You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
निराला, नज़रुल, मजाज़ भी रहे हैं रांची पागलखाने में
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
तब भारत में ब्रितानी शासन था. रांची की गर्मी भी सर्दियों के शुरुआती महीनों के मानिंद थी. मौसम खुशनुमा, और गरमी होते ही बारिश. यह शहर कुछ-कुछ वैसा ही था, जैसे हिल स्टेशन हो. यही कारण था, जो अंग्रेजों ने रांची के पास कांके गांव को देश के सबसे बड़े पागलखाने के निर्माण के लिए पसंद किया. ताकि, अच्छी आबोहवा में मानसिक रोगियों का इलाज किया जा सके.
वह साल 1906 की जनवरी थी. इसके बाद कांके में 1908 में सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ साइकेट्री (सीआइपी) का शिलान्यास हुआ. इसके दस साल बाद 17 मई 1918 को यहां देश के तबके सबसे बड़े और अपनी तरह के पहले पागलखाने केंद्रीय मनोचिकित्सकीय संस्थान का उद्घाटन हुआ. अब यह पागलखाना अपने 100वें साल का जश्न मना रहा है.
सीआइपी के निदेशक प्रो डी राम ने बीबीसी को बताया कि इसकी ख्याति पूरी दुनिया में है. बिहार में जन्मे दुनिया के नामी गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह, महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मशहूर शायर मजाज लखनवी और बंगाल के विद्रोही कवि काजी नजरुल इस्लाम ने भी समय-समय पर यहां अपना इलाज कराया है.
भारत की पहली इसीटी
हिन्दी फ़िल्मों में पागलों को इलेक्ट्रिक शॉक देने के दृश्य आपने देखे होंगे. साल 1936 में दुनिया ने पहली बार इलेक्ट्रो कन्वर्जल थेरेपी (इसीटी) के बारे मे जाना. विदेशों के 1-2 संस्थानों में इस थेरेपी से इलाज शुरू हुआ. प्रो डी राम बताते हैं कि इसके 7 साल बाद सीआइपी ने 1943 में यहां इस पद्धति से इलाज प्रारंभ कर दिया. यह देश का पहला संस्थान बना, जिसने इस थेरेपी से इलाज प्रारंभ किया था.
सीआइपी के निदेशक प्रो डी राम ने बताया कि शीघ्र ही यहां 500 बेड की नयी यूनिट खोली जाएगी. इसपर काम प्रारंभ होगा. राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने भी शताब्दी समारोह मे शिरकत करते हुए इसे और अपग्रेड करने की सलाह दी थी.
पागल हैं या पढ़ाकू
सीआइपी के पास दो पुस्तकालय हैं. एक मरीजों के लिए और दूसरा रेजिडेंट डाक्टरों व शोधकर्ताओं के वास्ते. इनमें करीब 75000 किताबें हैं.
यहां के मुख्य लाइब्रेरियन जितेंद्र कुमार ने बीबीसी से कहा, "हमारे यहां मरीजों के लिए फिक्शन और नॉन फिक्शन दोनों तरह की किताबें हैं. कुछ मरीजों को क्लासिकल सिरीज़ के उपन्यास पसंद हैं, तो कुछ कविताएं पढ़ना चाहते हैं. हमने इसका ख्याल रखा है कि इनकी पसंद की सारी किताबें यहां मौजूद रहें. रेज़िडेंट डाक्टरों के लिए दुनिया भर के 554 जर्नल सब्स्क्राइब किए गए हैं. किसी भी देश में अगर कुछ अच्छा छपा है, तो हम उसे तत्काल यहां मंगाते हैं. लाइब्रेरी में कई भाषाओं के अखबार व पत्रिकाएं भी आती हैं. मरीजों को लाइब्रेरी मे बैठकर पढ़ना होता है. जबकि डाक्टरों को किताबो के ऑटोमेटेड लाइब्रेरी से इश्यू कराने की छूट है."
सीआइपी के सीनियर प्रोफेसर डा. संजय मुंडा ने बीबीसी को बताया कि कैंपस में एक अच्छा थिएटर भी है. इसमें सभी भाषाओं की बेहतरीन फिल्में लगती हैं. मरीजों को अपनी पसंद की फिल्में देखने की छूट है. इसकी स्थापना 1940 में हुई. तब देश के कुछ ही शहरों में सिनेमाघर थे. उन्होंने बताया कि यहां सुंदर वातावरण में मानसिक रोगियों का इलाज किया जाता है. उन्हें बेड़ियों में नहीं जकड़ा जाता, जैसा कि आप हिन्दी फिल्मों में देखते होंगे.
साइकेट्री में पहली एमडी डिग्री
सीआइपी के निदेशख प्रोफेसर डी राम बताते हैं कि साल 1922 में इसे लंदन यूनिवर्सिटी का ऐफ़िलिएशन मिला. अभी इसकी संबद्धता रांची यूनिवर्सिटी से है. साइकिएट्री में भारत की पहली एमडी डिग्री 1943 में इसी संस्थान ने डा एलपी वर्मा को दी.
निदेशक प्रो डी राम ने बताया, "भारत में पहली पहल ऑक्यूपेशनल थेरेपी, पहली न्यूरो सर्जरी, मनोरोगियों के इलाज में लीथियम व क्लोरोप्रोमाजीन का प्रयोग सीएइपी में ही किया गया. 1949 में डा. एबी डेलिस ने मेंटल हेल्थ एक्ट का पहला ड्राफ्ट सीआइपी में हीं तैयार किया. ऐसी कई उपलब्धियां सीआइपी को खास बनाती हैं."
10 रुपये में इलाज
डां संजय मुंडा ने बताया कि पागलपन पूरी तरह ठीक हो जाता है. जितने रोगी यहां भर्ती होने आते हैं, उतने ही डिस्चार्ज भी कर दिए जाते हैं.
हालाँकि यह सच है कि हाल के सालों मे डिप्रेशन जैसे मनोरोगियों की संख्या बढ़ी है. 2014 के 73509, 2015 में 77431 के मुक़ाबले 2016 में यहां इलाज कराने आने वाले मनोरोगियों की संख्या 84647 थी.
यहां भर्ती रोगियों को एक दिन का सिर्फ़ 10 रुपया देना होता है. इसी में उनके खाने-रहने व दवा-इलाज का खर्च भी शामिल है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)