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नज़रिया: 'संघ के हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की राह पर बीजेपी'
- Author, दीपांकर भट्टाचार्य
- पदनाम, सीपीआई (एम-एल) महासचिव, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
2014 के लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने के तीन साल बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने असधारण प्रदर्शन किया है.
मई, 2014 में उत्तर प्रदेश ने ही वो ज़मीन तैयार की, जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने. मार्च, 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजों भारतीय जनता पार्टी को वो ताक़त दी कि वे देश के सबसे बड़े प्रांत में संघ और बीजेपी के फासीवाद एजेंडे को पूरा करने के लिए योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना सकें.
दरअसल, भारत की चुनावी व्यवस्था, इस वक्त बीजेपी के पक्ष में नाटकीय ढंग से काम कर रही है. केवल 31 फ़ीसदी मत उसे लोकसभा में पूर्ण बहुमत दिलाता है और उत्तर प्रदेश में 39 फ़ीसदी मत से उसे 80 फ़ीसदी सीटें मिल जाती है.
वहीं दूसरी तरफ लोकसभा में 20 फ़ीसदी मत पाने के बाद भी बहुजन समाज पार्टी को कोई सीट नहीं मिलती और विधानसभा में 20 फ़ीसदी से ज़्यादा मत पाने के बावजूद उसे केवल पांच फ़ीसदी सीटें मिली हैं.
इन सबके बीच ईवीएम के साथ संभावित छेड़छाड़ का मुद्दा भी उठा है. कुछ लोग बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने की मांग कर रहे हैं. लेकिन इस आधार पर भारतीय जनता पार्टी को चुनौती नहीं दी जा सकती क्योंकि इसी व्यवस्था में दूसरी पार्टियों को भी अतीत में बहुमत मिला है.
बीजेपी की विध्वंसकारी एजेंडे और निरकुंश शासन के विरोध के लिए बड़े स्तर और राजनीतिक तौर पर लोगों को सक्रिय करने और एकजुट करने की ज़रूरत है. ज़मीनी स्तर पर ऐसा विरोध करने से पहले ये देखना होगा कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी इतना बेहतर प्रदर्शन कैसे कर रही है?
कुछ लोगों का मानना है कि बीजेपी की कामयाबी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अहम भूमिका है और मीडिया में अचानक से संघ को तवज्जो भी मिलने लगी है.
ये बात अपने जगह सही है कि संघ लगातार बीजेपी को निर्देशित करता रहा है और बीते नौ दशकों से इसके संगठन लोगों के बीच राजनीतिक नेटवर्क तैयार करने के लिए मदद करते रहे हैं. लेकिन बीजेपी की मौजूदा कमायाबी नई बात है. बीजेपी की मौजूदा कामयाबी के बारे में ये कहना सही नहीं है कि संघ की विचारधारा लोकप्रिय हो रही है.
आरएसएस की भूमिका
आरएसएस की भूमिका को ना तो कमतर करके देखे जाने की ज़रूरत है और ना ही बढ़ाचढ़ा कर आंकने की ज़रूरत है. ऐसे स्थिति में हमें उस वातावरण पर ध्यान देना होगा कि जिसके चलते बीजेपी की स्थिति इतनी मज़बूत हुई है.
नीतिगत आधार पर सभी सत्तारूढ़ पार्टियों का एजेंडा एक जैसा है. चाहे वो आर्थिक नीतियों में उदारीकरण को बढ़ावा देना हो या फिर निजीकरण और भूमंडलीकरण की बात हो. इसके अलावा विदेश नीति में अमरीकी खेमे में रहना हो या फिर निरकुंश क़ानून के ज़रिए विरोध दबाने की रणनीति हो, जिसके लिए एएफएसपीए, यूएपीए और राजद्रोह के क़ानून हैं.
साथ ही, आधार कार्ड के जरिए लोगों पर निगरानी रखी जा रही है. मोदी और मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व में भले काफ़ी अंतर हो लेकिन नीतियों को लागू करने में दोनों एकसमान हैं.
