नज़रिया: क्या यूपी चुनाव में बीजेपी वाकई फ़ायदे में है?

    • Author, संजीव श्रीवास्तव
    • पदनाम, संस्थापक संपादक, एडिट प्लैटर डॉट कॉम

सूरज की पहली किरण के निकलते ही खांटी दूध वाली चाय की चुस्की, देसी घी में तली पूड़ी-कचौड़ी और आलू-सब्ज़ी की ख़ुशबू, घाटों पर देवी-देवताओं के श्लोक और कल-कल करती गंगा की अविरल धारा.

यही तो पहचान है धर्मनगरी काशी की. हज़ारों मंदिरों के इस शहर में बड़ी-बड़ी गाड़ियों का शोर, हवा में कुलांचे भरते हेलीकॉप्टर और जगह-जगह बने ऊंचे मंचों ने यहां लोगों की व्यस्तता को और बढ़ा दिया है.

कहते हैं यूपी के कण-कण में सियासत भरी है लोगों के रगों में तो सियासी बहसें लहू बनकर दौड़ती हैं.

मौका भी है, दस्तूर भी है और मिज़ाज भी. शहर में थोड़ा घूमने निकल जाइए तो पता चल जाएगा कि हर गली, हर नुक्कड़ और हर चौक-चौराहे पर लोगों का कम से कम एक समूह तो बनारसी पान की मिठास के बीच राजनीतिक बहस में डूबा हुआ है और यह बहस कभी-कभी तो इस पान के मिठास को थोड़ा कड़वा भी बना देता है.

राजनीतिक मिज़ाज वाला प्रदेश

बहरहाल अभी ऐसा लगता है कि जिस तरह बनारस की एक पहचान देवों के देव महादेव से है, उस तरह इसकी एक पहचान सियासी बतकही भी बन गई हो.

सच ही तो है क्योंकि यह वो जमीं है जहां राजनीतिक चर्चा शुरू तो होती है छोटे दलों या नेताओं से पर वो जाती है दूर तलक या कहें कि डोनल्ड ट्रंप तक.

यूपी के राजनीतिक मिज़ाज को समझने और अपनी राजनीतिक परख को बढ़ाने का इससे बेहतरीन मौका शायद ही कभी मिले.

सपा का आंतरिक कलह और संभावनाएँ

इन पांच दिनों में शुरुआत लखनऊ से हुई फिर पहुंचे गोरखपुर और वहां से जब बनारस आए तो मालूम पड़ा कि इस बार यूपी अपने सियासतदां को विकास और अपनेपन के तराज़ू पर तौलेगी यानी इशारा इस बात का कि शायद इस बार जातीय समीकरण किसी एक दल की तरफ़ ना होकर थोड़ी अलग करवट लेगा.

उत्तर प्रदेश जनसंख्या के लिहाज़ से देश का सबसे बड़ा राज्य है. ज़ाहिर है यहां अलग-अलग दलों का विश्लेषण करके ही शायद एक बेहतरीन निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है.

बात शुरू करते हैं सपा-कांग्रेस गठबंधन से. लेकिन गठबंधन पर चर्चा से पहले थोड़ा पीछे चलते हैं ताकि यह स्पष्ट हो पाए कि अब तक कैसे और कब-कब यूपी में सियासत ने करवट बदली.

अब से करीब दो महीने पहले ऐसा लगता था कि समाजवादी पार्टी इस लड़ाई से बिल्कुल ही बाहर हो चुकी है और फ़ाइट सिर्फ़ बसपा बनाम बीजेपी की रह गई है.

इसकी वजह है समाजवादी पार्टी में आतंरिक कलह. लेकिन इसमे कोई दो राय नहीं कि कलह के माहौल के वक्त अखिलेश ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ का बख़ूबी परिचय देते हुए इस कलह को ना सिर्फ़ धीरे-धीरे शांत किया बल्कि अपने लिए एक सकारात्मक ज़मीन भी तैयार कर ली.

अब तक यही माना जाता था कि राज्य में अखिलेश सिर्फ सीएम के चेहरे हैं और पर्दे के पीछे कई और सीएम भी हैं. लेकिन अखिलेश ने अपनी राजनीतिक कुशलता से इस धारणा को पलट दिया और ख़ुद को युवा तथा विकास पुरुष के रूप में प्रोजेक्ट कर माहौल को अपने पक्ष में मोड़ दिया.

अखिलेश लोगों के दिलों में यह बात पैदा करने में कामयाब रहे कि अब वो ना सिर्फ़ पार्टी के सबसे बड़े चेहरे हैं बल्कि पार्टी के जातीय समीकरण के सबसे बड़े हिमायती भी.

