अमरीका में 'भेदभाव', क्या भारतीय भी हैं ज़िम्मेदार?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

भारत की इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री (आईटी इंडस्ट्री) में एच-1 वीज़ा में हो रहे बदलावों से थोड़ी घबराहट है. ऐसा कहा जा रहा है कि अमरीकी नेतृत्व में हुए बदलाव से भारत की अहम आईटी कंपनियां जैसे टाटा कन्सलटेंसी सर्विस और इन्फोसिस को नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

आईटी इंडस्ट्री के कई विशेषज्ञों का मानना है कि अमरीका में हर साल इन आईटी कंपनियों को लेकर सियासी मुद्दा बनाया जाता है. ख़ासकर राष्ट्रपति चुनाव से पहले ये मुद्दे मीडिया में सुर्खियां हासिल करते हैं.

इस बार के चुनाव में भी ऐसा ही देखने को मिला क्योंकि डोनल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार में बार-बार वादा किया था कि वो अमरीकी नागरिकों को नौकरियों में प्राथमिकता दिलवाना सुनिश्चित करेंगे.

इन्फोसिस के पूर्व प्रमुख वित्तीय अधिकारी वी. बालकृष्णन ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''अमरीका में भारतीय कंपनियों को निशाना बनाया जाना राजनीतिक मुद्दा है . इसका संबंध आर्थिक हक़ीक़तों से नहीं है.''

माइंड ट्री कन्सल्टिंग के सीईओ रोस्टोव रावनन ने कहा, ''अमरीका में यह एक सामाजिक मुद्दा है, जिसे वहां के नेता हवा देते हैं. यहां भारतीय आईटी इंडस्ट्री अक्सर निशाने पर रहती हैं.''

उन्होंने कहा, ''अमरीका ख़ासकर निचले दर्जे की नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहा है क्योंकि जिन नौकरियों में ज़्यादा विशेषज्ञता की ज़रूरत नहीं होती है उन्हें पिछले दो दशकों से देश के बाहर से आउटसोर्स किया जा रहा है.''

बालकृष्णन ने कहा, ''चीन में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक व्यवस्थित तंत्र है. उसी तरह से भारत में आईटी सेक्टर के लिए है. अमरीकी कॉर्पोरेटर लगातार तकनीकी रूप से दक्ष कामगारों की कमी की शिकायत कर रहे हैं.''

उन्होंने कहा, ''अमरीका में इस सेक्टर में बेरोज़गारी दो फ़ीसदी से भी कम है. इसलिए वहां की अर्थव्यवस्था की यह हक़ीक़त है कि आईटी सेक्टर में दक्ष कामगारों का अभाव है.''

यह सच है कि भारतीय आईटी सेक्टर हर वक़्त एक किस्म के संकट से ग्रस्त रहता है. इन संकटों में Y2K बग और अमरीकी अर्थव्यवस्था की मुश्किलों का योगदान रहा है. पिछले 18 सालों में आईटी सेक्टर ने इन हालात से जूझने के लिए नई राह को अख्तियार किया है.

बालकृष्णन और रावनन दोनों इस बात से सहमत हैं कि अमरीका द्वारा वीज़ा नियमों में दो बदलावों से भारतीय आईटी मार्केट पर असर कम वक़्त के लिए होगा.

हेडहंटर्स के सीईओ कृश लक्ष्मीकांत का मानना है कि वीज़ा नियमों हुए बदलावों से विदेशी मुद्रा आय पर भी असर पड़ेगा क्योंकि कम ही लोग पैसा अपने घर पर भेजेंगे. मार्च 2017 तक विदेश से भेजे जाने वाले पैसों में 10 फ़ीसदी की गिरावट आई है.

बालकृष्णन और रावनन दोनों इस बात से सहमत हैं कि इन बदलावों से भारतीय कंपनियों के व्यापार मॉडल में बदलाव होंगे.

