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EXCLUSIVE: हम पर आरएसएस का कोई दबाव नहीं: प्रकाश जावड़ेकर
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भाजपा के वरिष्ठ नेता और मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस बात से इनकार किया है कि उनके मंत्रालय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दबाव है.
उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि जब उन्होंने 'विवादों में रहे एचआरडी मंत्रालय का ज़िम्मा संभाला, तब उन्हें 'समस्याओं की जानकारी थी और उन्होंने संवाद के ज़रिए इसे दूर किया.'
बीबीसी हिंदी से हुई बातचीत में प्रकाश जावड़ेकर ने ऐसे तमाम सवालों का जवाब दिया जिन पर पिछले कुछ वर्षों से बहस छिड़ी हुई है और नरेंद्र मोदी सरकर की आलोचना भी हुई है.
बीबीसी के सवालों पर जावड़ेकर के जवाब...
सवाल: आप कई दफ़ा कह चुके हैं कि सतत विकास के लिए उच्च शिक्षा में रिसर्च सबसे अहम है. लेकिन दूसरी तरफ़ आप जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) जैसी टॉप यूनिवर्सिटी में एमफ़िल/पीएचडी की सीटों में कटौती के यूजीसी के फ़ैसले को भी सही ठहराते है. क्यों? इसमें विरोधाभास नहीं है क्या?
जवाब: नहीं, कटौती बिलकुल नहीं हुई है. जेएनयू का मामला अलग था, जिसे ठीक किया गया है. देश के 800 विश्वविद्यालय यूजीसी नियमों का वर्षों से पालन करते रहे हैं. सिर्फ़ जेएनयू में नहीं हो रहा था.
दुनिया भर में कहीं भी देख लीजिए, एक अध्यापक दो या तीन से ज़्यादा पीएचडी छात्रों को गाइड नहीं करते. हमारे यहां प्राध्यापक को आठ छात्रों तक गाइड करने की इजाज़त दी गई. लेकिन आप मानेंगे नहीं, मेरे पास लिस्ट है जिसे मैं दिखाना नहीं चाहता, जेएनयू में एक-एक अध्यापक के पास 15, 17, 20 और 25 स्टूडेंट भी रिसर्च कर रहे थे.
पीएचडी ऐसे तो नहीं होती.
हमने नियम की बात की है और कोर्ट ने कहा ये सही है. दुर्भाग्य से जेएनयू जैसे प्रगतिशील विश्वविद्यालय में शेड्यूल कास्ट, शेड्यूल ट्राइब और दिव्यांगों की भर्तियां नहीं हुई और रिक्तियां बनी रहीं.
सवाल ये पूछना चाहिए कि इन्हें खाली क्यों रखा गया. अब हम रिक्तियां पूरी कर रहे हैं और दिसंबर तक रिसर्च सीटें बढ़ भी जाएंगी.
सवाल: भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर भारत के शैक्षणिक संस्थानों पर एक तरह से हावी होने का आरोप भी लगा. सिलेबस में बदलाव, वाइस चांसलरों की नियुक्ति, ICSSR जैसे संस्थानों के प्रमुखों की नियुक्ति के मामलों पर आलोचना भी हुई. क्या एक पैटर्न सा नहीं दिखता? कोई एजेंडा है क्या?
जवाब: ये गलत आरोप है. हमने कोई पाठ्यक्रम नहीं बदला. वैसे भी यूनिवर्सिटी का सिलेबस बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़ में तय होता है.
हम तो उनसे कह रहे हैं कि हर साल प्रासंगिक सिलेबस तय करो, लेकिन फ़ैसला उनका ही होगा.
हमारी पहल तो ये है कि एआईसीटीई इंजीनियरिंग का मॉडल अभ्यास क्रम हम हर साल घोषित करेंगे, जिससे दुनिया में जो नया हो रहा हो उसे शामिल करते रहें.
लेकिन विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में हम दखल बिलकुल नहीं देते. हमारा कोई एजेंडा नहीं है. शिक्षा का कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं हो सकता. ये सबका एजेंडा है, क्योंकि 70 करोड़ लोग इससे सीधे तौर पर जुड़े हैं.
