'पहले भीख मांगते थे, अब काम चाहते हैं'

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
अनीता पिऊन का काम करना चाहती हैं तो ब्रह्मदेव कोई भी स्थाई रोजगार कर लेंगे. वहीं सोनल बड़ी होकर डांस टीचर बनना चाहती हैं.
ये छोटी-छोटी बातें तब आपको बहुत खास लगेंगी जब आप ये जानेंगे कि ये ख्वाहिशें उनकी हैं जो भीख मांगना छोड़कर फिर से सामान्य ज़िंदगी जीने की जद्दोजहद कर रहे हैं.
बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग की सोसाइटी 'सक्षम' मुख्यमंत्री भिक्षावृत्ति निवारण योजना चलाती है, जिसके तहत भिखारियों को इज्ज़त की ज़िंदगी जीने लायक बनाने की कोशिशें हो रही हैं.
योजना से जुड़े अविनाश कुमार के मुताबिक इसके लिए सात जिलों में चौदह पुनर्वास केंद्र शांति और सेवा कुटीर के नाम से चलाए जा रहे हैं. इन केंद्रों में रहने वाले लोगों ने पटना में आयोजित एक ख़ास मैराथन में हिस्सा लिया.
बीबीसी ने इस मैराथन में शामिल चंद लोगों से बात की और उनके सपनों और ख़्वाहिशों के बारे में जाना.

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बारह साल की सोनल (बदला हुआ नाम) के माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे. उनका पालन-पोषण एक ऐसे परिवार ने किया जो उनसे भीख भी मंगवाता था.
सोनल को ये पसंद नहीं था और वह एक दिन भागकर बाढ़ रेलवे स्टेशन पहुंची. फिर रेल थाने से पटना के शांति कुटीर भेज दी गईं. यहां अब वह स्कूल जाती हैं. डांस, जूडो-कराटे भी सीखती हैं.
सोनल बताती हैं कि उन्हें डांस के लिए कई पुरस्कार भी मिले हैं. सोनल आगे कॉलेज तक पढ़ना चाहती हैं और बड़ी होकर डांस टीचर बनकर अपने पैरों पर खड़ा होने की ख्वाहिश रखती हैं.

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समस्तीपुर ज़िले के ब्रह्मदेव कामती करीब तीन साल पहले अपने भाई से झगड़कर पटना आ गए थे. उन्होंने काम की तलाश की, लेकिन काम न मिलने पर पटना के मशहूर हनुमान मंदिर के बाहर भीख मांगने लगे.
करीब एक महीने तक भीख मांगने के बाद वे सक्षम से जुड़े कार्यकर्ताओं के ज़रिए सेवा कुटीर पहुंचे.
ब्रह्मदेव कहते हैं, ''यहां भोजन और रहने का इंतज़ाम तो मिला ही, साथ ही मेरी कार्यक्षमता को देख कर मुझे केंद्र के केयरटेकर का भी काम सौंपा गया. मेरे परिवार से भी मुझे फिर से जोड़ दिया गया. मैं अब छुट्टी मिलने पर उनसे मिल भी आता हूं. यहां आकर मैं फिर से स्वावलंबी हो गया हूं. हमें परिवार के साथ जीवन-यापन करने के लिए कोई स्थाई काम चाहिए. हम ऐसा काम ढूंढ सकें, इसके लिए ट्रेनिंग चाहिए. यहां से वापस लौटने के बाद अगर हम फिर से बेरोजगार हो गए तो दिक्क्त होगी.''

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तब करीब तीस साल की अनीता देवी ससुराल छोड़कर बेटे के साथ पटना के मीठापुर इलाके में अपने मायके पहुंची थीं. लेकिन मायके में भी इनकी नहीं बनी. इसके बाद ये अपने बच्चे को वहीं छोड़ एक दिन घर से निकल गईं. भीख मांग कई साल गुज़ारा करने के बाद वो सेवा कुटीर पहुंचीं.
अनीता ने बताया, ''मैंने यहां सिलाई-कढ़ाई का काम भी सीखा. अभी यहीं कपड़ा सफ़ाई का काम कर थोड़ पैसे कमा लेती हूं. यहां आने के बाद अपने-बिछड़े बेटे और परिवार से भी मिल चुकी हूं. लेकिन अभी खुद पर इतना भरोसा नहीं हुआ कि मैं अपने दम पर ज़िंदगी जी पाऊं. मैं मैट्रिक पास हूं अगर किसी ऑफिस में चपरासी, पिऊन का काम मिल जाए तो मैं ऐसा कर पाऊंगी.''

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मैराथन में गोपालगंज के अशोक कुमार भी मिले. वे अभी भी भीख मांग कर ही गुज़ारा करते हैं. करीब बीस साल के अशोक ने बार-बार पूछने पर भी यह नहीं बताया कि उन्होंने किन हालातों में भीख मांगना शुरू किया.
उनके माता-पिता नहीं है. बुआ ने उनको पाल-पोस कर बड़ा किया. उन्होंने कहा, ''अगर हमको भी ये लोग सेंटर पर ले जाएंगे तो अच्छा रहेगा.''
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