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किशन जी आखिर कौन, नक्सली या देशभक्त?
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिये
किशन पटनायक और माओवादी किशनजी का फ़र्क़ समझने में गड़बड़ी होनी तो नहीं चाहिए लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में बीजेपी नेता इस मामले में धोखा खा गए.
बीजेपी ने एनसीईआरटी की दसवीं कक्षा की किताब 'लोकतांत्रिक राजनीति-2' के एक हिस्से पर विवाद खड़ा कर दिया है.
किशन जी पर छत्तीसगढ़ में विवाद
किताब में 'राजनीति की नैतिक ताकत !' शीर्षक से वैकल्पिक राजनीति को लेकर एक पाठ में चार लोगों का काल्पनिक संवाद है, जिसमें किशन जी का उल्लेख किया गया है.
किताब की शुरुआत ही किशन जी से होती है- "एक वैकल्पिक राजनीतिक ढांचा खड़ा करने की बात से किशनजी का क्या मतलब था?"
किताब में लिखा गया है-"स्वाभाविक तौर पर बातें किशनजी की तरफ़ मुड़ीं, जिन्हें देश भर की आंदोलनकारी जमातें अपना मित्र, राजनीतिक दार्शनिक और नैतिक मार्गदर्शक मानती थीं. किशन जी का तर्क था कि जनांदोलन के लोग चुनावी राजनीति में सीधी हिस्सेदारी करें."
बीजेपी का कहना है कि किताब में उल्लेखित किशन जी कोई और नहीं, नक्सल संगठन सीपीआई माओवादी के शीर्ष नेताओं में से एक मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी हैं, जो 2011 में पश्चिम बंगाल में पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गये थे.
हालांकि माओवादी किसी भी तरह से संसदीय राजनीति या चुनाव में विश्वास नहीं करते.
इसके उलट किताब के इस काल्पनिक संवाद में किशनजी के हवाले से चुनावी राजनीति की दृढ़ता से वकालत की गई है.
लेकिन छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने ने इस पाठ के पढ़ाए जाने को जहां देशद्रोह करार दे दिया.
वहीं, राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी इस मुद्दे पर आलोचना की मुद्रा में आ गये.
मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा- "हमारे पास इतने सेनानी हैं, इतने शहीद हैं, इतने हमारे आदर्श पुरुष हैं, उनको छोड़ कर ऐसे लोगों को कहीं भी रखा जाता है तो यह उचित नहीं है."
बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.
माओवादी हमलों की समीक्षा के लिये रायपुर पहुंचे केंद्रीय गृहराज्य मंत्री हंसराज अहीर ने भी लगे हाथों इस मुद्दे पर बयान दे दिया.
उनका कहना था कि किन राज्यों में इसे पढ़ाया जा रहा है, उसका पता लगाया जायेगा और किसी कारण से यह अनदेखा रह गया है तो इसे तुरंत रोक देंगे.
अहीर ने कहा-"ये ग़लत है और अगर ये पढ़ाया जा रहा है तो इसे तुरंत, इसी वक़्त से रोकने की ज़रुरत है."
किशन चिंतक आखिर कौन हैं?
किताब के सलाहकार और समाजवादी चिंतक किशन पटनायक के सहयोगी योगेंद्र यादव इस आलोचना से चकित हैं.
उनका दावा है कि जिन किशनजी का जिक्र किताब में किया गया है, वो कोई और नहीं 1962 में संबलपुर से सांसद चुने गये किशन पटनायक हैं.
योगेंद्र यादव ने कहा कि वे इस बात से बहुत ख़ुश हैं कि कम से कम इस बहाने से देश किशन पटनायक को जानेगा.
किशन पटनायक राममनोहर लोहिया के शिष्य थे और उन्होंने समाजवादी जन परिषद की स्थापना की थी.
सामयिक वार्ता के संपादक रहे किशन पटनायक अपने मौलिक चिंतन के लिये देश भर में जाने जाते थे.
बीबीसी से बातचीत में योगेंद्र यादव ने कहा- "किशनजी इस देश में प्रसिद्ध गांधीवादी-समाजवादी हुए, जिन्होंने एक दो नहीं, सैकड़ों लोगों को प्रेरित किया. अब जब राजनीति इतनी मूढ़ और मूर्ख हो जाये कि वो एक माओवादी किशनजी और गांधीवादी किशनजी में अंतर नहीं जाने, तो इन लोगों पर दया होनी चाहिए."
योगेंद्र यादव ने कहा कि 2007 में प्रकाशित इस किताब में साफ लिखा गया है कि किशनजी अब इस दुनिया में नहीं हैं.
जबकि माओवादी नेता मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी 2011 में मारे गये हैं.
योगेंद्र यादव ने कहा-" इस बहाने से देश को पता लगेगा कि माओवादी किशन के अलावा भी कोई किशन हुआ, जो बहुत बड़ा इंसान था और जिसने हमारे जैसे जाने कितने मिट्टी के माधवों को इंसान बना दिया."
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