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मध्य प्रदेश में मस्त रह पाएंगे लोग
- Author, सौतिक विस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ये मध्य प्रदेश के एक गांव का सरकारी उच्च विद्यालय है. आम कामकाजी दिन की अलसाई दुपहरी का वक्त है, लेकिन स्कूल के खेल के मैदान में सैकड़ों पुरुष, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सब जमा हो चुके हैं.
ये स्कूल सलामतपुर में स्थित है और मोबाइल टावरों से घिरा हुआ है. लेकिन इसे राज्य सरकार के आनंद फैलाने के कार्यक्रम के लिए चुना गया है.
मैदान में नीले और सफ़ेद रंग के स्कूल ड्रेस पहने सैकड़ों बच्चे, रंग बिरंगी साड़ियों वाली महिलाएं और जींस टी-शर्ट पहने युवा सुबह से ही विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहे हैं.
लाउड स्पीकर पर डीजे का गाना भी गूंज रहा है और इस बीच में कुछ लोग पुराने कपड़े और खाने का दान भी कर रहे हैं.
सबको मिलता है प्रमाण पत्र
दर्जन भर लड़कियां जलेबी रेस में हिस्सा ले रही हैं. इस दौड़ में आपके हाथ बंधे रहते हैं और आपको अपने दातों से जलेबी को खाना होता है. चार साल की बच्ची ने बॉलीवुड स्टाइल के लटके-झटके से लोगों को आकर्षित कर रखा है. दिन के आख़िर में इन सबको आनंद उत्सव में शामिल होने का प्रमाण पत्र भी मिलता है.
आयोजन मंच के पास ढेरों अधिकारी मौजूद हैं और उनके साथ गांव के मुखिया सरपंच सहित रसूखदार लोग शामिल हैं. इन लोगों के मुताबिक आनंदोत्सव सप्ताह की शुरुआत शानदार अंदाज़ में हो गई है.
दरअसल ये नजारा एक सप्ताह तक चलने वाले आनंद उत्सव का है जिसका आयोजन राज्य सरकार की ओर से किया गया है. राज्य सरकार ने अपने यहां के हर आदमी के चेहरे पर मुस्कान लाने का भरोसा दिलाते हुए ये प्रोजेक्ट शुरू किया है.
ग्रामीण पंचायत से जुड़े शोभित त्रिपाठी कहते हैं, "हमारे गांव में भी लोग टीवी और मोबाइल की दुनिया में चिपके रहते हैं. हम लोगों को घर से बाहर निकालना चाहते हैं. हमारा उद्देश्य यही है कि लोग चिंताओं को भूलकर हमारे साथ आनंद मनाएं."
शिवराज सिंह का भरोसा
यह प्रोजेक्ट राज्य के ख़ुशहाली मंत्रालय का हिस्सा है. 57 साल के शिवराज सिंह चौहान का मानना है कि राज्य प्रशासन लोगों को मानसिक तौर पर सुकून देना चाहता है.
उनकी देखरेख में नौकरशाहों ने स्टेट इंस्टीच्यूट ऑफ हैप्पीनेस का गठन किया है जिसकी जिम्मेदारी आनंद लाने के तरीकों को विकसित करना है.
यह विभाग ऐसे 70 कार्यक्रमों को लागू करने की योजना बना रहा है ताकि राज्य का एक हैप्पीनेस इंडेक्स विकसित किया जा सके.
शिवराज सिंह चौहान इस बारे में बीबीसी से कहते हैं, "मैं लोगों के जीवन में ख़ुशहाली लाना चाहता हूं."
हालांकि लोगों को अचरज इस बात पर है कि बिना आधारभूत सुविधाओं के लोगों को ख़ुशी कैसे मिलेगी? मध्य प्रदेश भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में एक हैं. राज्य की एक तिहाई आबादी दलितों और आदिवासी समुदाय की है.
गरीबी में ख़ुशहाली?
बीते कुछ सालों में राज्य में विकास जरूर हुआ है, लेकिन अभी भी साक्षरता, कुपोषण और गरीबी चुनौती बने हुए हैं. ऐसे में आलोचकों का मानना है कि राज्य सरकार को पहले आम लोगों को सुविधाएं मुहैया करानी चाहिए.
