक हालात में बड़ी संख्या में छात्र इस आह्वान पर आंदोलन में कूद भी पड़े.

जेपी आंदोलन

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील मोदी भी तब बतौर छात्र नेता इस आंदोलन में शामिल हुए थे.

उस दौर के बारे में सुशील मोदी दावा करते हैं, "तब परीक्षा में पूरी छूट दी गई थी. सरकार ने नकल कराने का पूरा प्रयास किया. कुछ छात्रों ने इसका फायदा उठाते हुए खुलकर नकल की. आंदोलन को तोड़ने के लिए नकल के हथियार का इस्तेमाल हुआ."

माना जाता है कि नकल की छूट का मौका देने का फैसला राज्य सरकार का नहीं था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हर हाल में संपूर्ण क्रांति आंदोलन को असफल करवाना चाहती थीं.

क्या नकल के हथियार के इस्तेमाल का निर्देश प्रधानमंत्री कार्यालय से आया था?

इस सवाल पर सुशील मोदी ने दावे से कहा, "ऐसा तो कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन उस समय तो दिल्ली से ही सरकारें चलती थीं. उस समय जो भी रणनीति बन रही थी वह दिल्ली से ही बन रही थी."

कांग्रेस का इनकार

लेकिन वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के मेंबर श्याम सुंदर सिंह सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान सरकारी संरक्षण में नकल कराए जाने को सिरे से खारिज करते हैं.

उनका कहना है, "ये सही है कि जेपी के आह्वान पर शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की उपस्थिति कम हुई थी लेकिन सरकार ने नकल करने की छूट नहीं दी थी."श्याम सुंदर सिंह यह भी दावा करते है कि साठ के दशक में गैर-कांग्रेसी सरकारों के पहले दौर में बिहार में नकल की शुरुआत हुई थी और कांग्रेस ने हमेशा नकल रोकी है.

जय प्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान ही छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गठन किया था. चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी भी आंदोलन के दौरान इससे जुड़े और अस्सी के दशक में वाहिनी के बिहार संयोजक भी रहे.

तब जिस अंदाज में परीक्षा हो रही थी, उसके बारे में वे बताते हैं, "छात्रों और छात्रों के बदले पर्चे लिखने वालों को पुलिस जीप में परीक्षा केंद्र पर सुरक्षा देकर लाया जाता था. उनको नकल करने के लिए कॉपी-किताबें दी जाती थीं. यहां तक कि कॉपियां घर पर लिखने और फिर वापस जमा करने तक की छूट थी."

आंदोलन पर असर?

ऐसे में उन मेधावी छात्रों की मांग बढ़ गई थी जो अच्छे से नकल कराने में मदद कर सकते थे. वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद बताते हैं कि ऐसे कई छात्र बाद के दौर में प्रोफेसर, डॉक्टर भी बने.

उन्होंने कहा, "हालांकि इसका एक फायदा 'महिला सशक्तिकरण' के रूप में भी दिखा. मौके का फायदा उठाकर बड़ी सख्या में उम्रदराज लोग जिनमें महिलाओं की तादाद ज्यादा थी, परीक्षाओं में शामिल हुए. कई ने उम्र घटाकर परीक्षा दी. इनमें से कई को ऐसी डिग्री के बाद नौकरियां भी मिलीं."

सुरूर अहमद कहते हैं, "यह एक अजीबो-गरीब सामाजिक घटना थी. 'बड़े लोग' बड़े पैमाने पर परीक्षा देने लगे. अपने पति, रिश्तेदार और बच्चों की मदद से महिलाओं ने परीक्षा दी."

हालांकि जेपी आंदोलन में शामिल रहे लोगों का कहना है कि इस कथित 'सरकारी छूट' का आंदोलन पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ा.

अशोक प्रियदर्शी बताते हैं, "गोली चलाने से लेकर नकल कराने तक सरकार के जितने भी हथकंडे थे, उनका आंदोलन पर नकारात्मक असर नहीं पड़ा."

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े उदय सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के गवाह रहे हैं. वे भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि उस आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए तब सरकारी संरक्षण में नकल कराई गई.

लेकिन वे साथ में ये भी जोड़ते हैं, "ऐसा नहीं की परीक्षा में नकल सिर्फ उस दौर में ही हुई. ज्यादातर सरकारें इसे रोकने को लेकर उदासीन ही रही हैं. यहां तक कि आज भी विश्वविद्यालय स्तरीय परीक्षाओं में नकल की खबरें मीडिया में अक्सर आती रहती है."

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