20 साल बाद आया अरुंधति रॉय का दूसरा उपन्यास

    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"दुनिया के जिस हिस्से में हम रहते हैं वहां सामान्य हालत बने रहना बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक उबला हुआ अंडा. जिसका ऊपरी कठोर हिस्सा उसके पीले हिस्से में होने वाले हलचल को दुनिया से छुपाकर रखता है."

ये शब्द हैं बुकर विजेता लेखिका अरुंधति रॉय की नई किताब 'द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस' के. यह बीस साल बाद आया उनका दूसरा उपन्यास है.

अरुंधति के इस उपन्यास का मंगलवार को विमोचन होने जा रहा है और यह तीस देशों में छपेगा. यह भारत के बारे में एक विलक्षण और महत्वाकांक्षी किताब है.

यह किताब समाज में हाशिए के लोगों- 'पागल आत्माएं और बुरे लोगों' के बारे में है. और उनके बारे में भी जो एक अन्यायपूर्ण समाज की कगार पर हैं. एक ट्रांस महिला जो एक धार्मिक दंगे से जान बचाकर क़ब्र को घर बना लेती है, इस कहानी के केंद्र में है.

यह उपन्यास खोने और प्यार को लेकर बेक़रार कर देने वाला उपन्यास है जो कहीं-कहीं उत्तेजक और मज़ेदार हो जाता है.

वो दुख और पीड़ा के राजनीतिक-सामाजिक सरोकार से लेकर इसके 'अंतरराष्ट्रीय सुपरबाज़ार' तक की चर्चा करती हैं.

वो कश्मीर के संघर्ष पर भी लिखती हैं. वो इसे एक ऐसी जंग बताती हैं जो न कभी हारी जा सकती है और न कभी जीती जा सकती है. इसका कोई अंत नहीं है यहां 'मरना मानो ज़िंदगी जीने का दूसरा तरीका' हो.

उनके उपन्यास के पात्र हैं- एक प्यार करने वाला इंटेलीजेंस अफसर, उसकी बीवी और उसकी किशोरवय बेटी.

फ़िक्शन पर नॉन फ़िक्शन की भारी चादर है, जिसे आलोचकों ने नापसंद किया है और ये सवाल उठाया है कि ये किताब सच में फ़िक्शन है या अरुंधति के पसंदीदा विषयों- परमाणु बम, बड़े बांध, कश्मीर विवाद और पूंजीवाद पर कोई विस्तृत एकतरफ़ा निबंध है? या यह लाखों विद्रोहों वाले एक देश पर लिखा गया एक गल्प उपन्यास है, जो महत्वाकांक्षाओ के पर कतरता है और निराशा पैदा करता है?

अरुंधति का दावा है कि फ़िक्शन को कुछ सच ज़रूरी जानकारी मुहैया कराते हैं और लिखने वाले उस समाज के बारे में ही लिखते हैं, जिसमें वे रहते हैं. बीते दो दशकों में उन्होंने आठ नॉन-फिक्शन किताबें लिखीं और निबंध भी अलग-अलग विषयों पर लिखे. मसलन परमाणु बम, कश्मीर, बड़े बांध और वैश्वीकरण से लेकर दलित नायक बीआर अंबेडकर, माओवादी विद्रोहियों से अपनी मुलाकातें, एडवर्ड स्नोडेन और एक्टर जॉन क्यूसैक से बातचीत तक.

अरुंधति ने 'बीबीसी रेडियो 4' से बात करते हुए हाल ही में कहा, 'मैं फ़िक्शन के साथ जो करती हूं और नॉन फिक्शन के साथ जो करती हूं, उनमें बड़ा अंतर है.'

