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जब उर्दू ने करवाया मुल्क का बंटवारा
- Author, विवेक शुक्ला
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
21 फ़रवरी का दिन. साल 1948. पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना दो दिन पहले ही ढाका पहुंचे थे. 21 फ़रवरी को शहर के रेसकोर्स मैदान में, जिसका हर कोना उस दिन खचाखच भरा था, जिन्ना ने एलान कर दिया कि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू होगी.
माना जाता है कि उर्दू को बंगालियों पर थोपे जाने के इस ऐलान के साथ ही पाकिस्तान के बंटवारे और नए मुल्क (जिसे बांग्लादेश के नाम से पुकारा गया) की नींव ख़ुद मोहम्मद अली जिन्ना के हाथों ही डल गई थी.
अपने चिर-परिचित आदेशात्मक स्वर में जिन्ना ने स्टेज से कहा, "सिर्फ़ उर्दू ही पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा रहेगी. जो इससे अलग तरीक़े से सोचते हैं वे मुसलमानों के लिए बने मुल्क के शत्रु हैं."
वरिष्ठ लेखक कंचन गुप्ता कहते हैं, "जिन्ना की घोषणा से बांग्लाभाषी जनता में निराशा और ग़ुस्से की लहर दौड़ गई. वे ठगा-सा महसूस करने लगे. वे असहाय थे. ज़ाहिर तौर पर उन्होंने अलग मुस्लिम राष्ट्र का हिस्सा बनने का तो फ़ैसला किया था पर वे अपनी बांग्ला संस्कृति और भाषा से दूर जाने के लिए भी किसी भी क़ीमत पर तैयार नहीं थे."
कंचन गुप्ता ने भाषा आंदोलन का गहराई से अध्ययन किया है.
पाकिस्तान के गवर्नर जनरल शायद बंगालियों की निराशा और ग़ुस्से को ठीक से न भांप सके और दो दिन बाद ढाका यूनिवर्सिटी कैंपस के प्रोग्राम में उन्होंने फिर उर्दू को ही पाकिस्तान की ज़बान बनाने की बात को दोहराया.
यही बात उन्होंने एक रेडियो कार्यक्रम में भी कही. और ये भी कह डाला कि इस मसले पर किसी भी तरह की बहस या संवाद की कोई जगह नहीं है.
जिन्ना के इस एलान के विरोध में नारे लगे. जिन्ना ने शायद इसकी कल्पना भी नहीं की थी.
जिन्ना के कराची रवाना होने के फौरन बाद पूर्वी पाकिस्तान में उर्दू को थोपने की कोशिशों के विरोध में प्रदर्शन होने लगे.
बांग्लाभाषियों को यह प्रस्ताव क़बूल नहीं था कि वे चाहें तो बांग्ला को अरबी लिपी में लिख सकते हैं.
पूर्वी पाकिस्तान में जगह-जगह उर्दू को थोपे जाने का विरोध होता रहा जो सालों तक जारी रहा.
'मनहूस दिन'
और फिर आया 1952 का वही दिन यानी 21 फ़रवरी. ढाका यूनिवर्सिटी कैंपस में छात्र प्रदर्शन जारी था.
अचानक से हथियारों से लैस सुरक्षाकर्मियों ने निहत्थे छात्रों पर गोलियां बरसानी चालू कर दीं. 12 युवक इस गोलीबारी में मारे गए.
दुनिया इस नृशंस सामूहिक हत्याकांड से सन्न रह गई पर पाकिस्तान हुक़ूमत ने किसी तरह का अपराधबोध नहीं जताया.
लोगों ने छात्रों की मौत की याद में घटनास्थल पर स्मारक बनवाया, लेकिन उसे ध्वस्त कर दिया गया.
संयुक्त राष्ट्र ने बाद में 21 फ़रवरी को मातृभाषा दिवस के तौर पर मनाने का फ़ैसला किया. बांग्लादेश के बनने के पीछे भाषाई मतभेद एक बहुत अहम वजह रही.
इसने ये भी साबित कर दिया कि कोई मुल्क सिर्फ़ मज़हब के बिना पर नहीं बन सकता और न ही कामयाब हो सकता है, सांस्कृतिक समानता, जबान और बहुत सारी दूसरी भावनाएं हैं जो एक राष्ट्र को राष्ट्र बनाती हैं.
भाषाई विभिन्नता ने मोहम्मद अली जिन्ना की 'टू नेशन थ्योरी' को ध्वस्त कर दिया.
आज के दिन बांग्लादेश में उन 'शहीदों' को याद किया जाएगा जो पुलिस की गोलियों का शिकार हुए थे.
उधर, पाकिस्तान में भी एक ऐसा तबक़ा है जो अफसोस जताता है कि अगर बांग्ला को पाकिस्तान में उचित दर्जा मिल जाता तो शायद धर्म के नाम पर बना मुल्क ज़बान के सवाल पर दो-फाड़ न होता.
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