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नज़रिया: 'भारत अब भगवा युग में प्रवेश कर चुका है'
- Author, राकेश सिन्हा
- पदनाम, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विचारक
योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चुने जाने पर कई तरह की आपत्तियां उठाई गईं. इनमें से एक आपत्ति यह है कि वह कट्टर हैं और इस वजह से अल्पसंख्यकों के मन में डर पैदा होगा.
यह आपत्ति कोई नहीं है. जब भी हिन्दुत्व आंदोलन से निकला आदमी राज्य सत्ता की तरफ़ बढ़ता है तो उस पर इसी तरह की आपत्तियां उठाई जाती रही हैं.
उदाहरण के तौर पर जब अमित शाह भारतीय जनता पार्टी की अध्यक्ष बने तो उनके विकृत स्वरूप को प्रस्तुत करने की कोशिश की गई.
इसके पहले जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनने वाले थे तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर अल्पसंख्यक विरोधी और भारत की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था के ख़िलाफ़ काम करने वाले राजनेता के रूप में प्रस्तुत किया गया.
इस प्रकार की अवधारणा के पीछे एक बड़ा कारण है. वास्तव में इस देश की जो बौद्धिकता है और उसमें जो कुलीनता आई है, उसकी वजह से जनबौद्धिकता और कुलीन बौद्धिकता में एक बड़ा अंतर आ गया है.
जो जन बौद्धिकता है वह अपने ढंग से भारत की परिभाषा को देखता है, भारत की परंपरा को देखता है और वह सहज रूप से चीज़ों को स्वीकार करता है.
दूसरी तरफ़ भारत की जो प्रभावशाली बौद्धिकता है, जिसमें मार्क्सवादी हैं, नेहरूवादी हैं और पश्चिम के साथ समझ रखने वाले लोग हैं, उन्होंने एक प्रकार की ज़मींदारी स्थापित कर ली है. वो जो सोचते हैं, बोलते हैं और समझते हैं उसी को आदर्श मानते हैं. वो चाहते हैं कि मतदाता भी वैसा ही व्यवहार करे.
इसने कुलीन बौद्धिकता और जन बौद्धिकता के अंतर को बढ़ाया, लेकिन एक समानांतर नैरेटिव भी इस देश में काम कर रहा था, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का.
वो ज़मीन पर आदिवासियों के बीच में, दलितों के बीच में, मजदूर और किसानों को बीच में अपने विभिन्न संगठनों को ज़रिए काम और देश की विरासत की बात करता रहा.
परिवर्तन सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर
इसे सहज रूप में जनता स्वीकार करती रही. लेकिन मतदान के रूप में इसका असर जल्दी नहीं दिखा. जो परिवर्तन आ रहा था वो सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरों पर तो दिखाई पड़ रहा था पर राजनीतिक स्तर पर बहुत लंबे समय तक दिखाई नहीं पड़ा.
उसका कारण था कि कुलीन बौद्धिकता, राजसत्ता और पश्चिम के प्रभाव वाले बुद्धिजीवियों ने मिलकर भारत की जनबौद्धिकता को लंबे समय तक उलझन में और एक अपराधबोध में रखने का काम किया.
हिन्दुत्व आंदोलन ने उस जनबौद्धिकता को अपराधबोध और द्वंद्व से बाहर निकालने का काम किया. इसमें 2014 का सत्ता परिवर्तन एक महत्वपूर्ण अध्याय है. यह केवल भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी का सत्ता में आना नहीं है, बल्कि ये एक वैचारिक परिवर्तन है.
देश में एक नई परिभाषा आई और नया वातावरण बना. एक नए प्रकार का राजनीतिक पर्यावरण बना. बौद्धिकता उसको अब भी स्वीकार नहीं कर पा रही है और जिसे मतदाताओं ने बार-बार ख़ारिज किया है.
यहां सिर्फ़ कांग्रेस, वामपंथ और क्षेत्रीय पार्टियों को ख़ारिज नहीं किया जा रहा है बल्कि उन बौद्धिक ताक़तों को भी ख़ारिज किया जा रहा है जो देश को चलाने का दंभ भरते हैं.
योगी पर आरएसएस का ठप्पा
इसीलिए आज जब योगी आदित्यनाथ यूपी के मुख्यमंत्री बन रहे हैं तो कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं कि उनपर आरएसएस का ठप्पा है, कि वो कट्टर हिंदुत्ववादी हैं.
राज्यसत्ता पर जो पिछले 70 सालों से जमे थे उन्होंने और कुलीन बुद्धिजीवियों ने लोगों को समझाया था कि हिन्दुत्व का मतलब प्रतिक्रियावाद, सांप्रदायिकता, मंदिर निर्माण और अल्पसंख्यक विरोधी होता है.
