जब 60 साल के मांगिया ने पहली बार पहना जूता

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, चाईबासा (झारखंड) से, बीबीसी हिंदी के लिए.

60 साल के मांगिया देवगम पहली बार जूता पहनकर खुश हैं. पैरों में नीले रंग के कपड़े से बने जूते ने उनकी जिंदगी बदल दी है. अब उन्हें सर्दी नहीं लग रही. हवाई चप्पल में उनके तलवे सिकुड़ जाते थे.

यह संभव हुआ है चाईबासा में चलने वाले जूता बैंक (चरण पादुका बैंक) की बदौलत.

अपनी तरह के इस अनूठे बैंक में लोग जूता देते और लेते हैं. देने वाले को कोई कीमत नहीं मिलती. लेने वाले को कीमत देनी नहीं पड़ती. सबकुछ मुफ्त में होता है.

अक्टूबर-2016 से संचालित इस बैंक से करीब 400 लोगों ने जूते लिए हैं. इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने पहली बार जूता पहना.

डुंबुंसरी के मांगिया देवगम भी इनमें से एक हैं. वे दैनिक मजदूरी करते थे. उम्र अधिक हो गयी तो आजकल घर पर ही रहते हैं. कभी-कभार कोई काम मिल गया तो घर का राशन आ जाता है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, 'हम तो पहली बार जूता पहने. चप्पल पर मोजा पहनते थे तो पानी में भीग जाता था. सारी ठंड पैरों के रास्ते ही शरीर में घुसती थी. जूता मिल जाने से अब ठंड नहीं लगेगी. पहले कभी हिम्मत नहीं हुई कि जूता खरीदें. किसी ने दिया भी नहीं. पुराने चप्पल पर ही जिंदगी काट दी. अब जूता पहनने का सपना पूरा हो गया है.'

चाईबासा समेत पूरे झारखंड में इन दिनों कड़ाके की सर्दी पड़ रही है.

ऐसे में जूता बैंक में भीड़ बढ़ने लगी है. यहां जूता दान करने आए राहुल कुमार ने बताया कि सर्दी के दिनों मे जूता नहीं होने से लोगों को बाहर निकलने में परेशानी होती है. मेरे घर में कुछ पुराने जूते थे. मैं उन्हें नहीं पहनता था. उन्हें यहां दे दिया. यह किसी जरूरतमंद के काम आ जाएंगे.

जूता बैंक के प्रभारी और एडीएसएस सोम केसरी ने बताया कि औसतन चार-पांच लोग रोज यहां से जूते ले जाते हैं. देने वालों की संख्या भी करीब-करीब इतनी ही है. डीसी शांतनु अग्रहरि ने अपने जूते देकर अक्टूबर में इसकी शुरुआत कराई थी.

पश्चिमी सिंहभूम के डीसी शांतनु अग्रहरि ने बीबीसी को बताया कि उसी बिल्डिंग मे जूता बैंक के साथ वस्त्र बैंक भी है. गरीब वहां से कपड़े भी ले सकते हैं. यह लोगों के सहयोग से चलाया जा रहा है. सिर्फ उसकी देखरेख में लगे पदाधिकारी और कर्मचारियों की तनख्वाह सरकार देती है.

शांतनु अग्रहरि ने बीबीसी से कहा, ''दीवाली की साफ़-सफ़ाई में पुराने जूते फेंक या जला दिए जाते हैं. जबकि पुराने जूते किसी के लिए नए सरीखे साबित हो सकते हैं. ऐसे में मुझे लगा कि क्यों न एक ऐसी जगह बने, जहां लोग अपने पुराने जूते दान कर सकें. ताकि उन्हें गरीबों मे बांटा जा सके. इसी सोच के तहत मैंने यहां चरण पादुका बैंक की शुरुआत कराई.''

बहरहाल, मांगिया देवगम खुश हैं. उन्होंने जूते पहन कर एक फोटो भी खिंचवाई है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)