You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ब्लॉग: दड़बे में डाल के रखियो विधायक को
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो संपादक, बीबीसी हिंदी
शिकारी हाथ में स्वादिष्ट चारा लिए आपकी मुर्ग़ियों के आसपास सूँघते घूम रहे हों तो क्या आप अपनी मुर्ग़ियों को छुट्टा घूमने देंगे? वो भी तब जब आपको मालूम है कि मुर्ग़ी कोई कुत्ता नहीं होती जो स्वामिभक्ति का उदाहरण पेश करने में जीवन होम कर दे.
मुर्ग़ी आख़िर मुर्ग़ी होती है और उसकी स्वामिभक्ति इस बात पर निर्भर रहती है कि स्वामी के पास दाना कितना स्वादिष्ट और कितनी ज़्यादा मात्रा में उपलब्ध है. आपसे ज़्यादा दाना दूसरे के पास होगा तो मौक़ा मिलने पर मुर्ग़ी उसी के पीछे जाएगी.
मुर्ग़ी को कभी ग़ौर से देखेंगे तो उसके चेहरे पर एक सपाट क़िस्म की मासूमियत होती है. उसमें कोई कुटिलता का भाव आपको ढूँढने से भी नहीं मिलेगा.
वे कुछ कुछ असहाय और लाचार होती है — जो हाँक ले गया उसके साथ चले जाने की लाचारी.
भारतीय राजनीतिक पटल पर इस तरह की लाचारी अगर किसी में दिखती है तो वो है विधायक.
जिस विधायक की लीडरशिप क्वालिटी को परख कर लाखों वोटर अपने समर्थन से जिताते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो विधानसभा में उनका नेतृत्व करेगा, उसकी हैसियत एक चुटकी में मुर्ग़ी-बटेर जैसी हो जाती है.
जब चाहे रेवड़ की तरह हाँक लिया. पार्टी हाईकमान ने इशारा किया तो चुप हो गए. रिसॉर्ट की ओर धकेल दिए गए तो रिसॉर्ट में चले गए. वहाँ ऐशो-आराम करने का हुक्म मिला तो ऐश कर ली.
कोई नहीं पूछता कि घर में आटा-दाल-राशन है या नहीं, बच्चों का होमवर्क पूरा हो रहा है या नहीं, पत्नी की शॉपिंग हो पाई या नहीं.
बस आलाकमान का हुक़्म हुआ कि अगले आदेश तक फलाँ रिसॉर्ट या फ़ाइव स्टार होटल में जाकर नज़रबंद हो जाइए तो ना नुकुर भी नहीं कर सकते. पार्टी अनुशासन का सवाल है.
सोचिए, ये कितनी बड़ी क़ुरबानी है कि जनतंत्र की रक्षा के लिए विधायक अपनी आज़ादी तक को गिरवी रख देता है.
ताज़ा उदाहरण ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़मुनेत्र कषगम के लगभग 130 विधायक हैं — ठीक ठीक संख्या कोई नहीं जानता — जो पार्टी महासचिव वीके शशिकला के इशारे पर चेन्नई के कूवातूर इलाक़े के गोल्डन बे रिसॉर्ट्स पर पिछले कई दिनों से बंद हैं.
ये अलग बात है कि ख़ुद शशिकला अगले चार साल बेंगलुरू के सरकारी रिसॉर्ट में काटेंगी.
जनतंत्र का खेल अजब है. सरकार बनाने के लिए विधायकों की ज़रूरत होती है. जिसके पास ज़्यादा विधायक उसकी सरकार.
इसके लिए कभी कभी विधायकों को मुर्ग़ियों की तरह दड़बे में बंद करने की ज़रूरत पड़ती है, क्योंकि उन्हें शिकारियों से बचाना होता है. जब शिकारी के तीर से मुर्ग़ियाँ बचेंगी तभी तो अंडा देंगी.
अंग्रेज़ी में एक शब्द है 'पोचिंग'. ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक़, इसका अर्थ है किसी दूसरे की जायदाद में ग़ैरक़ानूनी तौर पर घुस कर वहाँ परिंदों, जानवरों आदि का शिकार करना या उन्हें क़ब्ज़े में ले लेना.