वह कहती हैं, '(बीते 20 साल की) इस यात्रा में मुझमें बहुत कुछ जमा होने लगा था, जिसे मैं नॉन फिक्शन में नहीं लिख सकती थी. अगर कश्मीर की बात करें तो वहां मार दिए गए, टॉर्चर किए गए और सलाखों के पीछे क़ैद लोगों की कहानियों को मानव अधिकार रिपोर्टों के ज़रिये समझाना संभव नहीं है. '

'फ़िजा में आतंक घोल देने का क्या मतलब है, 20 साल तक सेना के अधीन रहने वाले लोगों के लिए इसका क्या मतलब है, यह आपकी सेल्युलर संरचना के साथ क्या करता है? असल में फ़िक्शन ही यहां पर सत्य है.'

मिली-जुली प्रतिक्रियाएं

अरुंधति के नए उपन्यास पर मिली जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं.

'फ़ाइनेंशियल टाइम्स' ने अरुंधति को 'यादगार बेलबूटों और ग़िरफ़्त में लेने वाले ब्यौरों की स्वामिनी' बताते हुए लिखा कि यह उपन्यास भी उनके पहले उपन्यास जैसा असाधारण है.

'टाइम' मैगज़ीन ने इसे 'बड़े पैमाने पर द्वंद्व का एक उपन्यास' कहा है, जिसमें निजी और राजनीतिक तजुर्बों का अच्छा मेल है और जो 20 साल तक इंतज़ार किए जाने के क़ाबिल है.

'द न्यू यॉर्कर' ने भी 'भारत के आधुनिक इतिहास पर छाप छोड़ने वाले' उपन्यास के लिए अरुंधति की तारीफ़ की और लिखा कि किताब में हिंसा के दृश्य रुश्दी के मिडनाइट्स चिल्ड्रेन और मार्ख़ेज़ के वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड के कुछ हिस्सों का भ्रम पैदा करते हैं.

बाकियों ने अतिरिक्त सावधानी से इस पर लिखा है.

'द गार्जियन' ने कहा कि 'बिखरे हुए विस्तृत नैरेटिव' में टकराते उपकथानक और मनमौजी विषयांतर की वजह से यह बोझिल होने लगता है. कभी-कभी यह विस्तृत या अलंकृत गद्य में तब्दील होने लगता है और पहले उपन्यास के मुक़ाबले कम सुसंस्कृत लगता है.

'द आयरिश टाइम्स' ने इसे बुरा और सतही, लेकिन अच्छे स्वभाव का उपन्यास बताया है. 'द इकोनॉमिस्ट' ने कहा है कि यह एक लंबी और विकेंद्रित किताब है, जिसे एक मजबूत संपादकीय मदद की ज़रूरत थी.

'द स्पेक्टेटर' को कुछ हिस्सों में उपन्यास शानदार लगा, लेकिन कई बार वह 'नाराज़ और भावुकता में रोने वाले' उपन्यास में तब्दील हो गया.

'हफ़िंगटन पोस्ट इंडिया' ने उपन्यास को चिड़चिड़ेपन की हद तक भटकाने वाला और दर्ज किए जान के लिहाज़ से हैरत की हद तक असमान बताया है.

अरुंधति ने हमेशा एक अपरंपरागत ज़िंदगी जी. 16 की उम्र में घर छोड़ दिया, दिल्ली के एक आर्किटेक्चर स्कूल में पढ़ाई की, गोवा के समुद्री तटों पर केक बेचा, एरोबिक्स सिखाया, एक इंडी फिल्म में काम भी किया और अपना पहला उपन्यास लिखने से पहले पांच साल तक पटकथाएं लिखीं.

'टाइगर वुड सरीखा पदार्पण'

20 साल पहले उनका पहला उपन्यास 'द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स' छपा था जो उनके पारिवारिक बचपन से प्रभावित एक दिलचस्प कहानी है. उसे मैन बुकर पुरस्कार मिला था. अमरीकी लेखक जॉन अपडाइक ने इसे 'टाइगर वुड सरीखा' पदार्पण कहा था और 37 की उम्र में अरुंधति सेलेब्रिटी लेखिका बन गई थीं.

