नज़रिया- 'योगी आदित्यनाथ को ख़ास इमेज में क़ैद रखने की कोशिश'

    • Author, मधु किश्वर
    • पदनाम, प्रोफ़ेसर और लेखिका

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में मीडिया में इतनी बातें होने से एक फ़ायदा यह हुआ कि पत्रकार गोरखपुर जाकर यह देखने लगे कि वाकई में गोरखनाथ राक्षसों का अड्डा है क्या? और, जो उन लोगों ने उनके बारे में पाया है, वो एकदम उलट है.

योगी आदित्यनाथ को इतना मुस्लिम विरोधी दिखाया जा रहा है कि उनके दूसरे कामों को लोग देख ही नहीं रहे हैं.

सालों से उनके यहां लगने वाले जनता दरबार में हर जाति और धर्म के लोग अपनी समस्या लेकर आते हैं. और जायज़ शिकायत होने पर बिना किसी भेदभाव के वो उस पर सुनवाई करते हैं. निजी तौर पर उनके मुसलमानों के साथ अच्छे रिश्ते हैं.

वो ख़ुद भी एक बात कहते रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में हर कहीं दंगे हुए हैं लेकिन गोरखपुर में नहीं हुए हैं.

अवैध बूचड़खाने बंद करने के फ़ैसले की ही सिर्फ़ चारों तरफ चर्चा हो रही है, जैसे कोई दूसरा काम वो कर ही नहीं रहे हैं.

ये बूचड़खाने भी अपनी मनमर्जी से नहीं बंद किए जा रहे हैं. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश पर ये फ़ैसला लिया गया है.

जहां तक उनके दूसरे आदेशों की बात है, तो उन्होंने अपने मंत्रियों को अपनी संपत्ति का ब्यौरा 15 दिनों के अंदर लिखित में देने को कहा है.

उन्होंने एक तरह से अपने मंत्रियों और अफ़सरों पर नकेल कसी है.

इसके अलावा जो एक अहम कदम उन्होंने उठाया है, वो है सरकारी दफ्तरों में पान मसाला पर रोक लगाना. इसकी भी कोई चर्चा नहीं कर रहा है.

अच्छी बात है कि वो हर चीज़ की शुरुआत सरकारी दफ़्तरों से कर रहे हैं.

अधूरे विकास कार्य जिन पर हज़ारों करोड़ खर्च हुए हैं, उनकी भी वो समीक्षा कर रहे हैं.

24 घंटे बिजली देने का उनका वादा भी कोई छोटी-मोटा वादा नहीं है.

उत्तर प्रदेश में उद्योग-धंधे का विकास बिजली की कमी की वजह से आज तक नहीं हो पाया है.

उन्होंने ऑनलाइन भर्ती जैसे अहम कदम उठाने की भी बात कही है ताकि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता आ सके.

उन्होंने विश्वविद्यालय खोलने की बात कही है और इस बाबत और बात होनी चाहिए ताकि ये पता चले कि ये कैसे हो पाएगा.

लेकिन इतने अहम फ़ैसलों के बावजूद क्यों सिर्फ़ एंटी रोमियो स्कवॉड की ही बात की जा रही है?

इस फ़ैसले से उत्तर प्रदेश की महिलाएं ख़ुश हैं. इससे सिर्फ़ दिल्ली में बैठे कुछ बुद्धिजीवी, धर्मनिरपेक्ष और वामपंथियों के पेट में ही दर्द हो रहा है.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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