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कश्मीर: 12वीं टॉपर शाहिरा बनेंगी डॉक्टर!
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
कश्मीर घाटी में जो हालात 8 जुलाई 2016 के बाद पैदा हो गए थे उनकी वजह से वहां हर मां-बाप बच्चों की पढ़ाई को लेकर काफी फ़िक्र मन्द थे.
छह महीनों तक सभी स्कूल कॉलेज बन्द थे.
इन मुश्किल हालातों के बीच 17 साल की छात्रा शहीरह ने हालिया दिनों में 12वीं की बोर्ड परीक्षा में कश्मीर घाटी में पहला स्थान हासिल किया है.
कश्मीर घाटी के तराल इलाक़े के डाडसर गांव की रहने वाली शहीरह को 12वीं की परीक्षा में 500 में से 498 नंबर मिले हैं.
हिज़्बुल मुजाहिदीन के चरमपंथी बुरहान बानी भी उसी स्कूल में पढ़ते थे जहां से शहीरह ने टॉप किया है.
शाहिरा उसी इलाक़े की रहने वाली हैं जहां के बुरहान वानी थे.
बुरहान वानी चरमपंथी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन के एक कमांडर थे जो बीते 8 जुलाई को सुरक्षा बलों के साथ एक झड़प में मारे गए.
बुरहान की मौत के बाद कश्मीर में क़रीब छह महीनों तक भारत विरोधी प्रदर्शन जारी रहे और कश्मीर में छह महीनों तक कर्फ़्यू और हड़ताल की वजह से सब कुछ ठप रहा था.
छह महीनों तक शाहिरा ने स्कूल जा पाईं और न ट्यूशन सेंटर. कश्मीर के सभी स्कूल छह महीनों तक बंद थे.
बीते छह महीनों के ख़राब हालात के बावजूद शहीरद ने अपना ध्यान सिर्फ़ पढ़ाई पर दिया.
उन्होंने कहा, "बीते छह महीनों के दौरान कश्मीर में जो हालात रहे, उनकी वजह से बहुत ज़्यादा दबाव बढ़ा था. जो परिस्थितियां थी वो बेहद मुश्किल थीं. लेकिन मैंने सिर्फ़ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दिया. हालात ऐसे थे कि हम एक जगह से दूसरी जगह तक नहीं जा पाते थे."
शाहिरा ने अपनी क़ामयाबी के लिए परिवार और शिक्षकों का शुक्रिया अदा किया. उन्होंने कहा, "मैं अपने परिवार और शिक्षकों की शुक्रगुज़ार हूं जिन्होंने मुझे उन हालात का शिकार होने नहीं दिया, बल्कि मुझे उन हालातों से निकाला और मेरा साथ दिया."
दक्षिण कश्मीर का डडासर गांव चरमपंथियों के समर्थन वाला इलाक़ा माना जाता है. आज तक इस इलाक़े के दर्जनों चरमपंथी सुरक्षा बलों के साथ झड़प में मारे जा चुके हैं.
शाहिरा को अपनी क़ामयाबी की ख़बर तक मिली जब वे अपनी परीक्षा का परिणाम देखने गई.
शाहिरा ने साल 2014 में 10वीं की परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल किया था.
शाहिरा की क़ामयाबी पर उनके पिता शमीम अहमद बेहद खुश हैं. वे कहते हैं, "यहां हालात ख़राब होने के बाद हमारा घर से बाहर गाड़ी में निकला नामुमकिन हो गया था. ऐसे में मेरी बेटी को अपने ही इलाक़े के शिक्षकों ने या फिर रिसर्च स्कॉलर्स ने पढ़ाया. हमने ख़ुद भी थोड़ा बहुत पढ़ाया और उसका कोर्स पूरा करवाया."
शाहिरा के माता-पिता दोनों शिक्षक हैं.
शमीम अहमद कहते हैं कि कश्मीर जैसे हालात दूसरी जगह भी हैं लेकिन शिक्षा रूकनी नहीं चाहिए, ये आगे बढ़ने वाली चीज़ है.
शाहिरा की मां तस्लीमा कहती हैं कि उन हालातों के बारे में सिर्फ़ हमारा दिल जानता है कि किस तरह हमारी बेटी ने पढ़ाई के लिए मुश्किलों का सामना किया.
शाहिरा अब श्रीनगर में एमबीबीएस की परीक्षा की तैयारी कर रही हैं.
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