कैबिनेट में फेरबदल से क्या नवीन पटनायक की मुश्किलें आसान होंगी

    • Author, संदीप साहू
    • पदनाम, भुवनेश्वर से बीबीसी हिंदी के लिए

ओडिशा बीजू जनता दल में जो पहले कभी नहीं हुआ वह अब हो रहा है. 20 साल की इस पार्टी में पहली बार कुछ वरिष्ठ नेता मीडिया में ऐसे बयान दे रहे हैं जिससे पार्टी के अंदर की फूट अब खुलकर सामने आ रही है. ख़ासकर हाल ही में मंत्रिमंडल में हुए फेरबदल के बाद पार्टी में असंतोष और नाराज़गी और गहरी और व्यापक हो गई है.

पिछले कुछ हफ़्तों से ऐसी ही बयानबाज़ी के लिए बीजद अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने शुक्रवार को एक समय उनके बहुत ही करीबी माने जाने वाले पार्टी के सांसद बैजयंत पंडा को बीजद संसदीय दल के प्रवक्ता के पद से हटा दिया.

इतना ही नहीं पार्टी के हितों के ख़िलाफ़ काम करने वाले और सार्वजनिक रूप से बयानबाज़ी करने वाले नेताओ के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है.

सरकार की आलोचना

बैजयंत 'जय' पंडा तब से निशाने पर थे जब से उन्होंने स्थानीय अखबार 'समाज' में एक लेख लिखकर पार्टी और सरकार की आलोचना की. फ़रवरी में हुए पंचायत चुनावों में बीजद के खस्ता प्रदर्शन के तत्काल बाद छपे इस लेख में उन्होंने सीधे न सही परोक्ष में पार्टी सुप्रीमो नवीन पटनायक को आड़े हाथों लिया.

सात मई को मंत्रिमंडल में फेरबदल के दो दिन बाद पंडा ने अपने ट्वीट में कहा कि इसे (फेरबदल को) लेकर पार्टी में चारों ओर असंतोष फैल रहा है.

इसी ट्वीट में उन्होंने कोरापुट से पार्टी के पूर्व सांसद जयराम पांगी के बीजद छोड़ कर भाजपा में योगदान करने के परिप्रेक्ष्य में इस बात को लेकर अपना रोष प्रकट किया कि जब उन्होंने ऐसी आशंका व्यक्त की थी तब उनकी आलोचना हुई थी.

भाजपा के साथ कथित रूप से उनके बढ़ते हुए ताल्लुकात को लेकर मीडिया और राजनीतिक हलकों में अक्सर चर्चे होते रहे हैं. कुछ हफ्ते पहले बीजद के ही सांसद तथागत सतपथी ने एक के बाद एक तीन ट्वीट्स में पंडा का नाम लिए बिना आरोप लगाया था कि भाजपा बीजद को तोड़ने की कोशिश कर रही है और इसमें उनकी ही पार्टी के एक सांसद मदद कर रहे हैं.

नेतृत्व को चुनौती

इसके बाद यह स्पष्ट हो गया था कि केंद्रापड़ा के सांसद का भाजपा के प्रति झुकाव महज मीडिया की दिमागी उपज नहीं था.

संसदीय दल के प्रवक्ता पद से निकाले जाने के बाद अपनी प्रतिक्रिया में पंडा ने यह ज़रूर कहा कि अगर इससे पार्टी मज़बूत होती है तो वे इसका स्वागत करते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने बीजद संसदीय दल के नेता भर्तृहरि महताब की खुल्लमखुल्ला बयानबाज़ी का जिक्र कर एक तरह से नेतृत्व को चुनौती भी दे डाली.

उन्होंने कहा, "मैं अकेला ऐसा नेता नहीं हूँ जिसने पंचायत चुनाव के बाद सार्वजनिक रूप से बयान दिया है. भर्तृहरि महताब ने भी कई बार बयान दिए. सच पूछा जाए तो वे मुझसे भी और मुखर रहे हैं."

पंडा का आरोप निराधार नहीं है. सार्वजनिक बयानबाज़ी से बचने की पार्टी की चेतावनी के बावजूद भृतहरि ने अपने ही संपादित अखबार 'प्रजातंत्र' में दो लेख लिखे जिसमें बीजद में जो कुछ चल रहा है उसे लेकर गहरा असंतोष साफ़ छलक रहा था.

एक लेख में उन्होंने कहा था कि जिस तरह से बीजद भाजपा के हर ऊलजलूल आरोपों का उत्तर दे रही है वह पार्टी की 'कमज़ोरी' को दर्शाता है. अब देखना यह है कि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होती है या नहीं.

कार्रवाई की चेतावनी

हालाँकि पार्टी ने स्पष्ट किया है कि अनुशासनहीनता को बिलकुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. बीबीसी के साथ बातचीत में पार्टी के प्रवक्ता कैप्टन दिब्यशंकर मिश्र कहते हैं, "बीजू जनता दल में अनुशासन सर्वोपरि है. अगर कोई अनुशासन तोड़ता है तो उसके ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी."

एक तरफ जहां कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है वहीं दूसरी तरफ कुछ असंतुष्टों को मनाने की कोशिशें भी जारी हैं. इसी क्रम में नवीन पटनायक ने वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अमर सतपथी को कैबिनेट मंत्री के दर्ज़े के साथ विधानसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक (चीफ व्हीप) बनाया है.

मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद निराश सतपथी ने पार्टी के मुख्य प्रवक्ता होते हुए भी इस बात पर असंतोष जाहिर किया था कि उनके ज़िले जाजपुर के सातों विधान सभा क्षेत्रों से बीजद के विधायक होने के बावजूद वहाँ से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया. यह बात उन्होंने अपने निवास पर अपने ज़िले के दो वरिष्ठ विधायकों और पूर्व मंत्री देबाशीष नायक और प्रमिला मल्लिक के साथ बैठक के बाद कही. इसके बाद नवीन का माथा ठनकना स्वाभाविक था.

लेकिन इस समय नवीन की सबसे बड़ी समस्या असंतुष्ट वरिष्ठ नेता नहीं, वल्कि युवा नेताओं की वह तिकड़ी है जिन्हें फेरबदल में मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा. सरकार में सबसे प्रभावशाली माने जाने वाले ये तीन मंत्री थे अरुण साहू, संजय दासवर्मा और प्रणब प्रकाश दास. इस सूची में अतनु सब्यसाची नायक को भी शामिल किया जा सकता है जिन्हें पिछले अक्तूबर में भुवनेश्वर के एक निजी अस्पताल में आग के हादसे में 30 लोगों के मारे जाने के बाद स्वास्थ्यमंत्री पद से हटा दिया गया था. नायक यह उम्मीद लगाकर बैठे थे कि इस बार उन्हें दोबारा मंत्रिमंडल में स्थान मिलेगा.

हालाँकि इन चारों ने वरिष्ठों की तरह पार्टी और उसके नेता के बारे में सार्वजनिक रूप से बयानबाज़ी नहीं की है. लेकिन प्रेक्षकों का मानना है कि ये चारों पार्टी को सबसे अधिक नुक़सान पहुंचा सकते हैं, क्योंकि पार्टी संगठन पर और खासकर पार्टी के युवा और छात्र संगठनों पर इनकी पकड़ काफी मज़बूत है.

स्पष्ट है कि पार्टी में तेज़ी से फैल रहे असंतोष को दूर कर राज्य में भाजपा के बढ़ते क़दमों को रोकना नवीन पटनायक के लिए उनके 20 साल के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती होगी.

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