You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
यूपी चुनाव: जाट वोटर्स को लेकर धोखे में रहे अजित सिंह?
- Author, प्रशांत चाहल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2017 में चौधरी अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का प्रदर्शन इतना ख़राब रहा है कि कई राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी का 'अंत' मान रहे हैं.
उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र में राष्ट्रीय लोकदल अपनी मजबूत पकड़ होने का दावा करती रही है. चुनाव से पहले इसी दावे के साथ पार्टी ने यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से 284 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. लेकिन पार्टी महज़ एक, ज़िला बागपत की छपरौली विधानसभा सीट पर ही जीत हासिल कर पाई.
अधिकांश जाट मतदाताओं वाली छपरौली सीट, चौधरी चरण सिंह और उनके बाद अजित सिंह की भी विधानसभा सीट रही है.
समूचे पश्चिमी उत्तरप्रदेश को छोड़ भी दें, तो ख़ास 'जाटलैंड' कही जाने वाली बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली और बुढाना जैसी सीटों पर भी राष्ट्रीय लोकदल को सफलता नहीं मिली.
तो क्या यह समझा जाए कि जाटों ने ही अजित सिंह की पार्टी को नकार दिया है?
इसके जवाब में वरिष्ठ पत्रकार पूर्णिमा जोशी कहती हैं, "रालोद को करीब साढ़े 15 लाख वोट मिले हैं. कुल वोट शेयर का यह 1.8% है. जबकि 2012 में यह आंकड़ा 2.33% पर था और रालोद को यूपी में 9 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी. मुझे लगता है कि इस बार रालोद को जो भी वोट मिला है, वो सिर्फ़ जाटों का ही वोट है. बड़ी बात यह है कि रालोद का 'किसान वोट', जिसमें जाट के साथ-साथ मुसलमानों का भी वोट शामिल था, उनके साथ नहीं दिखता है."
'कभी गोलबंद हुए ही नहीं जाट'
कुछ जानकारों का मानना है कि इस चुनाव में जाट कभी गोलबंद हुए ही नहीं थे. इस बारे में 'द हिंदू' अख़बार की पॉलिटिकल एडिटर स्मिता गुप्ता ने बताया कि जनवरी में अपने पहले चुनावी कवरेज दौरे पर उन्होंने महसूस किया था कि मुजफ्फरनगर दंगों का प्रभाव जिन गांवों पर था, वहां सभी जाट 'पहले हिंदू' वोटर के तौर पर बात कर रहे थे और बीजेपी के समर्थन में थे.
जबकि दंगों के प्रभाव से दूर गांवों में जाट वोटर गन्ना मूल्य और आरक्षण जैसे मुद्दों पर बात कर रहे थे.
फ़रवरी में आई जाटों की गोलबंदी की ख़बरों ने स्मिता को हैरान किया. वो कहती हैं, "जाट पूरी तरह से बीजेपी के ख़िलाफ एकजुट हो रहे हैं, ऐसी ख़बरें हैरान करने वाली थीं. जबकि हम यह देख पा रहे थे कि योगी आदित्यनाथ जैसे बीजेपी प्रचारक, जिन्हें कभी पूर्वी उत्तरप्रदेश से बाहर पार्टी प्रचार के लिए नहीं भेजा गया था, उनका प्रचार ख़ासतौर पर पश्चिमी यूपी में काम कर रहा था और जाट उन्हें सुनने पहुंच रहे थे."
वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेशन अपना अनुभव बताती हैं कि चुनाव प्रचार की शुरुआत से ही जाटलैंड के मुसलमानों का 'इमोशनल रिस्पॉन्स' था कि वो सपा को वोट देंगे. दलित अपने मत को लेकर शांत थे. रोड, त्यागी, खटिक और बनिया समुदाय के लोग बीजेपी को खुलकर समर्थन देने की बात कर रहे थे और जाट इनसे अलग नहीं थे. फिर जाटों की गोलबंदी की ख़बर आई तो जाट आरक्षण संघर्ष समिति के यशपाल मलिक और पुष्पेंद्र चौधरी ने गांवों में बीजेपी के ख़िलाफ प्रचार शुरू किया. लेकिन इसका कोई असर चुनाव के नतीजों पर नहीं दिखा.
'जाटों को नहीं चाहिए था कोई मुस्लिम प्रत्याशी'
कुछ विश्वस्त सूत्रों का हवाला देकर राधिका रामासेशन बताती हैं कि एक बार को माहौल बना था कि हरियाणा में जाटों के साथ हुए दुर्व्यवहार को लेकर बीजेपी से जाट ख़फा हैं. लेकिन फिर यह भी सुनने में आया कि जाटों ने अपने गांवों में कसमें खिलाईं कि जाटलैंड से कोई मुस्लिम प्रत्याशी जीतकर नहीं जाने देना है.
जाटों की शिकायत थी कि थानों में उनकी सुनवाई नहीं होती और उनकी पैरोकारी करने वाला कोई नेता भी उन्हें नहीं मिलता. इसी समय पीएम नरेंद्र मोदी का यह बयान भी आया कि 'यूपी के थाने समाजवादी पार्टी का 'एक्सटेंशन' है, जहां सभी की सुनवाई नहीं होती.'
एक अनुमान के तहत, करीब 40 फ़ीसद जाटों ने बीजेपी को वोट दिया है. इसे माना जाए, तो जाट वोटों की यह संख्या रालोद के जाट वोट से ज्यादा नहीं, तो कम भी नहीं बैठती है.
हरियाणा के जाटों का असर
क्या जाटों के साथ हरियाणा में बीजेपी सरकार द्वारा किए गए कथित दुर्व्यवहार का यूपी में कोई असर नहीं पड़ा?
इस सवाल के जवाब में, बीते तीन महीने से पश्चिमी यूपी में बीजेपी के ख़िलाफ प्रचार कर रहे हरियाणा के देव लोहान बताते हैं, "जाटों में एक राजनीतिक छटपटाहट थी. ज्यादातर लोगों ने कहा कि उन्हें नेतृत्व चाहिए. लेकिन उनके मौजूदा नेता, जो जाटों को पारिवारिक सम्पति समझते आए हैं, जाटो ने उन्हें नकार दिया. इसी वजह से अपनी जाट पहचान खोकर उन्होंने 'हिन्दू' तमगा अपने ऊपर लगा लिया."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)