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शिव सेना-भाजपा के बीच तलाक़ में देरी क्यों
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
शिव सेना भारतीय जनता पार्टी का सबसे पुराना सहयोगी दल है. लेकिन पिछले कुछ सालों से उनके बीच खटपट चल रही है.
अब इसका परिणाम ये हुआ कि शिव सेना ने मुंबई और दूसरे नगर निगम चुनावों में भाजपा से नाता तोड़ लेने का फ़ैसला किया है.
शिव सेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने नगर निगम चुनावों में अकेले लड़ने का फ़ैसला किया है. फिलहाल इस फ़ैसले का असर राज्य और केंद्र पर नहीं होगा जहाँ शिव सेना भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों में शामिल है.
लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों दलों के बीच रिश्ते में स्थायी दरार पड़ चुकी है. ऐसा संभव है कि राज्य सरकार को आने वाले दिनों में कठिनाइयों का सामना करना पड़े.
लेकिन शिव सेना भाजपा से दूर क्यों जा रही है? इसका साधारण जवाब ये है कि अगर बड़ा भाई छोटा भाई बन जाए और छोटे भाई की भूमिका निभाने पर मजबूर हो तो उसे ये आसानी से स्वीकार नहीं होगा. महाराष्ट्र में पिछले कुछ सालों से शिव सेना के साथ ऐसा ही हो रहा है.
एक समय था शिव सेना राज्य में भारतीय जनता पार्टी से कहीं बड़ा दल था. लोकसभा और विधानसभा में इसे भाजपा से अधिक सीटें मिलती थीं. इसके अलावा पार्टी के संस्थापक बाल ठाकरे एक कद्दावर नेता थे. राज्य में उनकी तूती बोलती थी.
महाराष्ट्र में साल 1995 में जब पहली बार एक ग़ैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी तो शिव सेना भाजपा के बड़े भाई के रूप में सत्ता पर बैठी थी. उस मिली-जुली सरकार में शिव सेना की ज़्यादा चलती थी.
लेकिन 2014 में ये सब कुछ बदल गया. मई में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने शिव सेना से अधिक सीटें हासिल कीं. भाजपा को मोदी लहर के कारण राज्य की 48 सीटों में से 23 सीटें मिलीं जो पिछले चुनाव से 14 सीटें अधिक थीं. शिव सेना को 18 सीटों पर कामयाबी मिली.
कुछ महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों में सीटों की संख्या को लेकर तनातनी बनी रही और आख़िरकार भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया.
इसके बावजूद भाजपा ने 122 सीटें हासिल कीं. इस तरह 1990 के चुनाव के बाद (कांग्रेस को इस चुनाव में 144 सीटें मिली थीं) पहली बार किसी पार्टी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 100 से अधिक सीटें हासिल कीं. इस चुनाव में शिव सेना को केवल 63 सीटें मिलीं. और भाजपा के नेता को मुख्यमंत्री बनाया गया.
लेकिन 2014 के चुनावों से पहले शिव सेना को दो और झटके मिले थे. पार्टी के एक अहम नेता राज ठाकरे ने पार्टी से अलग होने का फैसला किया और 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थापना की. पार्टी का वोटबैंक बंट गया जिससे इसे काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ा. दूसरा झटका 2012 में बाल ठाकरे की मौत से लगा.
दूसरी तरफ 2013 से देश में मोदी लहर शुरू हुई जिसका असर राज्य में 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर साफ़ दिखाई दिया.
इन चुनावों के बाद शिव सेना के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने लगी. इसके वफ़ादार मतदाताओं ने भाजपा को समर्थन देना शुरू कर दिया.
केंद्र और राज्य में भागीदार पार्टी होने के बावजूद उद्धव ठाकरे कई बार मुख्यमंत्री दवेंद्र फडणवीस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ़ैसलों का विरोध करते रहे हैं. ऐसा वो अपने वोटबैंक को वापस हासिल करने की कोशिश में करते हैं.
लेकिन अब सवाल ये पैदा होता है कि अगर शिव सेना नगर निगम चुनावों में भाजपा से नाता तोड़ सकती है तो राज्य और केंद्र में अब तक ऐसा क्यों नहीं किया?
विशेषज्ञों के अनुसार ठाकरे को डर इस बात का है कि राज्य स्तर पर भागीदारी तोड़ने से दल के कुछ लोग भाजपा में शामिल हो सकते हैं. शिव सेना के अलग होने पर भाजपा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को सत्ता में भागीदार बना सकती है. इस समय शिव सेना के लिए सत्ता में रहना एक मजबूरी है.
दोनों के बीच कई बार तलाक़ की नौबत आ चुकी है. कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा खुद ही पहल करे और शिव सेना से एक क्लीन ब्रेक लेने पर मजबूर हो?
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