नज़रिया-'राष्ट्रपति तो वही होगा, जो मोदी का क़रीबी होगा'

    • Author, नीरजा चौधरी
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक

राष्ट्रपति चुनावों में तेलंगाना राष्ट्र समिति के एनडीए के साथ आने से ही बीजेपी ने आधी दूरी तय कर ली है.

लेकिन शिवसेना जैसे अड़ियल सहयोगियों को देखते हुए पार्टी के शीर्ष नेता कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, जिसने 2012 के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार को वोट किया था.

तमिलनाडु से उम्मीदें

कई लोग तमिलनाडु में हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में केंद्र की भूमिका को अपने राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए एआईएडीएमके के वोट पाने की कोशिशों के रूप में देखते हैं.

एम वेंकैया नायडू भी इस राज्य में काफ़ी सक्रिय रहे हैं.

कथित तौर पर राज्य में पार्टी अध्यक्ष के बजाय वो पोन राधाकृष्णन के साथ घूम रहे हैं.

हालांकि प्रधानमंत्री ने जयललिता की मौत के बाद अपना समर्थन ओ पनीरसेल्वम को दे रखा था.

लेकिन शशिकला जब पूरी पार्टी को अपने पक्ष में खड़ा करने में कामयाब हो गईं तो पनीरसेल्वम के पास कुछ ही विधायक बचे.

अब शशिकला की हार हो चुकी है और वो जेल में हैं जबकि उनके मनोनीत मुख्यमंत्री ई पलानीसामी और पार्टी का एक बड़ा हिस्सा पनीरसेल्वम से हाथ मिलाने का इच्छुक है.

यह एकजुट पार्टी बीजेपी के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है और संभव है कि वो राष्ट्रपति पद के उसके उम्मीदवार को वोट करे.

इसलिए तमिलनाडु में बीजेपी की स्थिति बेहतर है. बड़ा राज्य होने से राष्ट्रपति चुनावों में इसके 59,000 वोट हैं और इसमें आधे वोट भी मिल जाते हैं तो भी वो लक्ष्य के क़रीब पहुंच जाएगी.

क्षेत्रीय पार्टियों पर नज़र

बीजेपी एआईएडीएमके, टीआरएस, बीजेडी जैसे दलों पर आंख गड़ाए है जो न तो एनडीए और ना यूपीए में हैं या तृणमूल कांग्रेस, जदयू, राजद, समाजवादी पार्टी जैसी उन क्षेत्रीय पार्टियों की क़रीबी हैं जो बीजेपी की विरोधी हैं.

हालांकि सपा का क्या रुख़ होगा इस पर सवाल है.

दिलचस्प है कि 1 मई को विपक्षी दलों की बैठक में सपा शामिल नहीं हुई जोकि वैसे तो समाजवादी मधु लिमये की याद में आयोजित की गई थी लेकिन इसका असल मक़सद विपक्षी पार्टियों को राष्ट्रपति पद के लिए अपना संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने पर सहमति बनाना था.

ओडिशा को लेकर बीजेपी की गंभीरता के मायने

बीजू जनता दल ने भी अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं.

संसद में इसने समय-समय पर सरकार का साथ दिया है लेकिन ओडिशा में बीजेपी द्वारा हवा बनाए जाने से वो भी डरी है, क्योंकि बीते फ़रवरी में हुए स्थानीय चुनावों में इसका असर दिखा था.

राज्य में उभरती हुई बीजेपी का मतलब है, 2019 में विधानसभा चुनाव में बीजेडी के लिए मुश्किल खड़ी होना.

और ओडिशा को बीजेपी बहुत गंभीरता से ले रही है.

बीजेपी को जीत की उम्मीद

कहने की ज़रूरत नहीं है कि अगर बीजेपी तीन में से दो न्यूट्रल पार्टियों का समर्थन हासिल कर लेती है तो एनडीए के कुछ सहयोगियों के अलग रास्ता अपनाने के बावजूद उसे आसानी से जीत हासिल हो जाएगी.

निजी बातचीत में विपक्षी नेता मानते हैं कि यूपी में भारी जीत के कारण राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी का उम्मीदवार जीत सकता है, जहां के सिक्किम के सात वोटों की बजाय, हर विधायक के 208 वोट होते हैं.

राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में सांसद और विधायक होते हैं जिनके वोटों की अहमियत अलग-अलग होती है.

संघ की भूमिका

किसी से ये छिपा नहीं है कि उम्मीदवार का चुनाव नरेंद्र मोदी आरएसएस मुखिया मोहन भागवत की सलाह पर करेंगे.

भागवत स्वाभाविक रूप से कट्टर संघ के व्यक्ति को राष्ट्रपति भवन में बिठाना चाहेंगे.

शिवसेना, मोदी को उलझन में डालने के लिए उनका नाम पहले ही आगे कर ही चुकी है, लेकिन भागवत इनकार कर चुके हैं.

आज बहस का मुद्दा ये नहीं है कि कौन सा पक्ष जीतेगा, बल्कि ये है कि नरेंद्र मोदी क्या एक ऐसे शख़्स को खड़ा करेंगे जिसे विपक्ष भी समर्थन करना चाहेगा, ताकि देश के सर्वोच्च पद का चुनाव सहमति से हो सके.

अगर ऐसा होता है तो मोदी की सफलता में ये एक और तमगा होगा.

प्रधानमंत्री ने हाल ही में सहमति की बात कही थी. सहमति वाला उम्मीदवार कट्टर संघी नहीं हो सकता, हालांकि संघ उसका समर्थन कर सकता है.

हालांकि सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से विपक्ष को साथ लाने वाली ऐसी कोई पहलकदमी नहीं हुई है.

इस बीच विपक्षी दल सक्रिय हो गए हैं.

महागठबंधन का सोनिया का प्रयास

विपक्षी दलों को एकजुट करने को लेकर नीतीश कुमार के सोनिया गांधी से मिलने के कुछ ही घंटे बाद कांग्रेस अध्यक्ष अलग अलग नेताओं से फ़ोन पर बात कर रही थीं.

इन नेताओं में शरद पवार भी शामिल थे, जो शायद सालों बाद उनसे मिलने आए थे.

सोनिया ने सीताराम येचुरी से बात की, इसके तुरंत बाद उन्होंने संयुक्त उम्मीदवार उतारने को विपक्षी एकता की परीक्षा बताया.

शरद यादव, डी राजा जैसे नेता कांग्रेस मुखिया से सलाह लेने के लिए अचानक जुटे और 10 जनपथ में अचानक फिर से जान आ गई.

सोनिया ने पटना में लालू और लखनऊ में मुलायम सिंह यादव से बात की. राहुल गांधी ने अखिलेश से ये मुद्दा छेड़ा और लालू यादव ने मायावती से.

अचानक विपक्षी कैंप में गतिविधियां तेज़ हो गईं. ऐसा लगा कि एआईडीएमके और संभवतः बीजेडी को भी छोड़ दें तो सभी ग़ैर एनडीए पार्टियां संयुक्त उम्मीदवार के पक्ष में खड़ी हो सकती हैं.

सोनिया गांधी की सेहत बहुत अच्छी नहीं रही है और हाल ही में समाप्त हुए संसद सत्र में भी वो कभी कभार ही देखी गईं.

यहां तक कि संसद सत्र समाप्ति के बाद आयोजित होने वाली अपनी पार्टी के सासंदों की डिनर पार्टी में भी वो अपने रंग में नहीं दिखीं और हर सांसद के पास नहीं गईं, जैसा वो करती हैं.

अब वो राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के मुद्दे पर अचानक सक्रिय हो गई हैं.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल इसी साल जुलाई में समाप्त हो रहा है.

इस मुद्दे पर सोनिया गांधी ने खुद को सक्रिय किया तो सिर्फ इसलिए नहीं कि ताक़तवर मोदी के सामने अलग-थलग पड़े विपक्ष को एकजुट किया जाए बल्कि इसलिए भी कि राहुल गांधी के नेतृत्व और पार्टी की सुस्ती को लेकर बढ़ते अंदरूनी असंतोष को भी दुरुस्त किया जाए.

क्या प्रणब को देंगे दूसरा कार्यकाल?

