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योगी आदित्यनाथ बीजेपी के साथ या ख़िलाफ़?
- Author, कुमार हर्ष
- पदनाम, गोरखपुर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
कुछ दिन पहले क़यास लग रहे थे कि पार्टी ने उन्हें 'किनारे' कर दिया है, लेकिन योगी आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद पार्टी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक के तौर पर दिखाई दे रहे हैं.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, धोलना, लोनी और दूसरी कई जगहों पर उनकी रैलियां हो रही हैं जहां योगी हिन्दुओं के पलायन और कश्मीर जैसे हालात पैदा होने की बात कहकर आक्रामक हो रहे हैं.
ये सब कैसे? जबकि कहा तो ये जा रहा था कि 'उनके समर्थकों के उन्हें बार-बार मुख्यमंत्री के बतौर प्रोजेक्ट करने को लेकर मोदी-शाह उनसे नाराज़ हैं'.
योगी को पार्टी की भारी-भरकम चुनाव संचालन समिति से बाहर रखे जाने और पार्टी कार्यकारिणी बैठक में बोलने का मौक़ा भी नहीं दिए जाने की चर्चाओं के बीच इन बातों को और हवा मिली.
बाद में उन्हें अचानक से दिल्ली से अमित शाह का बुलावा आया और इन ख़बरों के बीच कि उनकी सरपरस्ती में चलने वाली हिन्दू युवा वाहिनी ने भाजपा में उनकी कथित उपेक्षा के ख़िलाफ़ 26 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने का ऐलान कर दिया है.
कुछ ने कहा कि पार्टी पर दबाव बनाने का ये योगी का पुराना आज़माया दांव है.
योगी साज़िश की इन बातों को विरोधियों की हवाबाज़ी बताते हैं और उनका कहना है कि हिन्दू युवा वाहिनी राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन भर है लिहाज़ा वो चुनाव लड़ ही नहीं सकती. और उनकी अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है.
लेकिन उनकी राजनीतिक शैली पर नज़र रखने वाले कहते हैं कि ये योगी का रणनीतिक चातुर्य ही है जिसने उन्हें एक पीठ के महंत से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर स्थापित किया है.
जिस गोरक्षापीठ का वे नेतृत्व करते हैं उसका संसदीय राजनीति से बहुत पुराना ताल्लुक रहा है.
1967 में इस पीठ के तत्कालीन प्रमुख महंत दिग्विजयनाथ हिन्दू महासभा के टिकट पर सांसद बने थे. उनके उत्तराधिकारी और रामजन्मभूमि आन्दोलन के अग्रणी नेता महंत अवैद्यनाथ 1962, 1967, 1974 व 1977 में मानीराम विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और फिर 1970, 1989, 1991 और 1996 में गोरखपुर से सांसद रहे.
उनके उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ 1998 में गोरखपुर से 12वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर 26 साल की उम्र में पहली बार सांसद बने. 1998 से वे लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. 2014 में वे पांचवी बार सांसद बने।
पिछले 28 सालों से गोरखपुर के सांसद का पता गोरखनाथ मंदिर ही रहा है.
योगी की छवि आमतौर पर एक उग्र हिंदूवादी नेता की रही है. 2007 में गोरखपुर में साम्प्रदायिक झड़प की कुछ घटनाओं के बाद तत्कालीन सपा सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार कर जेल भेजा था जिसपर प्रदेश के कुछ हिस्सों में उग्र प्रतिक्रिया भी हुई थी.
पिछले दिनों उनके भाषण का एक वीडियो वायरल हो गया था जिसमें वे कहते सुने गए कि अगर कोई मुस्लिम एक हिन्दू लड़की को ले जाएगा तो बदले में हम सौ मुस्लिम लड़कियों को ले जाएंगे.
योगी ने इसे साज़िश करार दिया था और फोरेंसिक जाँच की मांग की थी.
प्रदेश के 27 ज़िलों में फैले हिन्दू युवा वाहिनी जैसे अपने संगठन को लेकर चर्चा में रहने वाले योगी आदित्यनाथ का जनाधार बड़ा है और उन गिने चुने नेताओं में गिने जाते हैं जो हर चुनाव में अपना वोट प्रतिशत बढ़ा लेते हैं.
कहा जाता है कि जनता के बीच हासिल इस ताक़त के बल पर वो कई बार सार्वजनिक रूप से अपनी ही पार्टी के ख़िलाफ़ खड़े नज़र आते हैं.
बीएसपी के बाबू सिंह कुशवाहा को बीजेपी में शामिल करने का कुछ ऐसा खुला विरोध उन्होंने किया कि पार्टी को अपने क़दम वापस लेने पड़े.
2002 विधानसभा चुनाव में हिंदू महासभा ने भाजपा के उम्मीदवार को ख़िलाफ़ राधामोहन अग्रवाल को खड़ा किया और वो जीत भी गए.
अग्रवाल योगी के क़रीबी बताए जाते हैं.
अमित शाह ने उत्तर प्रदेश प्रभारी बनने के बाद जब गोरखपुर का दौरा किया था तो उनसे बंद कमरे में घंटे भर गुफ़्तगू की थी. मोदी ने भी लोकसभा चुनावों के दौरान उनकी तारीफ़ की थी.
लेकिन जब उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली तो उनके समर्थकों में गहन निराशा हुई. चर्चा चली कि मोदी-शाह की जोड़ी उनके बढ़ते कद को काबू में रखना चाहती है.
वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन शाही के मुताबिक़, "योगी के पार्टी में सबसे बड़े अभिभावक लालकृष्ण आडवाणी थे. जाहिर है कि आंतरिक सत्ता में उनके पराभव का खामियाज़ा उनके निकट रहे नेताओं को भुगतना था."
पार्टी ने उन्हें 2015 में हुए उपचुनावों में प्रमुख प्रचारक बनाया, योगी ने लव जेहाद को मुद्दा भी छेड़ा लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे. योगी विरोधियों ने इसका ठीकरा उनके माथे फोड़ने की कोशिश की.
कभी उत्तेजक भाषणों के लिए जाने जानेवाले योगी ने हाल के दिनों में एम्स की स्थापना, हवाई सेवाओं के विस्तार और वर्षों से बंद फ़र्टिलाइज़र कारख़ाने को शुरू करवाने जैसी मुहिम चलाई है.
हालांकि बीच-बीच में उनके समर्थक कभी शेर तो कभी सिंघम के रूप में उनके पोस्टर जारी कर उन्हें सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करने की मांग दोहराते रहे हैं पर पार्टी की तरफ़ से किसी तरह का कोई संकेत नहीं दिया गया है.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार डॉ योगेश मिश्र कहते हैं, "पार्टी में कई लोग उनकी आक्रामकता को उनके ख़िलाफ़ अंकित करते हैं और उन्हें ऐसा 'समावेशी' नेता नहीं मानते जो सभी धाराओं को साथ लेकर चल सके. बीते कुछ वर्षों में उनके समर्थन और आशीर्वाद से राजनीति में आए कुछ नेताओं ने ऐलानिया तौर पर उन्हें वजह बता कर पार्टी छोड़ी जिसने इस आरोप को मज़बूत ही किया है. योगी को अपनी इस छवि से मुक्त होना पड़ेगा."
पार्टी और योगी का रिश्ता एक ख़ास किस्म की उपयोगिता के चलते जारी है. और ये चुनाव बहुत हद तक उनकी साख और अहमियत को भी तय कर सकता है.
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