नीतियों में एकरूपता के अलावा राजनीतिक विचार और कांसेप्ट के मतलब भी बदल रहे हैं. पहले का राष्ट्रवाद, विदेश उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष से आया था, लेकिन आज का राष्ट्रवाद केवल पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के विरोध तक सीमित रह गया है, वहीं दूसरी ओर भारत अमरीका का जूनियर पार्टनर बनने को तैयार है. नस्लीय और निरंकुश औपनिवेशिक अमरीकी ताक़त के सामने राष्ट्रवाद आड़े नहीं आता.
धर्मनिरपेक्षता, एक आधुनिक विचार था, जिसमें धर्म और राजनीति को अलग-अलग रखा जाता था, लेकिन अब धर्म के नाम पर राजनीति हो रही है. संघ परिवार हिंदुत्व का झंडा बुलंद कर रहा है. आधुनिक भारत के बारे में कहा जाता रहा है कि अनेकता में एकता का देश है.
सामाजिक न्याय या सोशल इंजीनियरिंग
लेकिन अब विविधता को सम्मान नहीं देने और उसका जश्न नहीं मनाने देने की सीख दी जा रही है. अब ज़ोर विविधता के बदले एकता पर दिया जा रहा है. और ये एकता संघ के हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की राह पर आगे बढ़ रही है.
एक और अन्य उदाहरण भी देख लें, सामाजिक न्याय के मसले को देखें तो आंबेडकर ने जाति उन्मूलन की बात कही थी, जिसमें भारत के आधुनिक और संवैधानिक लोकतंत्र को आज़ादी, समानता और भाईचारे के खंभे पर स्थापित करने की बात कही थी.
लेकिन इतने साल बीतने के बाद आंबेडकर की सामाजिक न्याय की बात जाति आधारित सोशल इंजीनियरिंग में तब्दील हो चुकी है. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि भारत के लिए हिंदू राष्ट्र बनना सबसे बड़ा ख़तरा होगा, लेकिन उनकी चेतावनी को अनसुना करते हुए मायावती ने 2002 में गुजरात में मोदी के लिए चुनाव प्रचार किया था और बीजेपी से उत्तर प्रदेश में हाथ भी मिलाया था.
नीतीश कुमार केंद्र सरकार में बीजेपी के साथ सात साल तक रहे और उसके बाद बिहार सरकार में आठ साल साथ रहे. इसलिए इस बात पर कोई अचरज नहीं है कि सामंती और पितृसत्तात्मक शक्तियों की पार्टी आज दलितों, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं में अपनी जगह बना चुकी है.
क्या है वामपंथ की चुनौती?
कॉरपोरेट हितों और अमरीका परस्त नीतियों के विरोध में हमें भारत के आम लोगों के हितों और अधिकारों की वकालत करने की ज़रूरत है. इसके अलावा संघ के प्रभाव और उनकी घृणा और अफ़वाह फैलाने वाले नेटवर्क के ख़िलाफ़ लोगों को सक्रिय करने की ज़रूरत है. इसके ज़रिए ही कम्युनिस्ट आंदोलन को बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंचाना संभव होगा.
वामपंथी आंदोलन के इतिहास के सबसे नाज़ुक दौर में हमें दो अहम रणनीतियों पर चलने की ज़रूरत है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिन वादी) इस बात को लेकर कृतसंकल्प है कि आम लोगों को वैचारिक रूप से आंदोलन के लिए तैयार किए जाने की ज़रूरत है.
साथ ही सभी वामपंथी और प्रगतिशील ताक़तों को एकजुट होने की ज़रूरत है, ताकि समाज को तार्कित तौर पर प्रगतिशील नज़रिए से आगे बढ़ाया जा सके. घृणा और भय की राजनीतिक का जवाब दिया जा सके. ये चुनौतियां पहले कभी इतनी महत्वपूर्ण नही रहीं, जितनी मौजूदा समय में हो गई हैं.
बीजेपी के ख़िलाफ़ चुनावी गठबंधन पर ध्यान देने के बदले हमें लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रमोट करने पर ध्यान देना चाहिए. हमें इसका ख्याल भी रखना होगा कि गैर बीजेपी राजनीतिक दलों की प्रत्येक अवसरवादी फ़ैसलों से बीजेपी मज़बूत होगी.
इसलिए कम्युनिस्ट ताक़तों को अवसरवादिता छोड़कर आक्रामक अंदाज़ में लगातार लोकतंत्र और न्याय की रक्षा में लगना होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं. लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के महासचिव हैं.)
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