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तेज़ क़दमों के बावजूद पीछे छूटता जा रहा है घोड़ा
- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत में राजा महाराज के दौर में घोड़ा शाही शानो शौकत और लाव लश्कर का हिस्सा रहा है.
महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक को आज भी नायक की तरह याद किया जाता है. मगर वक़्त बदला तो घोड़े को अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए छोड़ दिया गया.
इंडिजिनस हॉर्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया (भारतीय अश्व संघ) ने मारवाड़ी और देशी नस्ल के घोड़ों के संरक्षण का काम हाथ में लिया है.
वे इन घोड़ों के निर्यात की इजाजत मांग रहे हैं, ताकि ये घोड़े भी अरबी घोड़ों की तरह दुनिया को अपने गुणों से वाकिफ करा सकें.
कभी बियाबान रेगिस्तान, कभी पर्वत पठार तो कभी उफ़नती दरिया को पार कर घोड़ा अपने सवार को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचता रहा है.
राजस्थान के किले महल और हर जंगे मैदान किसी न किसी घोड़े की गाथा सुनाते मिलते हैं. इनमें चेतक भी शामिल है जिसने अपने प्राण न्योछावर करके अपने स्वामी प्रताप को सुरक्षित निकाल लिया था.
लेकिन यह इतिहास की बात है, अब घोड़ा कभी खेल के मैदान तो कभी शोभा यात्रा में हाजिरी देते ही नज़र आता है.
अश्व संघ के उपाध्यक्षक कर्नल शेर प्रताप सिंह कहते हैं, "पहले हर रियासत के पास रिसाला होता था, क्योंकि उनकी सुरक्षा कारणों से जरूरत थी. आज घोड़ों की संख्या बढ़ी है. मगर दिक्कत यह है कि कैसे घोड़ों की आर्थिक उपादेयता बनाई जाए."
राजस्थान में कोई 24 हजार घोड़े हैं. इसके अलावा काठियावाड़ी, सिंधी, अमृतसरी, स्पिति और मणिपुरी नस्ल भी है. इनमें मणिपुरी घोड़े पोलो खेल में जगह बनाए हुए हैं.
मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में लगे अश्व संघ महासचिव रघुवेन्द्र सिंह डूंडलोद कहते हैं, "जब वर्ष 2000 में इन घोड़ों को भारत से बाहर ले जाने की इजाजत मिली तो अश्व पालक बहुत उत्साहित हुए. लेकिन फिर सरकार ने इस पर रोक लगा दी."
डूंडलोद के दावे के मुताबिक यह घोडा काबलियत में अरबी घोड़ों से मुकाबला कर सकता है.
मारवाड़ी घोड़ा अपने तीखे नैन नक्श और कानों के कारण खूबसूरत माना जाता है. ये घोड़े हर राजा और शासक की पसंद रहे हैं, फिर चाहे प्रताप हो, रंजीत सिंह हो या रानी लक्ष्मी बाई.
डूंडलोद दुख के साथ कहते हैं इन घोड़ों के लिए सरकारी स्तर पर कुछ ख़ास नहीं किया जा रहा है. ब्रिटेन की फ्रांसिस्का केली पिछले बीस साल से इन घोड़ों के संरक्षण के लिए काम कर रही है.
अमरीका में रहने वाले केली के पास 11 मारवाड़ी घोड़े हैं. वह कहती हैं, "मुझे इन घोड़ों से दिली लगाव है. मैंने भारत से बाहर विदेशों में भारत और उसके घोड़ों की नुमांइदगी की है. निर्यात पर रोक हटाने से मारवाड़ी घोड़ो को प्रोत्साहन मिलेगा."
करीब दो महीने पहले पहले ब्रिटिश शाही परिवार की माउंटेड रेजिमेंट के 18 सदस्यों का एक दल राजस्थान आया और इन घोड़ों पर सवारी की. वे इन घोड़ो से बहुत प्रभावित हुए. उनमे से एक रिचर्ड राफ़ेल कहते हैं, "राजस्थान आकर ही उन्हें इन घोड़ो की खूबियों का पता चला."
अश्व मेघ से लेकर मौजूदा दौर तक घोड़े ने वक्त की पगडंडियों पर अपने कदमों के निशान दर्ज कराए हैं. इस लंबी यात्रा में घोड़ा इंसान के साथ साथ चला है. अब इंसान कहीं आगे निकल गया, घोड़ा तेज़ क़दमों के बावजूद भी पीछे रहा गया.
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