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बदले-बदले से दिखते हैं बीजेपी के 'शाह'
- Author, राधिका रामाशेषन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
केंद्र में तीन साल के शासन और बिहार, दिल्ली में हार के बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा और असम में मिली शानदार जीत से ऐसा लगता है कि अमित शाह के सुर नरम पड़ गए हैं.
साल 2014 में मिली जीत के बाद से जब उनके नेतृत्व में पार्टी अपने शिखर पर पहुँच गई, शाह अपने हर भाषण का आरंभ और अंत इस उद्घोष से करते थे - "कांग्रेस मुक्त भारत".
पर अब वो कहते हैं, कांग्रेस एक 'पुरानी पार्टी' थी और उसकी दयनीय दशा के बाद भी इस वक़्त उसे ख़ारिज नहीं किया जा सकता.
साथ-साथ वो पूरे दम से ये भी संदेश देते हैं कि बीजेपी ने अंततः अपने आप को एक राष्ट्रीय राजनीतिक ध्रुव के तौर पर स्थापित कर दिया है.
उन्होंने दावा किया, "जैसे-जैसे मेरी पार्टी मज़बूत होती जा रही है, कांग्रेस बिखराव की ओर जा रही है."
पर कांग्रेस क्यों? उन्होंने ऐसा आभास दिया कि क्षेत्रीय पार्टियों को ज़्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता क्योंकि उनके नेता 'इतने बड़े' हैं कि उन्हें दबाव बनाकर काबू करना आसान नहीं.
बदलाव की तैयारी!
शाह या तो अपनी छवि दोबारा बनाने की कोशिश कर रहे थे, या अपनी अजेय होने की छवि को थोड़ा कमतर दिखाने की कोशिश कर रहे थे. या वो जान-बूझकर सतर्क थे. शायद उन्हें ये आभास हो गया था कि राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है, जहाँ जो आज निश्चित लग रहा हो वो कल सोचने के लायक भी ना रहे.
उदाहरण के तौर पर पश्चिम बंगाल में बीजेपी के तमाम प्रयासों के बावजूद जहाँ उसके नेताओं को लगता है कि जगह बनाई जा सकती है, बीजेपी हाल में हुए स्थानीय चुनावों में दूसरे नंबर पर आई, तृणमूल कांग्रेस ने ज़ोरदार जीत हासिल की.
बीजेपी के लिए संतोष की बात ये रही कि वामपंथियों की हालत और भी ख़राब रही.
लेकिन तृणमूल और बीजेपी के बीच का अंतर ये साबित करता है कि बीजेपी को अभी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनने की उम्मीद पालने से पहले लंबा रास्ता तय करना है, जहाँ ज़रूरी नहीं कि राजनीति हरदम हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से तय होती हो.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी का एजेंडा था कि वो तृणमूल को मुसलमानों का तुष्टिकरण करने वाली पार्टी के तौर पर दिखाए, मगर ममता हर बार चुनाव अल्पसंख्यक मतों के सहारे ही नहीं जीत सकतीं.
विनम्रता की सीख
हाल ही में एक टीवी शो में बीजेपी अध्यक्ष ने इस बात पर ज़ोर दिया कि विनम्रता एक ऐसा गुण है जिसे हर राजनेता को हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए.
शाह ने अगर विनम्र दिखने की कोशिश की, तो उसका एक दूसरा महत्वपूर्ण कारण भी है.
हाल में मिली शानदार जीतों के बाद बीजेपी की दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेता और निचला काडर, सफलता और विफलता के बीच की महीन लकीर को भूल गए हैं.
उत्तर प्रदेश में नवनिर्वाचित विधायकों के नीचे के अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार की ख़बरें आम हो गई हैं. बीजेपी सांसदों के अपने ही पार्टी सदस्यों की पहुँच से बाहर होने की शिकायतें भी आ रही हैं, वोटर तो बहुत दूर की बात है.
