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नज़रिया: 'जनभावना सब सोच-समझकर भड़कती है'
16 दिसंबर को राजधानी में हुए चर्चित 'निर्भया मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ ही फ़ांसी की सज़ा की ज़रूरत पर बहस फिर उठ खड़ी हुई है.
अदालत ने फ़ैसला सुनाते वक़्त कहा कि इस घटना ने देश की जनभावना को झकझोर कर रख दिया था.
जानी-मानी वकील रेबैका जॉन दोषियों को सज़ा देने के विरोध में नहीं हैं लेकिन जनभावना के नाम पर फांसी की सज़ा देना कहां तक जायज़ है.
इस पर रेबैका जॉन का नज़रिया
"तो देश की जनभावना क्या होती है? 19 साल की एक गर्भवती लड़की के साथ गैंग रेप, उसके सामने उसके बच्चे को पत्थर से कुचला जाना और उसके परिवार के 14 लोगों की हत्या, इस सबके बाद भी जो नहीं भड़की, वो कैसी जनभावना है?
एक जनभावना जो पहलू ख़ान की मौत को जायज़ ठहराते हुए ऐसी कई और मौतों को मंज़ूरी देती है. एक जनभावना जो अखलाक को मारने वाले को तिरंगे में लपेटती है. एक जनभावना जो नियमित तौर पर यौन शोषण की शिकार लड़कियों को कोर्ट और कोर्ट से बाहर बेइज्ज़त करती है. एक जनभावना जो इस बात की परवाह नहीं करती कि महिलाएं अपने घरों से लेकर सड़कों पर सुरक्षित नहीं हैं. एक जनभावना जो महिलाओं को अपनी पसंद के मुताबिक चीजों को चुनने के लिए दोषी ठहराती है.
एक जनभावना जो तुरंत ही पाला बदल लेती है अगर दोषी ताकतवर हो या करीबी हो. एक जनभावना जो दलित और छात्रों को नहीं छोड़ती क्योंकि उनके अंदर अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने का साहस है. एक जनभावना जो ये समझना नहीं चाहती कि बदला न्याय नहीं है और हिंसा से ज्यादा हिंसा पैदा होती है. एक जनभावना जिसके लिए कोर्ट में फांसी की सज़ा की सुनवाई तमाशा बन जाती है और सज़ा का ऐलान होने पर लोग खुशी से झूम उठते हैं. एक जनभावना जो अपने आप में इतनी अटपटी है कि हमें इसे 'सुविधा की जनभावना' कहना चाहिए न कि देश की जनभावना.
(ये रेबैका जॉन के निजी विचार हैं)
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