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मुस्लिम महिलाओं से मोदी-योगी की 'हमदर्दी'
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
जब मुख्यमंत्री योगी को 'तीन तलाक़' द्रौपदी के चीरहरण जैसा दिखे और पीएम मोदी मुस्लिम महिलाओं के हक़ों की रक्षा की ज़िम्मेदारी का वादा करने लगें; तो इस पर सवाल खड़ा होना लाज़िमी है.
इंडियन एक्सप्रेस की सलाहकार संपादक सीमा चिश्ती कहती हैं- ''क़ानूनी पहलू और तलाक़ के तरीक़े की प्रासंगिकता पर बहस के साथ-साथ मामले का एक संदर्भ ये भी है कि कुछ लोग तीन तलाक़ के ज़रिये ये दिखाना चाहते हैं कि मुस्लिम समाज पिछड़ा और दक़ियानूसी है.''
उन्होंने कहा, ''कई ऐसी राजनीतिक और सामाजिक ताक़तें हैं जो मुसलमानों को नीचा दिखाना चाहती हैं, ये उनकी राजनीति का आधार है.''
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के क़ासिम रसूल इलियास भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बयान को मुस्लिम समाज को बांटने की कोशिश के तौर पर देखते हैं.
'आरएसएस का फ्रंट'
फ़रवरी-मार्च 2017 में हुए विधानसभा चुनावों के पहले मुस्लिम राष्ट्रीय मंच नाम की एक संस्था ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तीन तलाक़ पर मुस्लिम महिलाओं से संपर्क का बड़ा कार्यक्रम चलाया था.
ये अभियान सहारनपुर के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों और हरिद्वार में भी चलाया गया.
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, भारतीय जनता पार्टी के पैतृक संगठन, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ा है जिसकी शुरुआत, संस्था की वेबसाइट के मुताबिक़, '24 दिसंबर 2002 को राष्ट्रवादी मुसलमान और आरएसएस के कुछ कार्यकर्ता साथ आए ....' आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार इसके संरक्षक हैं.
हालांकि संस्था के राष्ट्रीय सह संयोजक महीराजध्वज सिंह आरएसएस और मंच में संबंध की बात से इनकार करते हैं.
5 और 6 मई को रूड़की के पास कलियार शरीफ़ में हुए राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के राष्ट्रीय अधिवेशन में तीन तलाक़ पर जनजागरण अहम प्रस्तावों का हिस्सा था.
हस्ताक्षर अभियान
मंच ने तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ वाराणसी से एक हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की है जिसे बाद में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री कार्यालय, न्यायालय और विधि आयोग में भेजा जाएगा.
महीराजध्वज सिंह कहते हैं कि हस्ताक्षर अभियान बिहार और दिल्ली में भी चलाया जाएगा और इसे जून के दूसरे हफ़्ते तक ख़त्म करने की योजना है.
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हाल में ही इसी तरह का एक हस्ताक्षर अभियान चलाया था जिसके फॉर्म्स को लॉ कमिशन को सौंप दिया गया है.
क़ासिम रसूल इलियास कहते हैं, "मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पांच करोड़ मुसलमानों से फॉर्म भरवाये जिनमें लगभग आधे औरतों के ज़रिये भरे गए. और उन सभी ने कहा है कि वो पर्सनल लॉ में किसी तरह की कोई तब्दीली नहीं चाहती हैं."
इलियास सवाल करते हैं, "तीन तलाक़ ही मुस्लिम औरतों की अकेली दिक्क़त नहीं है, शिक्षा, रोज़गार, ग़रीबी- इन मुद्दों पर बीजेपी नेता क्यों नहीं बात करते? और अगर मोदी मुसलमान महिलाओं के इतने हिमायती हैं तो 2002 के गुजरात दंगों में उनके साथ जो ज़्यादतियां हुईं उन पर बीजेपी ने क्या किया?''
गो रक्षा और राम मंदिर निर्माण
सीमा चिश्ती याद दिलाती हैं कि जब अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में "राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बनने के वक़्त बीजेपी ने जो तीन मुद्दे कुछ वक़्त पर ताक़ के लिए रखे थे उसमें धारा 370, समान नागरिक संहित या कॉमन सिविल कोड और राम मंदिर निर्माण शामिल थे."
तीन तलाक़ को चीरहरण बताते और इसको ख़त्म करने की मांग करते हुए योगी ने ये भी कहा था, 'हम यूनिफॉर्म सिविल कोड की हिमायत करते हैं.'
