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नज़रिया: विश्वविद्यालयों में सोचने समझने की जगह नहीं बचेगी
- Author, अपूर्वानंद
- पदनाम, लेखक और विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
जय नारायण व्यास जोधपुर विश्वविद्यालय की अंग्रेज़ी की अध्यापिका डॉक्टर राजश्री रानावत के निलंबन के बाद हम गर्व से कह सकते हैं कि भारत अब इस्लामी क्रांति के बाद के ईरान, या स्टालिन के सोवियत संघ, या हिटलर की जर्मनी, मैक्कार्टी के अमरीका या माओ के चीन की क़तार में आ गया है.
हम अपने विश्वविद्यालयों को सिर्फ़ और सिर्फ़ राष्ट्रीय और सरकारी विचार के प्रचार की शाखाओं के रूप में चलने देंगे, ज्ञान निर्माण के केंद्र के रूप में नहीं.
ज्ञान के लिए आज़ादी चाहिए, जो हम अपने अध्यापको और छात्रों को देंगे नहीं और जिसने इसकी हिमाक़त दिखलाई, उसे राजश्री की तरह सज़ा दी जाएगी.
डॉक्टर रानावत का निलंबन भारत में उच्च शिक्षा के भविष्य के लिए ख़तरे की ताज़ा घंटी है.
इस वजह से कि अब कोई भी अध्यापक किसी भी क़िस्म का अकादमिक विचार न तो ख़ुद स्वतंत्र रूप से व्यक्त करेगा और न ही किसी सहकर्मी को निमंत्रित करेगा. अगर उसने अपने शोध से कोई नया निष्कर्ष हासिल किया है तो उसके बारे में वह छात्रों और शिक्षकों से चर्चा करने से भी बचेगा.
दुकान बन जाएंगे विश्वविद्यालय
इसका अर्थ यह होगा कि भारतीय विश्वविद्यालय, ख़ासकर राज्यों के विश्वविद्यालय सिर्फ़ परीक्षा लेने और डिग्रियाँ बाँटने वाली दुकान बन कर रह जाएँगे.
उच्च शिक्षा का जो असली मक़सद है, यानी मौजूदा ज्ञान के संसार में नई बात जोड़ना और मुमकिन हो तो इस ज्ञान से संसार को बदल कर रख देना, उसके लिए अकादमिक आज़ादी की ज़रूरत है.
इसका अर्थ यह होगा कि हमारे यहाँ ज्ञान बनेगा नहीं, हम पश्चिम में निर्मित ज्ञान के उपभोक्ता भर बन कर रह जाएँगे.
हालांकि, अब आशंका है कि अपनी आज़ादी के लिए ईर्ष्या पैदा करने वाले अमरीकी विश्विद्याल भी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के राज में हमारी तरह ही बनकर रह जाएँगे.
एक वक़्त था जब पृथ्वी को ही ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता था.
इस धारणा को चुनौती देने वाले गैलीलियो के साथ जो व्यवहार हुआ, वही बर्ताव अगर न्यूटन के सिद्धांत को पवित्र मनानेवाले आइंस्टाइन के साथ करते तो उन्हें क्या कहा जाता?
आख़िर आइंस्टाइन ने तो दुनिया को देखने और उससे रिश्ता बनाने का तरीक़ा ही बदल डाला. अब उनके सिद्धांत को भी ख़ासी चुनौती मिल रही है.
ज्ञान संसार की ख़ासियत यह है कि इसमें नए विचार का मतलब यह नहीं होता कि पहले के विचारक को गद्दी से उतार दिया जाएगा.
लेकिन नया विचार क्या बिना असहमति के पैदा हो सकता है?
सेमिनार अकादमिक विचार-विमर्श के लिए होता है न कि किसी मत के प्रचार के लिए. इसमें वक़्ताओं से उम्मीद होती है कि संबंधित विषय के क्षेत्र में जो नया से नया शोध हुआ है, वे उससे श्रोताओं को परिचित कराएँ.
सेमिनारों की क्या है अहमियत?
इस कर्म में वे अपने विचार भी रखते हैं. लेकिन कोशिश यह होती है कि छात्र और शिक्षक एक ही मसले को भिन्न-भिन्न कोणों से देखने का अभ्यास कर सकें और उनके बारे में अपना स्वतंत्र मत बना सकें.
ऐसे सेमिनार में कोई आधिकारिक मत नहीं होता जिसका प्रचार किया जाए. बहस-मुबाहिसा होता है, असहमतियाँ होती हैं, कोई प्रस्ताव नहीं पारित किया जाता.
लेकिन, जैसा इसके पहले उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग के एक सेमिनार के बाद हुआ था.
यहाँ जोधपुर में भी तुरंत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों ने आयोजक और प्रोफ़ेसर निवेदिता मेनन के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू कर दिया.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने घुटने टेक दिए. राजश्री को दंडित करने का निर्णय किया. ये प्रोफ़ेसर निवेदिता मेनन के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई चाहते हैं.
मामला राजश्री और मेनन का है, लेकिन यह यहीं नहीं थमता है.
कुछ दिनों पहले झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय की एक अध्यापिका को इस कारण निलंबित कर दिया गया था कि उन्होंने जेएनयू से जुड़े एक विद्वान को बुलाया लिया था. मानो, जेएनयू अपराधियों की जगह हो!
हालाँकि तथ्य यह था कि उनका रिश्ता जेएनयू से नहीं था.
अभी गांधीनगर में एक विश्वविद्यालय के अध्यापक को 'कारण बताओ' नोटिस थमाया गया है.
विचार-विमर्श की संस्कृति पर हमला
कुछ महीना पहले हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय की अंग्रेज़ी की अध्यापिका स्नेहलता मानव को महाश्वेता देवी की कहानी के मंचन के चलते उन्हीं आरोपों का शिकार बनाया गया जो अभी राजश्री पर लगाए जा रहे हैं.
यहाँ तक कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में वक्ताओं के नाम की कड़ी जाँच की जाती रही है. ऐसे कई मामले हैं जहाँ कार्यक्रम रद्द किए गए हैं क्योंकि वक्ता असुविधाजनक माने गए.
पूरे भारत में विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र विचार-विमर्श की जगह ख़त्म की जा रही हैं. इसके बीच भी स्नेहलता, सुधा चौधरी या राजश्री जैसी शिक्षक जब साहस दिखाती हैं तो उनपर भयंकर हमला होता है.
उनके अपने सहकर्मी उन्हें अकेला छोड़ देते हैं, समाज भी उनके लिए खड़ा नहीं होता. यह ज्ञान निर्माण के लिए शुभ नहीं है.
शिक्षकों का कर्तव्य है छात्रों को विविध प्रकार के विचारों और विचार करने की पद्धतियों से परिचित कराना. वे किसी विचार के प्रचारक नहीं हो सकते.
साथ ही उनका काम यह भी है कि वे अपने अलावा छात्रों का परिचय श्रेष्ठ बौद्धिकों से भी कराएँ. ऐसा वे उन्हें किताबें देकर या सेमिनारों के ज़रिए विद्वानों से आमने-सामने बातचीत का मौक़ा देकर करते हैं.
इसमें अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है. हर जगह दो तरह के शिक्षक हैं. एक जो सिर्फ़ कक्षा में जाकर सिलेबस पूरा करके कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं, दूसरे जो किताबें इकट्ठा करें, सेमिनार करने की ज़हमत उठाते हैं.
इसके लिए अगर हम उन्हें पुरस्कार नहीं दे सकते तो न दें, लेकिन उन्हें तबाह करके बाक़ी नौजवानों को क्या संदेश दे रहे हैं?
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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