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नज़रिया- सपा में पारिवारिक कलह का अब नया दौर
- Author, शरद गुप्ता
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद समाजवादी पार्टी पर संकट के बादल फिर गहराने लगे हैं. अखिलेश यादव के ख़िलाफ़ एक बार फिर मोर्चा खुल गया है.
अखिलेश को कांग्रेस के साथ गठबंधन कर पार्टी को गर्त में ले जाने का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. क्या यह माना जा सकता है कि इस हार के बाद सपा ने टूट की ओर एक और क़दम बढ़ा दिया है?
खुद शिवपाल सिंह यादव ने अखिलेश के घमंड को पार्टी की हार की मुख्य वजह बताया है. इससे पहले अखिलेश की सौतेली मां साधना यादव भी पारिवारिक कलह के लिए अखिलेश को जिम्मेदार ठहरा चुकी हैं.
उन्होंने अपने बेटे प्रतीक के लिए राज्यसभा की सीट भी मांगी है.
अखिलेश को इन चुनौतियों से पार पाना होगा. वहीं, पार्टी के महासचिव डॉ. सीपी राय ने भी एक टीवी प्रोग्राम में हार का ठीकरा अखिलेश के सिर फोड़ दिया.
शिवपाल खेमे का दावा है कि विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश ने जानबूझकर उनके और मुलायम सिंह के करीबी लोगों के टिकट काट दिए. इनमें मुलायम सिंह यादव के साले प्रमोद गुप्ता और सांसद तेज़ प्रताप यादव के नाना, अंबिका चौधरी, विश्वभर निषाद और रघुराज सिंह शाक्य जैसे करीब एक दर्जन लोग हैं. अखिलेश नहीं चाहते थे कि परिवार या पार्टी में उनका ऐसा कोई प्रतिद्वंद्वी पैदा हो जो उन्हें चुनौती दे सके.
डॉक्टर सीपी राय का यह भी आरोप है कि ये सारे टिकट राम गोपाल यादव के कहने पर काटे गए. एक अन्य वरिष्ठ सपा नेता का आरोप है कि अपने बेटे अक्षय यादव का राजनीतिक कद बढाने के लिए ही उन्होंने परिवार के कई लोगों के टिकट कटवा दिए.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ब्रजेश शुक्ल कहते हैं कि मुलायम की छोटी पुत्रवधू अपर्णा यादव के हारने की एक वजह पार्टी की अंदरूनी फूट रही. अधिकतर कार्यकर्ता लखनऊ कैंट से लड़ रही अपर्णा के बजाए पास की सरोजिनीनगर सीट से लड़ रहे मुख्यमंत्री अखिलेश के सलाहकार और चचेरे भाई अनुराग यादव के प्रचार में जुटे रहे.
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण शुक्ल के मुताबिक अपर्णा ने अपने पति प्रतीक के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं के असहयोग की शिकायत अखिलेश तक भिजवाई थी लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. हाँ, अखिलेश और डिंपल ने अपर्णा के लिए रैली जरूर संबोधित की लेकिन कार्यकर्ता उसके बाद भी अपर्णा के प्रचार से कन्नी ही काटते रहे.
इस हार के सदमे से बचते हुए पार्टी में अपना प्रभुत्व कायम करना भी एक महत्वपूर्ण काम है. फिलहाल समाजवादी पार्टी के संगठन में ऊपर से नीचे तक वही लोग मौजूद हैं जिन्हें मुलायम सिंह यादव और शिवपाल सिंह यादव ने नियुक्त किया था. पार्टी में असंतोष पर काबू पाते हुए महत्वपूर्ण पदों पर अपने लोगों को कैसे लाया जाए, यह सुनिश्चित करना अखिलेश के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा.
जिन लोगों को अखिलेश अपने पदों से हटाएंगे, उनमें असंतोष व्याप्त होना स्वाभाविक है और इस असंतोष को शिवपाल और उनके करीबी लोग हवा दे सकते हैं. देखना यह है अखिलेश इस चुनौती से कैसे पार पाते हैं? क्या समाजवादी पार्टी अपना अस्तित्व कायम रख पाएगी या इसमें भारी टूट होगी?
इस बारे में बडी भूमिका मुलायम सिंह यादव की होगी. उन्होंने शिवपाल, अपर्णा जैसे एक दो लोगों को छोड़कर किसी के चुनाव प्रचार में हिस्सा नहीं लिया. जिन्होंने रैली संबोधित करने कि लिए बुलाया वहां भी नहीं गए. संभवत: वे अखिलेश द्वारा पार्टी पर क़ब्ज़ा किए जाने का अपमान भूल नहीं पा रहे हैं. यदि वे सपा छोड़ने वाले असंतुष्टों का साथ देते हैं तो अखिलेश से नाराज सारे नेता उनके नेतृत्व में नई पार्टी बना सकते हैं.
अखिलेश के सामने विधानसभा में नेता विपक्ष का चुनाव करना भी एक चुनौती है. वे विधान परिषद के सदस्य हैं, इसलिए उन्हें चुने हुए 55 विधायकों में से ही किसी एक को विधानसभा में नेता विपक्ष का पद देना होगा. इस पद के लिए शिवपाल सिंह यादव स्वाभाविक दावेदार होंगे लेकिन अखिलेश क्या यह ख़तरा उठाएंगे? सूत्र बताते हैं कि उनकी पसंद आज़म खान हो सकते हैं लेकिन ऐसे में ऐसे में शिवपाल सिंह यादव की बगावत की आशंका को नकारा नहीं जा सकता.
दूसरा रास्ता है कि वह 55 विधायकों में से किसी को इस्तीफा देने के लिए कहें और उसकी जगह खुद चुन कर आएं, लेकिन इस मोदी लहर में क्या वह सफल हो पाएंगे? और यदि वे जीतने में सफल नहीं हुए तो उनके खिलाफ बगावत और तेज़ कर उन्हें और अधिक कमजोर बनाने की कोशिश की जाएगी.
वहीं, अखिलेश के पास एक सशक्त विपक्ष का विकल्प प्रस्तुत करने का अच्छा मौका है क्योंकि माना जा रहा है कि 19 सीटें लेने वाली मायावती बहुत ही खराब स्थिति में है. महादलित और अति-पिछड़ी जातियों द्वारा बीएसपी से पल्ला झाड़ लेने से ही उनकी यह हालत हुई है.
कांग्रेस की हालत भी कुछ अच्छी नहीं है. संभव है कि भाजपा उसके विधायकों को तोड़ ले या फिर उनमें से आधे सत्ता का सुख लेने के लिए ख़ुद अपना अलग दल बना लें.
अखिलेश युवा हैं. उनके राजनीतिक सफर में पांच साल पहले मुख्यमंत्री बनने के साथ एक बड़ा मोड़ आया था. हार भी, एक नया मोड़ माना जा सकता है.
बस उन्हें अगले पांच साल अपने कुनबे को (पारिवारिक और राजनीतिक) बचाए रखना होगा, क्योंकि भाजपा का वे ही सशक्त तरीके से मुक़ाबला कर सकते हैं, विधानसभा में और सड़कों पर भी.
याद रखना चाहिए कि साल 2012 में सपा की जीत का बड़ा श्रेय अखिलेश के युवा नेतृत्व, साफ विकासोन्मुख छवि और कड़ी मेहनत को जाता है.