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पूरे देश की नजरें क्यों हैं एमसीडी चुनाव पर?
- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
यह पहला मौक़ा है, जब एमसीडी के चुनावों ने इतने बड़े स्तर पर देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा है. वजह है इसमें शामिल तीन प्रमुख दलों की भूमिका. तीनों पर राष्ट्रीय वोटर की निगाहें हैं.
सहज रूप से नगर निगम के चुनाव में साज-सफाई और दूसरे नागरिक मसलों को हावी रहना चाहिए था, पर प्रचार में राजनीतिक नारेबाज़ी का ज़ोर रहा.
सवाल तीन हैं. क्या एमसीडी की इनकम्बैंसी के ताप से बीजेपी को 'मोदी का जादू' बचा ले जाएगा? क्या 'आप' की धाक बदस्तूर है? और क्या कांग्रेस की वापसी होगी?
नतीजे जो भी हों विलक्षण होंगे, क्योंकि दिल्ली का वोटर देश के सबसे समझदार वोटरों में शुमार होता है.
तीन टुकड़ों में एमसीडी
साल 2012 में जिस वक़्त एमसीडी को तीन टुकड़ों में बाँटा जा रहा था, तब दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी. उस वक्त विभाजन के पीछे प्रशासनिक कारणों के अलावा राजनीतिक हित भी नजर आ रहे थे.
कांग्रेस को लगता था कि इस तरह से एमसीडी पर क़ाबिज होने के विकल्प बढ़ जाएंगे. पर कांग्रेस को उसका लाभ कभी नहीं मिला.
एमसीडी के साल 1997 से 2012 तक के चार में से तीन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई है.
साल 2002 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब एमसीडी की 134 में से 107 सीटें कांग्रेस ने जीत कर पहला करारा राजनीतिक संदेश दिया था. उस चुनाव में बीजेपी को केवल 17 सीटें मिलीं थीं.
उसके पहले 1997 के चुनाव में बीजेपी को 79 और कांग्रेस को 45 सीटें मिलीं थीं. साल 2007 के चुनाव में कुल सीटों की संख्या बढ़कर 272 हो गई.
उस चुनाव में बीजेपी ने वापसी की. उसे 164 सीटें मिलीं और कांग्रेस को 67.
साल 2012 में एमसीडी का तीन टुकड़ों में विभाजन होने के बाद हुए चुनाव में बीजेपी को उत्तरी और पूर्वी क्षेत्र में स्पष्ट बहुमत मिला और दक्षिण क्षेत्र में वह 104 में से 44 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी. कुल 272 में उसे 142 सीटें मिलीं.
क्या दो ध्रुवीय राजनीति होगी?
उस वक़्त तक दिल्ली में दो राजनीतिक ताक़तें थीं. अब तीन हैं. सवाल है कि क्या दिल्ली की राजनीति फिर से दो ध्रुवीय होगी? इसके लिए किसी एक नदी को सरस्वती की तरह विलीन होना पड़ेगा.
साल 2012 तक दिल्ली में बीजेपी और कांग्रेस ही दो प्रमुख दल थे. साल 2013 के अंतिम दिनों में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी एक तीसरी ताक़त के रूप में उभरी. पर वह नम्बर एक ताक़त नहीं थी.
साल 2015 में फिर से हुए चुनाव में वह अभूतपूर्व बहुमत के साथ सामने आई. उस विशाल बहुमत ने 'आप' के अंतर्विरोधों को इस क़दर भड़काया कि वह भीतर से टूटने लगी. यह टूटन पंजाब में भी दिखाई पड़ी.
गोते खाती 'आप' की नैया
पार्टी को विश्वास था कि वह पंजाब और गोवा में चुनाव जीतेगी और दिल्ली में एमसीडी का चुनाव भी जीत लेगी, जिससे वह राष्ट्रीय स्तर पर 'नई ताक़त' बनकर उभरेगी. 'आप' के ये अनुमान सच होते तो यह सम्भव था.
