क्या शराबबंदी के लिए अभी तैयार नहीं है बिहार?

    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

पटना के कंकड़बाग इलाके में केंद्रीय विद्यालय की चारदीवारी के पास की झोपड़ी में रहने वाली खतीजा ख़ातून शराबबंदी से बेहद ख़ुश हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''पहले लोग दारू पीता था. पियांक होता था. केकरो मार दिया, केकरो पीट दिया. अब शांति है. घरो भी, बाहरो भी.''

वहीं नाला रोड की गीता देवी कहती हैं, ''लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौच कुछ नहीं होता है अब. जो दू पैसा कमा के लाता है, वह खिलाता-पिलाता है. अब शांति है.''

आज बिहार में शराबबंदी लागू हुए एक साल पूरे हो गए. सूबे में एक अप्रैल, 2016 को शराबबंदी के पहले चरण की शुरुआत हुई थी. इसके पांचवें दिन ही अचानक सूबे में पूर्ण शराबबंदी की घोषणा कर दी गई थी.

महिला संगठन और आम लोग सरकार के इस दावे से सहमत हैं कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा कम हुई है. पारिवारिक-सामाजिक माहौल भी बेहतर हुआ है.

मीनू तिवारी अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला असोसिएशन यानी एपवा की राष्ट्रीय महासचिव हैं.

वो कहती हैं, ''कुछ गांवों की महिलाओं ने हमें बताया कि शाम के समय सार्वजनिक जगहों पर जो हंगामा होता था, वह शराबबंदी के शुरुआती दौर में कम हो गया था.''

लेकिन सरकार के ही दूसरे आंकड़े कुछ अलग कहानी बयां करते हैं.

बीते साल भर में शराबबंदी क़ानून के तहत 43,000 से अधिक लोग जेल भेजे जा चुके हैं. जेल भेजे गए इन लोगों में से हज़ारों ज़मानत पर रिहा भी हुए हैं.

शराबबंदी के बाद अब तक सवा दो लाख लीटर से अधिक देसी और करीब साढ़े चार लाख लीटर विदेशी शराब ज़ब्त की गई है.

समाजशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता मानते रहे हैं कि शराबबंदी या नशामुक्ति प्रशासनिक से ज़्यादा सामाजिक मुद्दा है.

बिहार में शराबबंदी के लिए समाज को तैयार करना इस कारण भी ज़रूरी है कि यह चारों ओर से ऐसे राज्यों और देश से घिरा है, जहां शराबबंदी नहीं है.

ऐसे में क्या ये गिरफ़्तारियां इस ओर भी इशारा करती हैं कि समाज को शराबबंदी के लिए पूरी तरह जागरूक किए बगैर ही सूबे में शराब पर रोक लगा दी गई?

सरकारी महकमा जन शिक्षा निदेशालय ने शराबबंदी लागू होने से पहले करीब तीन महीनों तक सघन अभियान चलाया था.

इस कड़ी में बिहार सरकार की पहल पर शराबबंदी के समर्थन में इस साल जनवरी में दुनिया की सबसे बड़ी मानव श्रृंखला बनाने का दावा किया गया.

मीनू तिवारी कहती हैं, ''मानव जंजीर बना देने से समाज में जागरूकता नहीं आएगी. रोज़गार के पर्याप्त मौके पैदा किए बग़ैर, खेल-कूद को बढ़ावा दिए बिना, सांस्कृतिक और मनोरंजक केंद्रों का इंतजाम किए बग़ैर यह जागरण नहीं लाया जा सकता.''

मीनू के मुताबिक़, सरकार जागरुकता पैदा करने करने के बजाय लोगों को डरा कर शराब बंद करवाना चाह रही है.

शराबबंदी क़ानून के कुछ प्रावधान महिला विरोधी भी हैं, मसलन, घर में शराब मिलने पर महिलाओं की भी गिरफ़्तारी हो सकती है.

वहीं समाजशास्त्री और एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व निदेशक डॉ डीएम दिवाकर का मानना है कि बिहार के शराबबंदी के फ़ैसले से समाज, राज्य और देश में अच्छा संदेश गया है.

शराबबंदी के तहत हुई हज़ारों लोगों की गिरफ़्तारी पर उनका कहना है कि ये गिरफ़्तारियां डर पैदा कर शराबबंदी लागू करने का एक तरीक़ा हो सकती है. लेकिन वास्तविक तरीका लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना ही है.

दिवाकर कहते हैं, ''शराबबंदी के बाद समाज से अधिक सहयोग मिला है, समाज की तैयारी भी है. सरकार मजबूती दिखाए तो यह बिहार ही नहीं, सूबे के बाहर भी कई राज्यों में प्रभावी हो सकता है.''

शराबबंदी का दूसरा पहलू यह है कि इससे सरकार को सैकड़ों करोड़ रुपए के राजस्व का नुक़सान भी हुआ है. इस संबंध में दिवाकर दो बिल्कुल अलग पक्ष सामने रखते हैं.

पहला यह कि जो क़रीब आठ हज़ार करोड़ का नुक़सान हुआ है, वह समाज को हुए फ़ायदे के सामने बेमानी है.

सीएजी रिपोर्ट कर हवाला देते हुए वे दूसरी बात यह कहते है कि समाज के विकास के लिए हमारे पास जो साधन है बिहार सरकार उसे ही पूरी तरह खर्च नहीं कर पा रही है.

सरकार के आंकड़े हैं कि पंचायत को मिली 66 फ़ीसद राशि खर्च ही नहीं हुई.

दिवाकर कहते हैं, ''बिहार में शराबबंदी से राजस्व की हानि से बड़ा मुद्दा उपलब्ध राजस्व के गुणात्मक इस्तेमाल का है.''

शराबबंदी के एक साल के सामाजिक-आर्थिक असर पर सत्तारूढ़ जदयू के प्रवक्ता नीरज कुमार का कहना है, ''राजस्व की क्षति हुई, राज्य के खजाने को पांच हज़ार करोड़ का नुक़सान हुआ है तो सरकार का अनुमान है आम लोगों के जेब में 10 हज़ार करोड़ गए हैं.''

वहीं जागरूकता के सवाल पर वे कहते हैं, ''शराबबंदी को लेकर जागरूकता केवल सरकार के भरोसे नहीं लाई जा सकती. तमाम राजनीतिक दलों, महिला संगठनों, सिविल सोसायटी को अपनी पूरी सांगठनिक ताक़त से इसमें अहम भूमिका निभानी होगी.''

इस साल जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शराबबंदी के फ़ैसले के लिए सार्वजनिक रुप से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरीफ़ की थी.

इस तारीफ़ के बहाने नीरज मांग करते हैं, ''भाजपा शासित हमारे पड़ोसी राज्य अगर शराबबंदी लागू कर दें तो शराबबंदी और प्रभावी ढंग से लागू हो पाएगा.'

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)