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कर्नाटक संगीत: सवर्णों के वर्चस्व के ख़िलाफ़ क्रांति
- Author, सुधा जी तिलक
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
चेन्नई में इन दिनों एक तरह की संगीत क्रांति चल रही है.
इसकी अगुवाई मशहूर शास्त्रीय संगीतकार और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टीएम कृष्णन कर रहे हैं.
कर्नाटक संगीत के इस मशहूर गायक ने दक्षिण भारत के शास्त्रीय संगीत में सवर्णों के वर्चस्व की काफ़ी आलोचना की है.
वे ज़्यादा समतावादी वातावरण बनाना चाहते हैं जहां हर समुदाय के लोग एक शहर में एक साथ कला से जुड़े काम कर सकें.
कृष्णन ने इसे साबित करने के लिए कला को सम्मानित संगीत सभाओं और हॉलों से बाहर निकाला और दूर दराज के इलाक़ों में ले गए.
शास्त्रीय संगीत को ज़्यादातर लोग पवित्र शब्दावलियों तक सीमित रखते हैं, लेकिन कृष्णन इसे बंगाल की खाड़ी के किनारे बसने वाले मछुआरों की बस्तियों तक ले गए.
वहां खुले आकाश के नीचे पसरे गावों में उत्सव मना कर संगीत पेश किया जाता है. इसी महीने 'एक होने का उत्सव' उरूर-ओल्कॉट कुप्पम विज़ा मनाया जाता है जिसमें यह संगीत पेश किया जाता है.
इसके लिए कृ्ष्णन ने मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता नित्यानंद जयरामन से हाथ मिलाया. उनका मक़सद 'सामाजिक दीवारों को गिरा कर समान वातावरण बनाना और कला को जातिवाद से अलग करना' है.
इस उत्सव में कर्नाटक संगीत के साथ साथ दूसरे तरह के संगीत भी प्रस्तुत किए जाते हैं.
इसमें हाशिए पर खड़े और समाज के वंचित तबके के लोगों को भी जगह दी जाती है.
ट्रांसजेंडरों और चेन्नई की झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों को भी पहली बार इसी तरह के संगीत कार्यक्रम में जगह मिल सकी थी.
कृ्ष्णन का मानना है कि यह कई तरह की 'सांस्कृतिक और कलात्मक वर्चस्व को तोड़ने की दिशा में उठाया गया एक अहम क़दम' है.
वे श्रीलंका में गृहयुद्ध से तबाह हो चुके जाफ़ना भी गए और लोगों के बीच संगीत का कार्यक्रम रखा.
तमिलनाडु में वे कर्नाटक रागों की जगह कुरांगन जैसे बिल्कुल स्थानीय रॉक बैंड को जगह देते हैं. इसी तरह वे स्थानीय संकरी खाड़ी के पर्यावरण को होने वाले ख़तरे पर एक वीडियो जारी कर देते हैं.
कुरांगन के कबर वासुकी कहते हैं, "पारंपरिक कर्नाटक संगीत के साथ दूसरे तरह के संगीत और समसामयिक विषयों को मिलाने से यह संगीत अधिक लोगों तक पंहुचता है".
भारतीय भाषाओं पर सबसे ज़्यादा पकड़ रखने वाले लोगों में एक डेविड शुलमैन का मानना है कि कृष्णन के लिए संगीत 'आम जनता की नैतिकता को संगीत देने और उनके लिए शांति स्थापित करने का एक औज़ार' है.
तमिल उपन्यासकार पेरुमल मुरुगन को हिंदू धर्म के जाति व्यवस्था वालों ने जब परेशान किया, कृष्णन ने उनके पक्ष में वातावरण बनाने के लिए संगीत का प्रयोग शुरू कर दिया.
कर्नाटक संगीत दो हज़ार साल पुराना है. यह मंत्रों और प्रार्थना-भजन से निकला था. सत्रहवीं सदी में हिंदू धर्म के भक्त कवियों ने इसे आगे बढ़ाया.
बाद में यह राज दरबारों और संगीत सभाओं का हिस्सा बन गया.