हिन्दुत्व एक समावेशी विचारधारा है जिसे लेकर संघ और बीजेपी चल रही है. यह हमारी राष्ट्रीयता के समकक्ष है. ऐसा नहीं मानने वालों ने सिर्फ़ आदित्यनाथ ही नहीं बल्कि जिस बीडी सावरकर का स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ा योगदान था, उन्हें भी बदनाम करने का काम किया.
डॉ हेडगवार और गोलवलकर जैसे नेताओं को शैतान बताने का काम किया. मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी के साथ भी वही काम किया गया. जो भी हिन्दुत्व की ताक़तें आती हैं उन्हें राक्षसी स्वरूप में पेश कर जनता को भरमाने का किया जाता रहा है. अब वह युग ख़त्म हो गया है.
अब भारत ने नए युग में प्रवेश कर लिया है. वह युग है भगवा युग. भगवा युग का मतलब है किसी एक विचारधारा का प्रभाव नहीं बल्कि भारत की जो सहज संस्कृति और सभ्यता रही है उस आईने में भारत ख़ुद को देखना चाहता है.
पश्चिम के आईने के भारत को ख़ुद को नहीं देखना चाहता है.
योगी के मुख्यमंत्री बनने पर जो ख़ुशी की लहर है उसमें मुसलमान भी शामिल हैं. जो मुस्लिम समुदाय के लोग उनके क्षेत्र में रहते हैं उन्हें आज तक ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ कि वह भेदभाव करते हैं.
ये जो धारणाएं बनाई जाती हैं, उसमें मीडिया की बड़ी भूमिका होती है. तथ्य, व्याख्या और धारणा- ये तीन बातें होती हैं. भारतीय विमर्श में हिंदुत्व के संदर्भ में धारणाओं को सबसे आगे रखा गया है, तथ्य और व्याख्या आने तक चीजें ख़त्म हो जाती हैं.
अब लोग तथ्यों से चीज़ों का आकलन कर रहे हैं. लोगों ने जब ऐसा शुरू किया तो पाया कि भारतीय जनता पार्टी की छवि जैसी बनाई गई वो हक़ीकत नहीं है. अल्पसंख्यकवाद के पिंजरे में देश की आत्मा को क़ैद कर दिया गया था.
पंथनिरपेक्षता का मतलब
पंथनिरपेक्षता मतलब होता था कि आप कितनी बार मुस्लिम शब्द का उच्चारण करते हैं, उनके हित की बात करते हैं. देश को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों में बांटा गया था. ये यहां की परम्परा नहीं थी, ये बात अंग्रेज़ों ने डाली थी.
संघ का जो नैरेटिव है वह इन नकारात्मक चीजों को तोड़ने वाला है. जबिक संघ को ही इन विकृतियों का पर्याय बनाने की कोशिश होती रही. अवैद्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से दो बातें साफ हो गईं.
पहली, अपराधबोध की राजनीति नहीं हो सकती. दूसरे, इस देश में एक समुदाय का वीटो पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र को वीटो नहीं कर सकता. सामुदायिक वीटो की राजनीति अंग्रेज़ों ने शुरू की और भाजपा ने 2014 के बाद ख़त्म कर दिया है.
अब मुस्लिम समुदाय के बीच भी आत्मलोचना का दौर शुरू हो गया है. इसीलिए तो मुस्लिम महिलाएं अपने समुदाय के नेताओं और छद्म धर्मनिरपेक्ष नेताओं को दरकिनार कर न केवल बीजेपी को वोट दे रही हैं बल्कि उसके उठाए जा रहे मुद्दों के साथ खड़ी हो रही हैं.
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बारे में कुछ बातें स्पष्ट होनी चाहिए. वो ईमानदार छवि और दबंग व्यक्तित्व वाले हैं. इसका प्रशासन पर ज़रूर असर होगा.
दूसरे, बिहार के उलट यूपी में सामाजिक आंदोलन के चलते सामंतवाद हाशिए पर चला गया था, वहां कुछ ऐसे हैं जो जातियों के नाम पर समाज पर नियंत्र करना चाहते हैं.
ऐसे लोगों को समाप्त करना और विकास की ओर ले जाना आसान हो जाएगा.
1950 के दशक में देश की जीडीपी में राज्य का हिस्सा 60 प्रतिशत हुआ करता था जो अब 7 प्रतिशत तक रह गया है.
योगी आदित्यनाथ के सामने प्रदेश की जीडीपी को ऊंचे स्तर तक ले जाने और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने को लेकर उनके समने अवसर भी है और चुनौती भी है.