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ब्लॉग: गर भारत में भी सांसद ब्रेस्टफ़ीडिंग का हक़ माँगें तो?
- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"14 साल की उम्र में मेरे दोस्त ने ही मेरे साथ बलात्कार किया था."
पिछसे साल दिसंबर में मैं ब्रिटेन में संसद के निचले सदन (हाउस ऑफ़ कॉमन्स) की बहस देख रही थी जब एक महिला सांसद कुछ कहने के लिए खड़ी हुईं. उस वक्त पूरे सदन में सन्नाटा था.
उन्होंने कहा, "मैंने अपने माँ-बाप, पुलिस किसी को नहीं बताया, सब अपने अंदर दबा कर रखा. मुझे अपने आप में अपवित्र महसूस होता. मेरी माँ की कैंसर से मौत हो गई, लेकिन मैं चाहकर भी उन्हें बताने की हिम्मत नहीं कर पाई. जब मेरी शादी हुई तो मैंने अपने पति से बात की. "
इसके बाद कई सांसद उनके पास गए और उनकी पीठ पर हल्के से हाथ रखा.
उस दिन वो बहस देखते हुए मेरे मन में ख़्याल आया था कि क्या भारतीय संसद में औरतों के मुद्दों पर इतनी गंभीरता और शालीनता से बहस होती है?
संसद में स्तनपान
बिल्कुल ऐसा ही ख़्याल पिछले हफ़्ते मन में दोबारा घर कर गया जब ऑस्ट्रेलियाई संसद में अपनी दो महीने की बच्चे को स्तनपान कराती सांसद लारिसा वाटर्स की तस्वीर अख़बारों में छपी.
क्या ऐसा भारतीय संसद में संभव है? महिला सांसद तो भारत में भी हैं और उनके भी छोटे बच्चे होते होंगे जिन्हें वो शायद उस दिन घर पर छोड़ना नहीं चाहती होंगी.
ऑस्ट्रेलिया में अगर महिला सांसद को अपने बच्चे को स्तनपान कराने का हक़ मिला तो वहाँ ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि संसद में इस पर लगातार बहस हुई और पुराने नियम में बदलाव किया गया.
इटली की राजनेता लिचा रोंज़ुली भी सितंबर 2010 में अपने छह महीने के बच्चे को यूरोपीय संसद में साथ लेकर आई थीं और लाती रही हैं.
आइसलैंड की सांसद ने भी संसद में बहस में हिस्सा लेते हुए अपनी बच्ची को दूध पिलाया था. इन महिला सासंदों का कहना है कि इस एक कदम से आप महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ने का प्रोत्साहन देते हैं जहाँ उन्हें लगता है कि माँ बनने के बाद भी वो अपना काम जारी रख सकती हैं. उन्हें किसी अहम वोट से ग़ैर हाज़िर रहने और ज़रूरत पड़ने पर बच्चे को साथ लाने के बीच किसी एक को नहीं चुनने की नौबत नहीं आएगी.
परकटी औरतें
बात सिर्फ़ बच्चों तक सीमित नहीं है. कई दूसरे देशों की संसदीय बहस पर ग़ौर करें तो पाएँगे कि वहाँ औरतों से जुड़े कितने अलग-अलग मुद्दों पर बहस होती है. ये कहीं न कहीं भारत में ग़ायब दिखती है.
निर्भया वाला मामला या चंद और घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो कम ही बार महिलाओं के मसलों पर क्वालिटी बहस हुई होगी.
यहाँ तक कि जब भी कभी संसद में महिला आरक्षण बिल पर बहस हुई तो असली बहस के बजाए बिल की कॉपी फाड देने जैसे 'पैंतरे' ज़्यादा चर्चा में रहे.
इसी बहस में सांसद शरद यादव ने कहा था कि इस विधेयक के ज़रिए क्या आप 'परकटी औरतों' को सदन में लाना चाहते हैं.
संसद ही नहीं भारत की राजनीतिक सोच-समझ और बहसों में भी महिलाओं के मुद्दों पर एक अजीब-सी चुप्पी पसरी रहती है. और कई पुरुष राजनेताओं के बयानों से उम्मीद बंधती नहीं धूमिल होती ही नज़र आती है.
मुख्य विवादित बयान
- 2015 में संसद में शरद यादव- दक्षिण भारत की महिलाएं सांवली होती हैं, लेकिन उनका शरीर ख़ूबसूरत होता है, उनकी त्वचा सुंदर होती है, वे नाचना भी जानती हैं. लेकिन भारत के लोग गोरी चमड़ी के आगे सरेंडर कर देते हैं.
- प्रियंका गांधी पर विनय कटियार - उनसे ज़्यादा सुंदर और ख़ूबसूरत और भी लड़कियां हैं जो स्टार कैंपेनर हैं. हीरोइन हैं और कई कलाकार हैं.
- सोनिया गांधी पर गिरिराज सिंह - अगर राजीव जी किसी नाइजीरियन लेडी से बियाह किए होते, गोरी चमड़ी ना होती, तो क्या कांग्रेस पार्टी उनका नेतृत्व स्वीकारती.
- दिग्विजय सिंह- मैं राजनीति का पुराना जौहरी हूँ. मीनाक्षी नटराजन जी का काम देख कर मैं यह कह सकता हूँ कि वह 100 टका टंच माल हैं.
- मोदी ने 2012 में एक रैली में शशि थरूर पर टिप्पणी करते हुए उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर को '50 करोड़़ की गर्लफ्रेंड' क़रार दिया था. (सुनंदा की अब मौत हो चुकी है)
- मुलायम सिंह- रेप के लिए फाँसी देना ग़लत है. लड़कों से ग़लती हो जाती है.
ऐसा नहीं है कि बाकी देशों में इस तरह की घटनाएँ होती ही नहीं. यूरोपीय संसद के 74 साल के सांसद यानुस कॉरविन-मिक ने इस साल मार्च में कहा था कि महिलाओं को समान वेतन नहीं मिलना चाहिए क्योंकि वो पुरुषों के मुकाबले छोटी, कमज़ोर और कम बुद्धिमान होती हैं.
लेकिन यूरोपीय संसद ने उन्हें हफ्ते भर बाद ही सज़ा सुना दी- संसद में 10 दिन के लिए सस्पेंड, 30 दिन तक भत्ता नहीं मिलेगा और एक साल तक वे यूरोपीय संसद के प्रतिनिधि के तौर पर कहीं नहीं जा सकते.
जब जेंडर को लेकर इस तरह की संवेदनशीलता हो तो उस देश की राजनीति में, संसद में और नीतियों में भी इसकी झलक दिखती है.
किसी संसद में स्तनपान कराने की अनुमति देना सिर्फ़ एक घटना भर नहीं है, ये राजनीति में औरतों और उनके मुद्दों के प्रति नज़रिए को भी दर्शाता है.
वैसे 144 देशों की जेंडर गैप रैकिंग में अभी भारत 87वें नंबर पर है यानी दिल्ली अब भी दूर है.
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