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सूख कर कहीं ख़त्म ना हो जाए नैनी झील
- Author, राजीव लोचन साह
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, नैनीताल
पर्यटन अर्थव्यवस्था का विकास अगर समझदारी से न किया जाए तो वह विनाशकारी हो सकता है. पहले वह संस्कृति को ख़त्म करता है और फिर उस स्थान के वजूद को ही मिटाने लगता है.
इस बात की मिसाल आज नैनीताल में देखने को मिल रही है.
नैनीताल का अस्तित्व जिस नैनी झील के कारण है, वह इन दिनों सूखने की कगार पर पहुंच गई है. तीन ओर स्थित पहाड़ियाँ इस झील का जलागम हैं और इन पहाड़ियों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ झील के लिए ख़तरनाक है.
मगर पिछली आधी शताब्दी में यहां के हरे-भरे जंगल अब सीमेंट की इमारतों में बदल गए हैं.
नाज़ुक ख़ूबसूरती वाली जगह- नैनीताल
नवंबर 1841 में एक अंग्रेज शराब व्यवसायी पीटर बैरन द्वारा 'खोजे' जाने के दो-तीन साल के भीतर ही नैनीताल एक हिल स्टेशन के रूप में गुलज़ार होने लगा था.
मगर 18 सितम्बर 1880 को इसकी पूर्वी पहाड़ी पर आए एक जबर्दस्त भूस्खलन ने न सिर्फ इस नगर का भूगोल बदल दिया, बल्कि 151 लोगों की जान भी ले ली.
तब औपनिवेशिक शासकों को महसूस हुआ कि जिस जगह की ख़ूबसूरती पर वे फिदा हुए थे, वह तो दरअसल बहुत ही नाज़ुक है.
उन्होंने इस शहर को एक अठमासे बच्चे की तरह पालना शुरू किया. झील के चारों ओर की पहाड़ियों पर नालों का जाल बिछाया, ताकि बारिश का पानी ज़मीन के भीतर रिसकर दोबारा भूस्खलन न करे.
म्युनिसिपल नियमों में भवन निर्माण के लिये कठोर क़ायदे-क़ानून बनाए गए. उन नियमों का लगातार पालन किया जाता, तो नैनीताल पर आज संकट मंडराता ही नहीं.
उस दौर में नैनीताल पर नज़र बनाए रखने के लिए बनाई गई 'हिल साइड सेफ्टी कमेटी' 1970 के दशक तक जैसे-तैसे काम करती रही. हालांकि आज़ादी के बाद नैनीताल म्युनिसिपालिटी के पहले दो हिन्दुस्तानी चेयरमैन नियम-क़ानूनों के काफी पाबन्द रहे, मगर धीरे-धीरे व्यावसायिक लालच और प्रशासनिक लापरवाही नियम-कानूनों पर हावी होने लगे.
इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वायत्तशासी संस्थाओं के अधिकार खत्म कर दिए और देश की सबसे पुरानी नगरपालिकाओं में एक मानी जाने वाली नैनीताल नगरपालिका लगभग पंगु हो गई.
भ्रष्टाचार बढ़ा और पर्यटन भी
मई 1984 में इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब में इतनी उथल-पुथल रही कि पर्यटकों का रुख कश्मीर और शिमला से हटकर नैनीताल और मसूरी की ओर गोने लगा और दिल्ली के धंधेबाज़ों को नैनीताल की व्यावसायिक सम्भावनाओं की गहराई का पता लगा.
भ्रष्टाचार भी ज़ोर पकड़ने लगा था.
उसी साल नवंबर में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने 'झील परिक्षेत्र विकास प्राधिकरण' की बनाने की घोषणा की.
हालांकि नैनीताल के सुनियोजित विकास के लिये ऐसी किसी संस्था की मांग काफी समय से की जा रही थी. मगर प्राधिकरण ने आकर अवैध निर्माण और भ्रष्टाचार को बढ़ावा ही दिया.
1984 तक नैनीताल में न तो कोई 'स्टार' होटल था, न व्यावसायिक 'फ्लैट' बिकते थे और न ही पर्यटक भर-भर कर बसें यहाँ आती थीं. उस साल से ये सब शुरू हो गया.
हालात बिगड़ते देख जागरुक नागरिक रचनात्मक काम और प्रतिरोध में जुटे. 1985 में झील से गाद निकालने के लिये स्वैच्छिक 'कार सेवा' की गई. झील के चारों ओर एक मानव श्रृंखला भी बनाई गई.
1992 में 'नैनीताल बचाओ समिति' की ओर से चलाए गए लम्बे आन्दोलन के बाद यूपी सरकार द्वारा बनाई गई 'ब्रजेन्द्र सहाय कमेटी' ने झील और नगर को बचाने के लिये कई उपाय सुझाये.
मगर उनमें से किसी पर भी अमल नहीं हो पाया. इधर नगर व्यावसायिक निर्माणों से पटता रहा.
'अपना अस्तित्व खो देगी झील....'
नैनीताल की मानव वहन क्षमता तो कब की ख़त्म हो चुकी है. अब प्रकृति की लूट-झपट चल रही है.
पिछले साल और इस साल झील का जलस्तर देखकर हर कोई चिन्तित है.
भू वैज्ञानिक डॉ. बी. एस. कोटलिया ने इस झील की आयु मात्र 25 साल आंकी है. इसके आसन्न ख़तरे के बावजूद मनुष्य का लालच ही भारी पड़ रहा है.
इन दिनों 'रेन वॉटर हार्वेस्टिंग' की बात की जा रही है. मगर बरसात तो नैनीताल में खूब होती है.
बरसात में झील का अतिरिक्त पानी बलिया नाले के रास्ते बाहर निकालना पड़ता है. झील की इस हालत के लिये दरअसल जलागम क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण के साथ, बजरी की खुली जगह को पत्थर से और सारी कच्ची सड़कों को डामर से ढंक देना ज़िम्मेदार है.
झील के अन्दर के नैसर्गिक सोते पहाड़ियों से आने वाले गाद से पट गये हैं और झील सिर्फ बरसाती पानी पर आश्रित रह गई है.
बरसात में भर जाने वाला सूखाताल, जहां से रिस-रिस पानी नैनी झील में पहुँचता था, मकानों से ढंक गया है.
झील के पश्चिम की अयारपाटा पहाड़ी में पानी के दर्जनों चहबच्चे होते थे, वे भी कंक्रीट से पट गये हैं.
भारी-भरकम आबादी को पेयजल की आपूर्ति झील के पानी से ही होती है. मानसून ख़त्म होते ही अगर पानी की राशनिंग कर दी जाती तो शायद जल स्तर इतना नीचे नहीं गिरता.
नैनी झील और उसके साथ नैनीताल को अगर बचाया जाना है तो कुछ कठोर कदम तो उठाने ही पड़ेंगे, चाहे निहित स्वार्थ उसे चाहें या न चाहें.
वरना यह झील सिर्फ जुलाई से अक्टूबर तक ही भरी-भरी रहेगी और फिर सूखते-सूखते एक दिन अपना अस्तित्व ही खो बैठेगी.
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