शिवराज सिंह चौहान मानते हैं कि लोगों को भोजन और छत उपलब्ध करना सरकार की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है. लेकिन वे कहते हैं, "परिवार टूट रहे हैं, तलाक़ के मामले बढ़ रहे हैं और अकेले लोगों की संख्या बढ़ रही है. तनाव बढ़ रहा है और इसके चलते आत्महत्या करने के मामले भी बढ़ रहे हैं."
इन मामलों पर अंकुश लगाने के लिए ही शिवराज सिंह कहते हैं, "हमें लोगों का माइंडसेट पॉजिटिव करना होगा. हम कोशिश कर रहे हैं कि स्कूली शिक्षा, योगा, धार्मिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा, अध्यात्म के जरिए ये किया जाए. इसमें गुरुओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर सरकारी संगठनों की मदद ली जाएगी. यह विस्तृत कार्यक्रम है."
क्या ये तरीका नौकरशाही की सोच का नतीजा है, इसमें से कुछ सार्थक हासिल हो सकता है? इन चिंताओं पर इस विभाग के सबसे वरिष्ठ अधिकारी इक़बाल सिंह बैंस कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि अधिकारी ख़ुशहाली ला रहे हैं. ना तो यह लोगों को सीख देने का मसला है. आप लोगों को ख़ुशहाली नहीं दे सकते. आप केवल उन्हें वैसा वातावरण दे सकते हैं. यात्रा तो आपको करनी होती है, सरकार आपकी मदद कर सकती है."
आत्मा की आवाज़ सुनें
सरकार की इस योजना से करीब 25 हज़ार वॉलंटियर जुड़ चुके हैं. इनमें सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, डॉक्टर, घरेलू और अन्य लोग शामिल हैं. ये लोग राज्य के 51 ज़िलों में काम कर रहे हैं, इनमें से 90 तो प्रशिक्षण हासिल कर चुके हैं.
48 साल के सुशील मिश्रा उनमें से एक हैं. वे अब तक स्कूल, हॉस्टल और सरकारी दफ्तर में चार हैप्पीनेस क्लासेज ले चुके हैं. इन कक्षाओं में क्या होता है- इसके बारे में मिश्रा बताते हैं कि रिलैक्स होने के लिए लोगों को अपने अंदर के मन से लड़ना होता है.
मिश्रा कहते हैं, "तब जाकर लोग आत्मा की आवाज़ सुन पाते हैं, आंतरिक भावनाओं को महसूस कर पाते हैं." बहरहाल भारत में इस तरह ख़ुशहाली फैलाने का प्रयोग केवल मध्य प्रदेश में ही हो रहा है.
हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कार्यक्रम हैं. भूटान में ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस का कार्यक्रम है. वेनेजुएला में 2013 में हैप्पीनेस मिनिस्ट्री का गठन किया गया. 2016 में इस तरह के मंत्रालय का गठन संयुक्त अरब अमीरात में भी हुआ.
ये सरकार का काम नहीं
हालांकि समाज विज्ञानी शिव विश्वनाथन के मुताबिक लोगों में आनंद बांटने का काम सरकार का नहीं हैं. वे कहते हैं, "राज्य सरकार ये परिभाषित नहीं कर सकती है कि मानसिक तौर पर अच्छा होने के लिए क्या ज़रूरी है. अंत:चेतना पर सरकार आधिपत्य नहीं जमा सकती. असहमति वाली कल्पना का क्या होगा? ख़ुशहाली को ऐब्सट्रैक्ट मान कर लोगों पर इसे थोपना आश्चर्यजनक ही नहीं बल्कि ख़तरनाक है."
लेकिन शिवराज सिंह चौहान की सोच अलग है. उन्होंने 24 नवंबर, 2016 को अपने मंत्रियों को पांच सवाल भेजे कि ताकि पता चले वे कितने ख़ुश हैं. इसमें 22 से कम अंक हासिल करने वालों के बारे में ये माना जाता कि वे ख़ुश नहीं हैं. लेकिन इसके रिजल्ट के बारे में किसी को अब तक पता नहीं.
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