कलेर शरीफ़ में तीन तलाक़ के साथ-साथ राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने दो दूसरे प्रस्तावों को भी अपनाया था: अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और गो रक्षा अधिवेशन में अपनाए गए अन्य प्रस्ताव थे.
महीराजध्वज सिंह ने बताया कि इस रमज़ान में 'बीफ़ नहीं चलेगा, गाय का दूध बांटा जाएगा.' ये तय किया गया है कि राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के कार्यकर्ता रोज़ेदारों को गाय का दूध बांटेंगे.
अपनी बातों में क़ुरान और हदीस का बार-बार हवाला देने वाले महीराजध्वज सिंह दावा करते हैं कि 'पैगंबर हज़रत मोहम्मद ने कहा था कि गाय का दूध शफ़ा है, गाय का घी दवा है और गाय का गोश्त बीमारी है.'
सिंह का तर्क है कि 'क़ुरान में गाय पर एक पूरी सूरा यानी अध्याय है और चूंकि गाय का ज़िक्र क़ुरान पाक में है इसलिए गाय पवित्र है और ये मुसलमानों को बताया जाना चाहिए.'
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए मंच ने अशफ़ाक़ुल्लाह एजुकेशनल ट्रस्ट शुरू किया है.
मुस्लिम औरतों के बहाने
मुसलमानों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग के बीच ये ख़्याल है कि तीन तलाक़ बीजेपी और हिंदुवादी दलों के लिए राजनीति से अधिक कुछ नहीं.
राजनीतिक विश्लेषक राधिका रमाशेषण कहती हैं, 'महिला अधिकारों पर बीजेपी का पूरा इतिहास सबके सामने रहा है.'
रमाशेषण कहती हैं, 'बीजेपी की बड़ी नेता विजय राजे सिंधिया ने रूपकंवर की सति का समर्थन किया था. वर्तमान में गुजरात और हरियाणा जैसे सूबों में कन्या भ्रूण हत्या पर क्या स्थिति है इस पर बीजेपी नेता कभी कुछ क्यों नहीं बोलते?'
दोनों, गुजरात और हरियाणा बीजेपी शासित हैं और गुजरात में तो पार्टी की सरकार लंबे वक़्त तक रही. नरेंद्र मोदी लंबे वक़्त तक सूबे के मुख्यमंत्री थे.
वो कहती हैं कि जब बीजेपी यूपी चुनाव में मुस्लिम महिलाओं के समर्थन की बात करती है तो साफ़ मालूम हो जाता है कि तीन तलाक़ का मुद्दा उठाने के पीछे उसकी मंशा क्या है.
बीजेपी और हिंदूत्वादी विचारधारा वाले संगठन क्या ट्रिपल तलाक़ मामले को इसलिए भी ख़ूब उछाल रहे हैं कि उन्हें लगता है कि इस मामले पर कोई उनके ख़िलाफ़ नहीं बोलेगा- न महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाले और न ही उदारवादी विचारधारा रखनेवाला कोई दल या संगठन?
सीमा चिश्ती कहती हैं, 'मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इस मामले पर सोचना चाहिए क्योंकि 1986 के शाह बानो केस के वक़्त से ही ये मामला सुर्खियों में है और इस तरह की प्रैक्टिस को तो कोई भी सही नहीं ठहरा सकता.'
तीन तलाक़ के कितने मामले!
लेकिन चिश्ती कहती हैं कि साथ ही ये देखना ज़रूरी है कि मुसलमानों में तीन तलाक़ के मामले हैं कितने!
हालांकि इस मामले पर किसी तरह का कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है कि इस तरह की कितनी मुस्लिम महिलाएं हैं जिन्हें एक ही बार में तीन तलाक़ कहकर शादी को ख़त्म कर दिया गया.
मुसलमान औरतों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने 5,000 महिलाओं के बीच एक सर्वे किया था जिसमें से 78 प्रतिशत औरतों ने कहा कि वो एकतरफ़ा तलाक़ से पीड़ित हुई हैं.
आंदोलन की सह-संस्थापक नूर जहां सफ़िया नियाज़ ये मानती हैं कि 5,000 का सर्वे साइज़ मुसलमानों की कुल तादाद के हिसाब से बहुत छोटा था लेकिन छोटी सी संस्था के पास बस इतना ही कर सकती है.
सफ़िया नियाज़ कहती हैं, 'आज जब मुस्लिम औरतें इतनी बड़ी तादाद में तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ सामने आ रही हैं तो बाक़ी सियासी दल खामोश क्यों हैं?'
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