प्रणब मुखर्जी को दूसरा कार्यकाल दिए जाने की बात को कांग्रेसियों ने ही हवा दी थी, लेकिन ऐसा माना जाता है कि राष्ट्रपति ने साफ़ कर दिया कि वो तभी इस पर विचार करेंगे जब सरकार की तरफ़ से प्रस्ताव आएगा.

हालांकि कई और नामों पर भी अंदर ही अंदर चर्चा है, जैसे कि शरद पवार. इनका नाम पहली बार वामपंथी नेताओं ने तब आगे किया था जब वे इसकी संभावना तलाशने को लेकर एनसीपी नेता डीपी त्रिपाठी से मिले थे.

वाम नेताओं को लगा कि पवार केवल प्रशासनिक योग्यता के बूते ही मज़बूत उम्मीदवार नहीं होंगे बल्कि सालों से अलग अलग पार्टियों में उनके संबंध भी तब काम आएंगे जब मुकाबला बहुत क़रीबी हो.

उन्हें ये भी लगा कि वो शिवसेना और एनडीए परिवार में बीजेपी के जूनियर पार्टनर बनने की वजह से चुप बैठे अन्य शुभचिंतकों को भी अपने साथ ला सकते हैं.

शिवसेना की मुश्किल

वामपंथी दलों की गणित थी कि महाराष्ट्र से आने वाले उम्मीदवारों का विरोध करना शिवसेना के लिए मुश्किल हो सकता है और उद्धव ठाकरे ने इस बारे में काफी कुछ कहा है. आखिरकार, इसी पार्टी ने 2007 में एनडीए की बजाय यूपीए की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल को वोट किया था.

हालांकि इस मुद्दे पर बात करने आए विपक्षी नेताओं से शरद पवार ने अपनी अनिच्छा ज़ाहिर कर दी थी और कहा था कि जबतक सरकार और विपक्ष दोनों की सहमति नहीं बनती वो तैयार नहीं होंगे.

पवार के इनकार का मतलब बहुत साफ है; एनडीए के पास बहुमत से महज 20,000 वोट कम थे और हालिया विधानसभा चुनावों में यह अंतर और कम हुआ है. ऊपर से टीआरएस की घोषणा ने बीजेपी के दावे को मज़बूत किया है.

पवार जानते हैं कि सत्तारूढ़ पार्टी को इतने वोट हासिल करने में कोई ख़ास दिक्कत नहीं होगी.

पूरी ज़िंदगी में कभी चुनाव न हारने वाले शरद पवार अपने करियर के अंत में हार का जोखिम नहीं उठाएंगे.

शरद यादव के नाम की चर्चा

जिस दूसरे नाम पर चर्चा है, वो है जदयू नेता शरद यादव की.

जोकि पिछले साल तक अपनी पार्टी के अध्यक्ष थे और 1974 में कांग्रेस के ख़िलाफ़ विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार रह चुके हैं.

यूपीए कार्यकाल के दौरान लोकसभा स्पीकर रह चुकीं मीरा कुमार का भी नाम चर्चा में है, जोकि महिला होने के अलावा दलित भी हैं.

हालांकि दिल्ली के गलियारों में कर्नाटक के कांग्रेस से पूर्व सांसद हनुमनथप्पा का नाम भी चल रहा है.

विपक्षी नेताओँ में किसी गैर राजनीतिक उम्मीदवार को खड़ा करने का भी विचार चल रहा है, जैसे कोई रिटायर्ड जज या गोपाल कृष्ण गांधी जैसा कोई पूर्व राज्यपाल.

सबको स्वीकार्य और प्रतिष्ठित व्यक्ति की तलाश जारी है.

इसलिए सबसे ज्यादा रहस्य अब ये है कि सत्तारूढ़ दल किसे उम्मीदवार बनाता है.

कई नाम हैं, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, सुमित्रा महाजन और ओडिशा की आदिवासी महिला नेता द्रौपदी मुर्मू जोकि झारखंड की राज्यपाल भी हैं.

लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि जिनका नाम सामने आता है वो रेस से ज़रूर बाहर हो जाते हैं, क्योंकि उनके ख़िलाफ़ और पक्ष में गोलबंदी होनी शुरू हो जाती है.

लेकिन इसकी पूरी संभावना है कि अगला राष्ट्रपति वही होगा जो नरेंद्र मोदी का क़रीबी होगा.

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