#UnseenKashmir: कश्मीरी किससे ‘आज़ादी' चाहते हैं?

प्यारी दुआ
कैसी हो तुम और तुम्हारा परिवार कैसा है?
अपने पिछले ख़त में तुमने मुझसे सवाल पूछा था की हमारा स्कूल हमें पिकनिक पर कहां ले जाता है.
इस साल हमारा स्कूल हमें मानेसर ले गया था जो कि दिल्ली से बाहर एक गांव जैसा इलाका है.
मानेसर में हम एक रिज़ॉर्ट में रुके थे. हमने वहां पर ट्रैक्टर की सवारी की और गांव की ज़िंदगी के बारे में जाना.
जब मैंने तुमसे अपने पिछले पत्र में ये सवाल पूछा था कि तुम भारत के किसी और शहर में पढ़ना चाहोगी तो तुम्हारा जवाब सुन कर मुझे हैरानी नहीं हुई क्योंकि जिस तरह का बर्ताव कश्मीरियों के साथ होता है, मैं भी उसे थोड़ा-बहुत जानती हूं.
काश हम बच्चों को इस तरह के बर्ताव से हमारा समाज बचा पाता.
जिस तरह से अमानवीय बर्ताव हमारे समाज में चारों तरफ़ हो रहा है वो सिर्फ़ कश्मीरियों के लिए नहीं बल्कि हर दूसरे या अनजान इलाके के लोगों के साथ हो रहा है.
रैगिंग भी उसी का एक्सप्रेशन है.

इमेज स्रोत, बीबीसी
मैंने तुम्हारी भेजी हुई सोनमर्ग की तस्वीरें देखीं. उन्हें देखकर मेरा मन कर रहा है कश्मीर आने का.
जब मैंने अख़बार में यह पढ़ा कि एक व्यक्ति को कश्मीर में 'मानव ढाल' की तरह इस्तेमाल किया गया तो मुझे बहुत दुख हुआ.
इस तरह की घटनाएं अमानवीय गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं.
कभी-कभी मैं सोचती हूं कि क्या हम लोग अपने समाज से ये सब ख़त्म नहीं कर सकते? और ऐसा कर दें कि दुनिया के किसी कोने में आने-जाने पर कोई पाबंदी ना हो.
कभी-कभी अख़बार से पता चलता है कि कश्मीरी आज़ादी चाहते हैं. मैं जानना चाहती हूं कि वो किससे आज़ादी चाहते हैं और कश्मीर का विकास अभी तक क्यों नहीं हो पाया है?

तुम्हारे ख़त से यह भी पता चला कि कश्मीर में स्कूल छह-सात महीनों के लिए बंद हो जाते हैं.
तो मुझे लगता है कि बच्चों के लिए समय बिताना बहुत मुश्किल होता होगा और वहां जिस तरह का डर का माहौल बना हुआ है, बच्चों का पूरा विकास हो ही नहीं पाता होगा.
मैं इस बारे में तुम्हारी राय जानना चाहूंगी. क्या तुम इस माहौल से ऊब नहीं गई हो?
आखिर में मैं इस उम्मीद के साथ अपना ख़त ख़त्म करूंगी कि कभी तो ऐसा समय आएगा जब कोई भी कहीं जाकर रह सकेगा और किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. सभी आपस में प्यार से रह सकेंगे.

तुम्हारे जवाब के इंतज़ार में
तुम्हारी दोस्त
सौम्या
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क्या आपने कभी सोचा है कि दशकों से तनाव और हिंसा का केंद्र रही कश्मीर घाटी में बड़ी हो रही लड़कियों और बाक़ी भारत में रहनेवाली लड़कियों की ज़िंदगी कितनी एक जैसी और कितनी अलग होगी?
यही समझने के लिए हमने वादी में रह रही दुआ और दिल्ली में रह रही सौम्या को एक-दूसरे से ख़त लिखने को कहा. सौम्या और दुआ कभी एक दूसरे से नहीं मिले.
उन्होंने एक-दूसरे की ज़िंदगी को पिछले डेढ़ महीने में इन ख़तों से ही जाना.
(ख़तों की यह विशेष कड़ी इस हफ़्ते जारी रहेगी)
(रिपोर्टर/प्रोड्यूसर: बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य)
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