You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
रोज़गारबंदी भी लेकर आई है शराबबंदी
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिंदीडॉटकॉम के लिए
"पैसे की कमी के कारण मुझे बेटे का नाम इंजीनियरिंग कॉलेज से कटवाना पड़ा. मैं ही नहीं सारे मज़दूर तंग हैं. सरकार ने फ़ैसला लेने से पहले मज़दूरों के बारे में थोड़ा भी सोचने की कोशिश नहीं की."
बीयर कंपनी में कामगर रमेश वर्मा के ये शब्द बिहार में शराबबंदी से बेरोज़गार हुए हज़ारों मज़दूरों को हो रही परेशानियों की झलक दिखाते हैं.
पटना स्थित बीयर निर्माता मॉल्सन कुअर्स कोबरा (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड में बिहार में बीते साल हुई शराबबंदी के बाद से काम बंद है और यहां के मज़दूर परेशान हाल हैं.
बिहार सरकार ने इस साल एक अप्रैल से ऐसे 21 उद्योगों का लाइसेंस रिन्यू नहीं किया है जो शराब, बीयर या स्पिरिट बनाते थे.
मॉल्सन कुअर्स कंपनी में काम करने वाले अमरदीप कुमार शराबबंदी का समर्थन करते हैं. लेकिन वे यह भी कहते हैं, "बच्चों की स्कूल फ़ीस देना मुश्किल हो रहा है. बेरोजगारी का बहुत दबाव हम पर पड़ रहा है. ज़हर खाकर मरने और आत्मदाह करने जैसे ख्याल भी मन में आते हैं."
नीतीश सरकार ने 2016 में शराबबंदी के फ़ैसले के समय साफ़-साफ़ कहा था कि शराब, बीयर या स्पिरिट प्लांट सूबे में अपना उत्पादन जारी रख सकते हैं. इनमें से ज़्यादातर ने बिहार में शराबबंदी के बाद उत्पादन जारी भी रखा.
लेकिन नीतीश कुमार के इस फ़ैसले की यह कहते हुए आलोचना होने लगी कि वह जब पूरे देश में शराबबंदी की मांग कर रहे हैं तो फिर उन्होंने अपने यहां शराब बनने की अनुमति क्यों दे रखी है?
इस लगातार आलोचना के बाद इस साल 17 जनवरी को बिहार कैबिनेट ने 1 अप्रैल, 2017 से राज्य में ऐसी इकाइयों के लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं करने का फ़ैसला किया था.
इनमें यूनाइटेड ब्रेवरीज़ और कॉल्सबर्ग इंडिया जैसी बड़ी कंपनियों की इकाइयां शामिल हैं.
इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस की बिहार इकाई के अध्यक्ष चंद्र प्रकाश सिंह के मुताबिक़, सरकार के फैसले से छह हज़ार से अधिक मज़दूर तो सीधे तौर से बेरोज़गार हो गए हैं.
वे मांग करते हैं, ''सरकार को इनके वैकल्पिक रोज़गार का इंतजाम करना चाहिए. और उद्योगों के बंद होने की स्थिति में कोई मुआवज़े का निर्धारण अगर होता है तो मज़दूरों को भी उसमें हिस्सेदार बनाया जाना चाहिए.''
दूसरी ओर इनमें से चार डिस्टिलरी प्लांट तो ऐसे हैं जिन्होंने सिर्फ़ एक साल पहले बड़े निवेश के बाद काम करना शुरू किया था.
डिस्टिलरी प्लांट्स ने सरकार के फ़ैसले को पटना हाइकोर्ट में चुनौती भी दी है.
इनके वकील सत्यवीर भारती कहते हैं, "2015 में शराबबंदी की नीति तैयार करते हुए सरकार ने कहा था कि इन कंपनियों के निवेश के हितों का ध्यान रखा जाएगा. इसके बाद सरकार ने इनकी एक्सपोर्ट ड्यूटी भी माफ़ करने का फ़ैसला किया. लेकिन फिर अचानक लाइसेंस रिन्यू नहीं करने का फ़ैसला हैरान करने वाला है."
सत्यवरी के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने बार-बार अपने फ़ैसलों में दोहराया है कि राज्य सरकार इंडस्ट्रियल अल्कोहल के उत्पादन पर रोक नहीं लगा सकती है.
ग़ौरतलब है कि डिस्टिलरी प्लांट्स में इसी इंडस्ट्रियल अल्कोहल का उत्पादन होता है.
सरकार ने इस फ़ैसले से न केवल सैकड़ों बेरोज़गार हुए हैं बल्कि निवेशकों का मानना है कि सूबे के औद्योगिक निवेश के माहौल पर भी नकारात्मक असर पड़ा है.
बंद पड़ी एक शराब कंपनी के मालिक ने बताया, "सरकार के जनवरी के फ़ैसले से निवेशकों में ग़लत संदेश गया है. क़रीब एक हजार करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बना रही एक बड़ी सीमेंट कंपनी ने अपने हाथ खींच लिए हैं.''
राम लाल खेतान बिहार इंडस्ट्रीज एसोसियेशन के अध्यक्ष हैं. बिहार की औद्योगिक नीतियां तैयार करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही है.
वे इससे इत्तेफाक नहीं रखते, ''जो निवेशक आने वाले हैं उनके ऊपर भी इस फ़ैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा. और जो इस कारोबार में थे सरकार उन्हें दूसरे उद्योग-धंधे लगाने में हर क्षेत्र में मदद करने को तैयार है.''
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)