असल शिकारी तो कुछ एक परिंदे पकड़कर रुख़सत हो भी सकता है पर राजनीति के जंगल में विचरने वाले शिकारियों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा मुर्ग़ियों को अपने दड़बे में रखना मजबूरी है.
इस जंगल में जिसके पास जितनी ज़्यादा मुर्ग़ियाँ, सत्ता की चाबी पर उसकी पकड़ उतनी ही मज़बूत.
राजनीतिक पोचिंग दो तरह की परिस्थितियों में होती है - एक तो विरोधी पार्टी के शिकारी आपकी मुर्ग़ियों को अपने दड़बे में हाँक ले जाए या फिर आपकी पार्टी के भीतर का ही कोई दूसरा नेता आपके दड़बे में सेंध लगाकर आपकी मुर्ग़ियों को दाना डालने लगे.
ओ पनीरसेल्वम मान कर चल रहे थे कि मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें ही मिलेगी क्योंकि उनके पास विधायकों का पूरा समर्थन है. उन्हें क्या मालूम था कि वीके शशिकला की थैली में ज़्यादा ज़ायकेदार दाना है और वो तमाम मुर्ग़ियों को हाँक ले जाएँगी.
जेल जाने से पहले शशिकला अपनी मुर्ग़ियों को ओ पनीरसेल्वम नाम के शिकारी से बचाने का पूरा इंतज़ाम करके गईं.
मुर्ग़ियों और बटेरों को हाँक ले जाने में महारत हासिल कर चुके कई दिग्गज शिकारियों का ज़िक्र भारतीय राजनीति के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा.
इनमें हरियाणा के चौधरी देवीलाल हैं जिन्होंने भजनलाल की सेंधमारी के डर से अपने विधायकों को 'पैक' करके दिल्ली के एक होटल में रख दिया.
इसी तरह आँध्र प्रदेश में नंदमूरि तारक रामाराव, गुजरात में शंकरसिंह वाघेला, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह, झारखंड में लालचंद महतो, अरुणाचल में दोरजी खांडू आदि लोग रहे हैं, जिन्हें अपनी मुर्ग़ियों को शिकारियों की नज़रों से बचाने के लिए मीलों दूर सुरक्षित जगहों पर ले जाना पड़ा.
पोचिंग की तरह ही अँग्रेज़ी में विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त को बताने के लिए एक और जुमला है 'हॉर्स-ट्रेडिंग'. इसका अर्थ यह क़तई नहीं है कि जिस तरह सोनपुर के मेले में घोड़े ख़रीदे-बेचे जाते हैं, उसी तरह विधायकों या सांसदों की भी ख़रीद-बिक्री होती है.
हॉर्स-ट्रेडिंग उस मोलभाव को कहते हैं जो क़ानूनसम्मत नहीं होता. दोनों पार्टियों में एक गुप्त समझौता होता है जिसके तहत दोनों को ही फ़ायदा होने की संभावना रहती है.
पुराने ज़माने में अमरीका के घोड़ाबाज़ार में यह धंधा ग़ैरक़ानूनी रूप से होता था. बाद में दुनिया भर की संसदों में यह चलन शुरू हो गया.
हिंदुस्तान में इस कला को अलग अलग समय पर अलग अलग नेताओं ने अपनी तरह से विकसित किया और कई नए आयाम दिए.
इनमें पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव, झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन, काँग्रेस के मनमोहन सिंह जैसे नाम शामिल हैं. विकास के इस क्रम में राजनीतिक शब्दावली भी विकसित हुई.
भारत ने जैसे विश्व को शून्य दिया वैसे ही भारतीय नेताओं ने राजनीतिक शिकार की परंपरा को समृद्ध करते हुए पोचिंग और हॉर्स ट्रेडिंग के अलावा एक नया शब्द जोड़ा - 'सूटकेस' पॉलिटिक्स.
अब न हर्षद मेहता हैं और न पीवी नरसिंहराव. पर उनकी शुरू की गई परंपरा अब भी जारी है. कालजयी परंपराएँ व्यक्ति के जाने से ख़त्म कहाँ होती हैं?