इन औरतों के डर से नशा हो जाता है हिरन!

    • Author, राजेश डोबरियाल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

देहरादून के एक गांव में कुछ महिलाओं के नशे के खिलाफ़ अभियान ने कई ज़िंदगियां और परिवार बचाए हैं और दो साल से आलोचना झेलने के बावजूद उनका संघर्ष जारी है.

दो साल पहले डोईवाला के गांव तेलीवाला के ज़्यादातर आदमी नशे की गिरफ़्त में थे और इसमें फंस कर ज़्यादातर नशे का कारोबार भी करने लगे थे.

ज़ाहिरा भी उन औरतों में से एक थीं, जिनके पति स्मैक पीते थे, बेचते थे और घर आकर मारपीट करते थे.

उनके घर में खाने तक के लाले पड़ रहे थे. चार बच्चों की मां ज़ाहिरा का बड़ा बेटा अपने अब्बू की हरकतें देखकर इतना नाराज़ हुआ कि दो बार घर से भाग गया.

आखिर ज़ाहिरा को विरोध में खड़ा होना पड़ा. उन्होंने पहले तो अपने पति गुलाम नबी को समझाया, मारपीट की और जब वह नहीं माना तो पुलिस में शिकायत कर दी.

डेढ़ साल पहले जेल काटने के बाद जब गुलाम नबी बाहर आए तो वह नशा छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहे थे. इसके बाद उनका इलाज करवाया गया और अब गुलाम नबी घर की आजीविका में मदद करते हैं.

ज़ाहिरा बताती हैं कि उनके पति समेत चारों भाई नशे की गिरफ़्त में थे और घर का माहौल ज़हन्नुम से भी बदतर था.

उन्होंने अपने जेठ को भी जेल भिजवाया और फिर परिवार ने उनका इलाज करवाया ताकि वह नशे से दूर रह सकें अब वह भी नौकरी कर रहे हैं और कुछ कमाकर घर में दे रहे हैं.

उनके देवर ने तो भाभी की ज़िद देखकर जेल जाए बिना ही नशा छोड़ दिया.

लेकिन पुलिस और समाज के सहयोग न करने के चलते धीरे-धीरे ये अभियान ठंडा पड़ गया था.

एक साल पहले एएसपी के रूप में तृप्ति भट्ट डोईवाला पहुंचीं तो उन्हें पता चला कि तेलीवाला गांव नशे के कारोबार के लिए बहुत बदनाम है.

अब देहरादून में एसपी क्राइम तृप्ति भट्ट बताती हैं, "दरअसल तेलीवाला और इसके आस-पास के गांव नशे का बड़ा केंद्र बन गए थे. पहाड़ों तक में तेलीवाला से चरस और स्मैक सप्लाई की जा रही है. यहां ये एक तरह का कुटीर उद्योग बन गया था."

तृप्ति भट्ट को ये भी पता चला कि पहले कुछ महिलाएं नशे के ख़िलाफ़ अभियान चला चुकी थीं लेकिन फिर वह बंद हो गया.

इसके बाद उन्होंने स्थानीय महिलाओं से बात की और उन्हें नशे के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्होंने महिलाओं के समूह को एक नाम भी दिया 'वादा' (वीमेन अगेंस्ट ड्रग्स एडिक्शन).

ज़ाहिरा इसकी सबसे पहली और सक्रिय सदस्य बनीं. बाद में उनके साथ और भी महिलाएं जुड़ीं. जिनके घर नशे की वजह से बर्बाद हो रहे थे, हनीफ़ा भी उन्हीं में से एक थीं.

हनीफ़ा ने अपने सगे दो भतीजों, दो दामादों को गिरफ़्तार करवाया.

रंगे हाथों पकड़वाने के लिए ये महिलाएं भूखी-प्यासी घंटों तक छुपकर नशेड़ियों पर निगाह रखतीं और जैसे ही वह नशा करना शुरू करते ये पुलिस को ख़बर कर देतीं.

पुलिस ने तेलीवाला के अलावा और भी कई गांवों में, कस्बों में 'वादा' प्रोग्राम शुरू किया. इससे जुड़ी महिलाओं को आई कार्ड जारी किए गए ताकि उनमें आत्मविश्वास आए और वो ऐतराज़ करने वालों को जवाब देने की स्थिति में रहें.

तेलीवाला में ये अभियान सबसे ज़्यादा सफल रहा.

तृप्ति भट्ट बताती हैं कि यूं तो ये महिलाएं सीधी-सपाट गांव की औरत दिखती हैं लेकिन बहुत अच्छी मोटीवेटर हैं. देहरादून की एक कॉलेज छात्रा, जो नशे से पूरी तरह बर्बाद हो रही थी और शहर के लोगों ने भी उसे समझाने में हाथ खड़े कर दिए थे.

फिर उन्हें ज़ाहिरा से बात करने की सलाह दी गई और फिर कुछ समय वह लड़की ज़ाहिरा के घर रही और आज वह नशा मुक्त है.

ज़ाहिरा कहती हैं, "मैडम ने हमारा पूरा साथ दिया. जब भी हमने शिकायत की तुरंत पुलिस आ गई और नशेड़ी को गिरफ़्तार कर लिया."

वादा की सदस्यों ने न सिर्फ़ अपने परिजनों का नशा छुड़वाने के लिए अभियान चलाए बल्कि नशे का कारोबार करने वाले अन्य लोगों को भी पकड़वाया. इनमें करीब दो दशक से सक्रिय क्षेत्र का बड़ा ड्रग्स माफ़िया ताजुद्दीन भी शामिल था.

वादा की सदस्यों के परिवारों में सुकून और ख़ुशी तो लौटी लेकिन उन्हें इसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ी.

इन महिलाओं को सरेआम गालियां दी गईं, बदनाम किया गया और तो और मार-पिटाई का भी सामना करना पड़ा.

लेकिन हनीफ़ा कहती हैं, "हम पीछे नहीं हटे जी. डंडे खाए तो मारे भी. बस सोच लिया था कि इस बीमारी को ख़त्म करना है."

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