अब एमसीडी उसकी उम्मीद का आख़िरी चिराग है. चुनाव प्रचार में अरविंद केजरीवाल की कोशिशों से लगता भी यही है. सवाल यही है कि क्या वे पार्टी की नैया पार लगाने में सफल होंगे?
हाल में दिल्ली के राजौरी गार्डन विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव में पार्टी के प्रत्याशी का स्थान न केवल तीसरा रहा, बल्कि ज़मानत भी ज़ब्त हो गई.
हालांकि पार्टी ने उस हार को ज़्यादा महत्त्व नहीं दिया, पर उसके बाद एमसीडी का चुनाव बेहद महत्त्वपूर्ण हो गया है.
यदि वह चुनाव जीती तो उसके पास अस्तित्व रक्षा का मौक़ा होगा. पर हारी तो भविष्य ख़तरे में आ जाएगा क्योंकि पार्टी दिल्ली के बाहर कहीं नहीं है.
उसके 21 विधायकों के बारे में चुनाव आयोग का फैसला भी आने वाला है. हारकर यदि वह दूसरे नम्बर पर भी नहीं रही तो संकट और बड़ा हो जाएगा.
ऐसे में ईवीएम को दी गई तोहमत ज़्यादा मदद नहीं करेगी.
कांग्रेस की परीक्षा
बीजेपी और 'आप' के मुक़ाबले कांग्रेस के लिए यह परीक्षा और भी बड़ी है. हाल में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली पार्टी छोड़कर बीजेपी में चले गए.
उनके फौरन बाद बरखा सिंह गईं. कुछ और नेताओं के बारे में चर्चा गरम है.
दिल्ली को हाल के वर्षों में सजाने-सँवारने का श्रेय कांग्रेस को जाता है. साल 2013 में अचानक लगे ब्रेक के पहले शीला दीक्षित देश के सफलतम मुख्यमंत्रियों की कतार में सबसे आगे खड़ी थीं.
भौगोलिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और आर्थिक हर लिहाज़ से दिल्ली ख़ुशहाल राज्य है, जहाँ समस्याएं अपेक्षाकृत कम हैं.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को सफलता मिलने के पीछे साल 2011 के बाद शुरू हुआ आंदोलन था, जिसका दायरा राष्ट्रीय था, स्थानीय नहीं. चूंकि वह आंदोलन दिल्ली की जमीन पर चला, इसलिए उसकी शिकार सबसे पहले दिल्ली सरकार बनी.
सवाल है कि यदि अब 'आप' का पराभव होगा, तो क्या कांग्रेस की वापसी भी होगी?
भाजपा की रणनीति
सबसे बड़ा सवाल यह है कि एमसीडी में लम्बे अरसे से राज कर रही बीजेपी 'एंटी इनकम्बैंसी' से कैसे बचेगी?
पिछले नवम्बर में जब बीजेपी ने सतीश उपाध्याय की जगह मनोज तिवारी को पार्टी अध्यक्ष बनाया तो उसकी रणनीति समझ में आने लगी.
मनोज तिवारी ने घोषणा की कि पार्टी अपने किसी भी पुराने पार्षद को टिकट नहीं देगी. यानी अकुशलता का सारा ठीकरा पार्षदों के सिर पर फोड़ दिया गया.
पार्टी 'नएपन' का एहसास करा रही है. नरेंद्र मोदी जिस नए उत्साह को लेकर सामने आए हैं, वह अभी कायम है.
इसलिए दिल्ली का चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा गया है. क्या पार्टी इस रणनीति में सफल होगी?
सफल हुई तो इसका पहला संदेश इस साल के अंत में होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधान सभा चुनाव में जाएगा. जैसे टी-20 क्रिकेट में 'मूमेंटम' बनता या बिगड़ता है, वैसा ही माहौल है.
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