दिल्ली में कुछ नौकरशाहों ने माँग की है कि उन्हें उनके मंत्रालयों से हटाया जाए क्योंकि उनकी कथित तौर पर ज़रूरत से ज़्यादा सख़्ती दिखाने वाले मंत्रियों से नहीं बन रही.
इसलिए, जब इस कार्यक्रम में, शाह से बीजेपी की आगे की चुनौतियों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा,"चुनाव में जीत बड़ी हो या छोटी, विनम्रता ज़रूरी है. हमारी पार्टी जिस तरह से एक के बाद एक चुनाव जीत रही है, वो सबूत है कि हमें जीत को कैसे स्वीकार करना चाहिए. "
2019 की चुनौती
इस टीवी कार्यक्रम में, नेताओं का व्यवहार कैसा रहे ये बताने के साथ-साथ उन्होंने 2019 के आम चुनावों से पहले 'सेक्युलर' विपक्ष के 'महागठबंधन' की संभावना को भी ख़ारिज नहीं किया.
उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा, "अगर विपक्ष एकजुट होना चाहता है, तो हम क्या कर सकते हैं?"
जो बात स्पष्ट थी, वो ये कि 2019 के चुनाव से पहले, शाह वही कर रहे हैं जिसमें वो पारंगत हैं.
उन प्रदेशों में बूथ समितियाँ बनाना जहाँ बीजेपी का थोड़ा-बहुत वजूद है और जहाँ वो मज़बूत हैं वहाँ पहले से मौजूद समितियों को मज़बूत करना.
बीजेपी अध्यक्ष ये ज़ोर दे रहे थे कि उनका काडर केवल सत्ता में रहने की वजह से ही मज़बूत नहीं हो रहा, क्योंकि यूपी में 70 साल और उससे भी ज़्यादा उम्र के लोग पार्टी के पोस्टर लगा रहे थे, बिना किसी पुरस्कार की उम्मीद बांधे. जो शब्द काम कर रहा था, वो था 'त्याग'.
लेकिन बावजूद इसके, शाह इस बात का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए कि सत्ता पाने की होड़ में बीजेपी क्यों अपने विरोधियों के साथ कड़ाई से पेश आ रही है और हर तरह का रास्ता अपना रहे हैं, जैसे जाँच एजेंसियों का सहारा लेना.
उन्होंने इस बात से इनकार किया कि केंद्र 'दबाव' डालकर बीजेपी मायावती, लालू प्रसाद, अरविंद केजरीवाल, पी चिदंबरम और ममता जैसे विरोधियों को किनारे करना चाहती है, मगर उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उन्होंने कुछ 'ग़लत' किया है तो 'कार्रवाई' की जाएगी.
क्या कहते हैं संकेत
लेकिन वो एक मंझे हुए खिलाड़ी हैं. इसलिए दो नेता ऐसे थे, जिन्हें वो 'प्रतिद्वंद्वी' नहीं मानते - गुजरात में बीजेपी के पूर्व नेता शंकर सिंह वाघेला जो अभी कांग्रेस में हैं, और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार.
इन अटकलों के बीच कि वाघेला नवंबर में विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी में वापस आ सकते हैं, शाह ने घुमा-फिराकर कहा कि उन्होंने भी 'सुना' है कि वे कांग्रेस में 'खुश' नहीं हैं.
नीतीश पर उनकी टिप्पणी थी कि उन्होंने अब तक बीजेपी से संपर्क नहीं किया है. उनकी ये बातें इस बात का संकेत थे कि वाघेला और नीतीश दोनों के लिए बीजेपी के दरवाज़े खुले हैं.
बीजेपी के मतदाताओं के बीच भले ही 'त्याग' और 'निःस्वार्थ' जैसे शब्द गूँजते हों, मगर अंत में केवल व्यावहारिकता और निर्दयता, यही दो भावनाएँ हैं जो बीजेपी को लाभ पहुँचा रही हैं.
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