उन्होंने एक बार मज़ाक में कहा था, 'मैं बुकर पुरस्कार जीतने वाली पहली एरोबिक्स इंस्ट्रक्टर थी.'

तब से इस किताब की 40 से ज़्यादा भाषाओं में 80 लाख प्रतियां बिक चुकी हैं, जिसकी रॉयल्टी से वह दक्षिण दिल्ली के एक शांत और पॉश इलाक़े में रह रही हैं.

अरुंधति कह चुकी हैं कि उन्हें नाम कमाने की परवाह नहीं है. पिछले साल 'वोग' मैगज़ीन के कवर पर उनकी तस्वीर छपी क्योंकि मैगज़ीन में 'अश्वेत महिलाओं' को प्रमुखता से छापे जाने को उन्होंने पसंद किया था.

वह कहती हैं, 'मैं दुनिया को ये बताना चाहती थी कि डरावने पके बालों के पीछे एक आकर्षक और काले बालों वाली इच्छाओं की एक 22 वर्षीय वस्तु है जो बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रही है.'

नफ़रत और प्यार

अपने घर हिंदुस्तान में अरुंधति को प्यार और नफ़रत दोनों बराबर मात्रा में मिलती है. लोगों ने उनके पुतले जलाए हैं, उनके पुस्तक विमोचन को बाधित किया है. उन पर देशद्रोह के आरोप लगे हैं और बड़े बांधों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने पर अदालत की अवमानना के लिए उन्हें एक दिन के लिए जेल भी जाना पड़ा है.

उनके आलोचक उनके ज़्यादातर नॉन फिक्शन लेखन को चुभन वाला, कच्चा, ख़ुद के लिए आसक्त और सरलीकृत बताते हैं. एक आलोचक ने लिखा कि अपने निबंधों में अरुंधति कभी सबूत नहीं दे पातीं.

अंबेडकर और गांधी पर एक किताब की विवादित प्रस्तावना से उनका गांधी के जीवनी लेखक और इतिहासकार रामचंद्र गुहा से विवाद हो गया था. उनका कहना था कि अरुंधति ने गांधी को संदर्भ से हटकर इस्तेमाल किया ताकि वो उन्हें धीमी चाल वाले प्रतिक्रियावादी के तौर पर पेश कर सकें.

लेखक आतिश तसीर ने 2001 में लिखा कि अरुंधति ग़रीबों को हमेशा के लिए एक ख़ूबसूरत और स्थायी ग़रीबी वाले राज्य में धकेल देना चाहती हैं.

'धुएं को आकार देना'

अरुंधति अकसर लिखने की तुलना धुएं को आकार देने से करती हैं. पहले आप इसे पैदा करते हैं, फिर इसे लिखते हैं. उन्होंने 'द हिंदू' से कहा था कि उन्होंने दिन में कुछ घंटों के साथ 'द मिनिस्ट्री' लिखना शुरू किया था और जब धुआं उठता था तो वह थक चुकी होती थीं और तीन वाक्य लिखकर सो जाती थीं. इसलिए बाद में उन्हें कई घंटों तक काम करना पड़ता था.

उन्होंने इंटरव्यू लेने वाले से बात करते हुए इस कहानी को एक शहर या इमारत के नक्शे की तरह और लेखन को एक स्वाभाविक लय बताया था. और जब उन्होंने किताब पूरी की, उन्होंने अपने साहित्यिक एजेंट को बताया कि उन्हें इस किताब का प्रकाशक चुनने से पहले किताब के किरदारों से सलाह-मशविरा करना पड़ा.

उन्होंने 'द गार्जियन' से कहा, 'सबको लगता है कि मुझे अकेले रहना पसंद है, लेकिन ऐसा नहीं है. मेरे किरदार मेरे साथ रहते हैं.'

अब हम देखेंगे कि वंचितों के लिए अरुंधति के इस मर्सिये के किरदार, लोगों के ज़ेहन में भी जगह बना पाते हैं या नहीं.

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