बालकृष्णन कहते हैं, ''आप किसी भी आईटी कंपनी को ले लीजिए तो पाएंगे कि इनके 70 फ़ीसदी काम भारत में हो रहे हैं और बाक़ी भारत से बाहर. आने वाले वक़्त में इसमें और बदलाव होगा.''

उन्होंने कहा, ''डिजिटल टेक्नोलॉजी में तेजी से हो रही प्रगति के कारण भारत से बाहर काम अप्रासंगिक रह जाएंगे. ऐसे में संभव है कि 90 फ़ीसदी काम भारत में हो और भारत से बाहर 10 फ़ीसदी काम ही हो.''

रावनन का मानना है कि इन मुद्दों को सुलझाने के लिए लंबे वक़्त की नीति बनाने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा, ''भारतीय आईटी सेक्टर के बिज़नेस मॉडल में बदलाव की ज़रूरत है. हम हमेशा अपनी गर्दन पर तलवार चलने की इज़ाजत कैसे देते रहेंगे. वर्तमान बिज़नेस मॉडल से हम पर बुरा असर पड़ रहा है, क्योंकि हम आलसी हो गए हैं.''

रावनन बिज़नेस मॉडल में बदलाव से भी आगे बढ़कर अपनी बात कहते हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय आईटी कंपनियों को और कॉर्पोरेट सोशल ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए.

रावनन ने कहा, ''अमरीका में सामान्य लोगों के बीच धारणा है कि भारतीय कंपनियां यहां आकर उनकी नौकरियां छीन रही हैं. हमे इस धारणा को बदलने की ज़रूरत है.''

उन्होंने कहा, ''जो भारतीय अमरीका में रह रहे हैं, उन्हें अपने अमरीकी सहकर्मियों से और मेलजोल बढ़ाने की ज़रूरत है. भारतीय अमरीका के उन इलाक़ों में रहते हैं जहां सिर्फ़ भारतीयों की बस्तियां हैं. ये अपने घर से ही लंच बॉक्स लाते हैं. वे ऑफिस में खाते भी हैं तो भारतीयों के साथ ही जबकि अमरीकी सहकर्मी बाहर खाने जाते हैं. हम लोग अमरीकी समुदाय में घुलने-मिलने की कोशिश नहीं करते हैं.''

रावनन ने कहा, ''एच1-बी वीज़ा यहां एक मुखर मुद्दा है क्योंकि अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा टेक्नोलॉजी मार्केट है. हालांकि दुनिया के और देशों में भी यही स्थिति है. हम इसे ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में भी महसूस कर सकते हैं.''

लक्ष्मीकांत का मानना है कि टीसीएस और इन्फोसिस जैसी कंपनियों पर एच1-बी वीज़ा के मामले में आरोप पूरी तरह से ग़लत नहीं हैं.

लक्ष्मीकांत ने कहा, ''यह सच है कि भारत को ऐसे 38 हज़ार वीज़ा मिले हैं. इनमें से 18 हज़ार टीसीएस, इन्फोसिस और कॉग्निज़ेंट टेक्नोलॉजी को मिले हैं. ये कंपनियां अपने फ़ायदे के लिए इन नियमों इस्तेमाल का इस्तेमाल कर रही हैं.''

हालांकि बालकृष्णन का मानना है कि नई पाबंदी दिखावटी ज़्यादा है. उन्होंने कहा कि यदि वे इन मुद्दों पर ज़्यादा दबाव बनाएंगे तो भारत में सारी चीज़ें शिफ्ट हो जाएंगी. इससे आईटी सेक्टर के काम अन्य देशों में शिफ्ट होंगे. इसका मतलब यह हुआ कि काम वहां जाएगा जहां प्रतिभा है. इस मामले में हम चीन को देख सकते हैं.

इसका एक प्रभाव यह भी होगा कि भारतीय आईटी पेशेवर जैसे पहले काम करने अमरीका जाते थे उसमें कमी आएगी.

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