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‘नेता भले न हों, लेकिन यहां स्टार प्रियंका ही हैं’
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कांग्रेस की स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी के लिए रायबरेली भले ही घर जैसा हो और वहां वो अक्सर आती हों, इसके बावजूद रायबरेली के लोगों में उन्हें देखने और सुनने का उत्साह बना रहता है.
रायबरेली के राजकीय इंटर कॉलेज में शुक्रवार को प्रियंका गांधी भाई राहुल गांधी के साथ जब हेलीकॉप्टर से रैली स्थल पर उतरीं तो पूरी भीड़ का रुख़ हेलीकॉप्टर की ओर हो गया.
उस समय ये तय करना मुश्किल हो रहा था कि लोगों की दिलचस्पी प्रियंका गांधी को देखने में है या राहुल गांधी को या फिर हेलीकॉप्टर को.
प्रियंका और इंदिरा गांधी
लेकिन बाद में जब लोगों से बातचीत हुई तो पता लगा कि रायबरेली के लोग प्रियंका गांधी को ही यहां की स्थानीय सांसद और उनकी मां सोनिया गांधी का प्रतिनिधि समझते हैं.
यही नहीं, लोग उन्हें उनकी दादी यानी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी जोड़ते हैं. रैली में बड़ी संख्या में महिलाएं भी मौजूद थीं. काफी देर से धूप में बैठी प्रियंका-राहुल के आने का इंतज़ार कर रही थीं. रैली के बाद कुछ महिलाओं ने यहां आने की वजह बताई.
सलोन से कई महिलाओं के साथ गोद में छोटे से बच्चे को लेकर प्रियंका गांधी को देखने और सुनने की इच्छा से आईं रामरती कहती हैं, "प्रियंका गांधी नेता नहीं हैं लेकिन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने काफी कोशिश की है. उनकी पहल से यहां कई संस्थाएं काम कर रही हैं जिन्हें महिलाएं ही चलाती हैं और उन्हें घर बैठे अच्छा रोज़गार मिला है."
इनमें से कई महिलाएं ऐसी थीं जो प्रियंका गांधी के रायबरेली आने पर उनसे अक्सर मिलती रहती हैं.
प्रियंका गांधी ख़ुद राजनीति में क्यों नहीं आतीं? इस सवाल पर एक बुज़ुर्ग महिला रईसा बेग़म कहने लगीं, "वो अपने भाई की मदद करने आती हैं यहां. अब भाई नेता है और वो भी हो जाएंगी तो ये अच्छी बात नहीं है. हो सकता है भाई को ये न अच्छा लगे. लेकिन यहां हम सब प्रियंका को ही नेता समझते हैं."
रायबरेली में प्रियंका गांधी कांग्रेस उम्मीदवार अदिति सिंह के पक्ष में प्रचार के लिए आई थीं. हालांकि पिछले कई दिनों से उनके आने और न आने को लेकर असमंजस बना हुआ था.
इसकी तमाम वजहों में गठबंधन में अमेठी और रायबरेली की सीटों पर शायद उनकी अनदेखी भी शामिल है, लेकिन रायबरेली के कांग्रेस समर्थक लोग ऐसा नहीं मानते.
युवाओं में क्रेज
हालांकि आने के बावजूद प्रियंका यहां चुप रहीं. इसे लेकर लोगों में मायूसी ज़रूर थी.
राहुल गांधी का भाषण सुनकर बाहर निकले कुछ युवाओं में से एक, रायबरेली के ही फ़िरोज़ गांधी डिग्री कॉलेज में बीएससी की पढ़ाई कर रहे सुधांशु तिवारी कहते हैं, "समय कम था शायद इसलिए प्रियंका जी नहीं बोलीं लेकिन हम लोग उनका भाषण सुनना चाहते थे. युवाओं में उनका क्रेज है और वो यहां की स्टार हैं."
एक अन्य युवा संदीप सिंह थोड़ा मुस्कराते हुए अपनी निराशा ज़ाहिर करते हैं, "मैं तो पिछले तीन साल से इस कोशिश में हूं एक बार प्रियंका गांधी को सामने से देख लूं और उनके साथ सेल्फ़ी ले लूं. लेकिन सफल नहीं हो पाया."
कांग्रेस दफ़्तर तिलक भवन के पास ही रायबरेली से कांग्रेस उम्मीदवार अदिति सिंह का दफ़्तर है. अदिति सिंह से मुलाक़ात के बाद हमने उनसे भी यही सवाल पूछा तो उनका भी जवाब 'समयाभाव' वाला ही था.
अदिति सिंह के पिता अखिलेश सिंह पिछले कई साल से यहां से निर्दलीय चुनाव जीतते रहे हैं और उनकी गिनती भी इलाक़े के 'बाहुबली' विधायकों में होती है.
स्थानीय पत्रकार योगेश कुमार कहते हैं, "रायबरेली कांग्रेस का गढ़ भले ही हो, लेकिन विधानसभा सीट अखिलेश सिंह की ही है. पिछली बार प्रियंका गांधी कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने आई थीं, फिर भी वो नहीं जीत पाया."
योगेश कुमार आगे कहते हैं, "अखिलेश सिंह अब अपनी विरासत बेटी अदिति सिंह को सौंप चुके हैं. ऐसे में इससे अच्छा मौक़ा और कुछ नहीं होता. अदिति सिंह को कांग्रेस का साथ मिल जाएगा और कांग्रेस के लिए उसका गढ़ सुरक्षित हो जाएगा."
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रायबरेली से सांसद हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए अभी तक यहां नहीं आ सकी हैं. हालांकि स्वास्थ्य कारणों से वो दूसरी जगहों पर भी प्रचार करने नहीं जा रही हैं.
रायबरेली में किराने की दुकान चलाने वाले संजय कुमार कहते हैं कि यहां के लोग चाहते हैं कि 2019 में प्रियंका गांधी इस सीट से लोक सभा का चुनाव लड़ें.
दरअसल, अमेठी और रायबरेली कांग्रेस या यूं कहें कि गांधी-नेहरू परिवार की परंपरागत सीटें मानी जाती हैं.
कुछ समय को छोड़ दें तो दोनों संसदीय सीटों पर इसी परिवार का कोई न कोई व्यक्ति चुनाव लड़ता रहा है.
रायबरेली में शुरुआत की थी इंदिरा गांधी के पति फ़िरोज़ गांधी ने और बाद में इस सीट से इंदिरा गांधी चुनाव लड़ती रहीं. हालांकि इंदिरा गांधी 1977 में इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में यहां से हारी थीं.
सोनिया गांधी ने भी राजनीति में आने के बाद पहला चुनाव 1999 में अमेठी से लड़ा था लेकिन 2004 में अमेठी सीट उन्होंने राहुल गांधी के लिए छोड़ दी और ख़ुद के लिए रायबरेली सीट को चुना.
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