सवाल: तो क्या वजह है कि पिछले तीन वर्षों में मानव संसाधन मंत्रालय अभी तक एक नेशनल एजुकेशन पॉलिसी नहीं ला पाई है? इस पॉलिसी का फ़ोकस क्या होगा?
जवाब: दो से तीन दिन में नई कमिटी आएगी और काम शुरू करेगी. ये प्रक्रिया दुनिया के सबसे बड़े कन्सल्टेशन प्रॉसेस की रही है.
रहा सवाल फ़ोकस का, तो सामाजिक न्याय, गुणवत्ता में सुधार, बराबरी और जवाबदेही. हमारी कोशिश रहेगी कि गरीब शिक्षा से वंचित न रहें.
सवाल: एक आम धारणा बनती जा रही है कि मौजूदा सरकार शायद इतिहास को नए सिरे से इंटरप्रेट करने की इच्छुक है? क्या ये सही नहीं है और अगर है, तो मौजूदा सिलेबस में कमी क्या है?
जवाब: हमने कुछ बदला ही नहीं. विपक्ष की दिक्कत ये है कि शिकायत करने जैसा कुछ हो ही नहीं रहा, तो शिकायत क्या करें. 2006 से किताबें चल रहीं हैं, बदली जानी चाहिए लेकिन हमने अभी तक कुछ बदला ही नहीं.
सवाल: आपकी सरकार बनने के बाद कई संगठनों की तरफ़ से मांग आई है कि प्रारम्भिक शिक्षा मातृ भाषा में ही होनी चाहिए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई संगठन भी ऐसी मांग कर चुके हैं. क्या सरकार पर इस बात का दबाव है?
जवाब: हम पर किसी का दबाव नहीं है और होता भी नहीं है.
सवाल ये कि मातृभाषा में शिक्षा लेना या किसी दूसरी भाषा में ये छात्रों के हाथ में है.
हम मानते हैं कि संविधान में 22 भाषाएं हैं और एक लिंक भाषा है अंग्रेजी. अब इन 23 भाषाओं में कौन सी तीन सीखनी है, ये छात्र और उनके माता-पिता खुद तय करेंगे. इससे आसान पॉलिसी तो हो ही नहीं सकती.
सवाल: पिछले कुछ महीनों में भारत के कई राज्यों में सरकारी स्कूलों में बढ़ी हुई फ़ीस के विरोध में छात्रों के माता-पिता सड़कों पर उतर आए थे. बतौर मानव संसाधन विकास मंत्री आपने मामले पर क्या कदम उठाए हैं?
जवाब: भारत में दो लाख प्राइवेट स्कूल हैं जो कि अपने राज्य शिक्षा बोर्ड से जुड़े हुए हैं.
सीबीएसई और आईसीएसई के अपने बीस हज़ार स्कूल हैं और हमने इनको लिखा है कि उचित फ़ीस आपकी शर्त है और इसका पालन कीजिए.
मुझे लगता है कि स्कूली शिक्षा में ख़र्च होने वाले पैसों में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है. अभिभावकों को स्कूल द्वारा मौजूदा और आगे होने वाले खर्च/फ़ीस का ब्यौरा दिया जाना चाहिए. हमारी कोशिश सरकारी स्कूलों में छात्रों को सब्सिडी देने की भी है.
सवाल: एक आख़िरी सवाल. आपके हिसाब से क्या भारतीय राजनीतिक इतिहास में बदलाव की गुंजाइश है? अगर है तो क्यों?
जवाब: हम विवादों में पड़ते ही नहीं. मैं इस हफ़्ते एक पोर्टल शुरू कर रहा हूं कि अगर एनसीआरटी की किताबों में कोई वास्तविक गलती दिखे, तो जो शिक्षक इन किताबों को पढ़ाते हैं, वे हम तक इसे पहुंचा सकते हैं और अपने सुझाव भी दे सकते हैं.
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