सपा-कांग्रेस गठबंधन की पेंच

जल्दी ही सियासत ने एक और करवट ली और सपा-कांग्रेस का गठबंधन हो गया. इस गठबंधन के बाद सबको ऐसा लगने लगा की इस चुनाव में यही गठबंधन जीत की सबसे बड़ी हक़दार है.

गठबंधन को लेकर यह धारणा बन गई कि सपा के साथ पहले से ही यादव और मुस्लिम वोट हैं और अब गठबंधन के बाद कांग्रेस के परंपरागत वोटर भी उनसे जुड़ जाएंगे.

यह भी सच है कि शुरुआती चरणों में इसका असर भी दिखा. लेकिन यह माहौल भी ज़्यादा दिनों तक बना नहीं रह सका और यहां वापसी हुई बीजेपी की.

बीजेपी की रणनीतियों पर हम आगे चर्चा करेंगे पहले चर्चा कर लेते हैं उन वजहों की जिससे समाजवादी पार्टी को इस चुनाव में नुकसान होता दिख रहा है.

चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी जिस तरह से आंतरिक कलह का गहरे रूप से शिकार हुई उससे पार्टी को छवि का नुकसान हुआ और उससे भी बड़ी बात यह कि ख़ुद मुलायम सिंह नाराज़ हो गए.

मुस्लिम वोटरों पर असर

अब तक मुस्लिम-दलित वोटों के बीच यह मुलायम सिंह की अनूठी बाज़ीगरी ही थी जिसके बूते समाजवाद यूपी में हमेशा ही टॉप पर रहा. लेकिन इस बार कुछ बदले-बदले से नज़र आ रहे हैं सरकार.

मुलायम का प्रचार में कहीं नज़र नहीं आना सपा के जन आधार को विभाजित करता दिखता है और पार्टी में शक्ति संचार की कमी नज़र आ रही है.

सबसे ज़्यादा असर मुस्लिम वोटरों पर पड़ता दिख रहा है क्योंकि उनका एक तबका बीएसपी की तरफ़ जा सकता है.

हालांकि इस कमी को पूरा करने के लिए युवा गठबंधन भी है. लेकिन अंदेशा इस बात का भी है कि कांग्रेस के परंपरागत वोटर कहीं इस गठबंधन से कन्फ्यूज़ होकर बसपा या बीजेपी की तरफ़ ना चले जाएं.

बसपा! बसपा ने सोचा था कि दलित-मुस्लिम गठबंधन उसकी नैया पार लगा देगा और हाथी हुंकार भरेगा, पर मुस्लिम वोट में विभाजन बसपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन को नुकसान पहुंचा रहे हैं और बीजेपी को फ़ायदा.

हालांकि मायावती की रैलियों में जुट रही भीड़ इस बात का प्रमाण है कि इस बार बसपा के लिए एक मौका तो ज़रूर है. यह सच है कि मायावती पिछले कई महीनों से अपने दलित-मुस्लिम एजेंडे पर काम कर रही हैं.

मायावती का भरोसा

ऐसे में मायावती को भरोसा है कि सपा से मुस्लिम मतों का बहाव उनकी नैया पार करा देगा. बसपा ने 97 मुसलमानों को टिकट देकर सपा और कांग्रेस गठबंधन की चूलें हिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. लेकिन क्या गजराज की यह मस्त चाल बीजेपी को पस्त कर पाएगी?

यहां बड़ा पेंच है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, मोदी-अमित शाह की रणनीति, अपना दल जैसे छोटे दलों को अपने साथ लाना, रैलियों का रेला लगाकर विपक्ष पर तीखे प्रहारों के ज़रिए जनता से करिश्माई परिवर्तन के वादे लेना और अंत में इन सब के बीच जातीय चौसर बिछा कर दूसरों को घेरना. यूपी की सत्ता हथियाने के लिए बीजेपी इस बार अपना सब कुछ झोंक रही है.

समाजवादी पार्टी के गढ़ इटावा और मैनपुरी में भीतरघात का फ़ायदा उठाना, अखिलेश के मंत्रियों और विधायकों के ख़िलाफ़ एंटी इनकंबेंसी का माहौल बनाना, गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को टिकट थमाकर सपा और बसपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाना - बीजेपी की यह रणनीति इस बार सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा को कड़ी टक्कर दे रही है.

बदले हुए माहौल में बीजेपी की गाड़ी आगे निकलती दिख रही है और एसपी-कांग्रेस गठबंधन एवं बीएसपी एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाते दिख रहे हैं और उसका लाभ बीजेपी को मिलता नज़र आ रहा है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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