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नज़रिया: अंदरूनी कलह से क्या डूब जाएगी बीजेपी की लुटिया?
- Author, नवीन जोशी
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
गोंडा में भाजपा के सयाने नेता महेश नारायण तिवारी पहले फूट-फूट कर रोए, फिर उन्होंने निर्दलीय लड़ने का ऐलान कर दिया, आज़मगढ़ के पूर्व सांसद रमाकंत यादव ने ग़ुस्से में पार्टी से इस्तीफ़ा देकर अपने निर्दलीय प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया.
अमेठी में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का पुतला फूंका गया तो इलाहाबाद में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य का पुतला जलाया गया, बरेली में कंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार के कार्यकर्ता हंगामा मचाए हुए हैं तो फ़ैज़ाबाद के नाराज़ भाजपाइयों ने पार्टी दफ़्तर में ताला डाल कर प्रदर्शन किया.
टिकट वितरण से भाजपा में उपजे असंतोष के ये चंद उदाहरण हैं. बग़ावत के कुछ क़िस्से हर चुनाव में और हर पार्टी में होते हैं लेकिन भाजपा में इस समय नेताओं-कार्यकर्ताओं की नाराज़गी राज्यव्यापी है. सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा बाहरी लोगों को टिकट देने से उपजा है.
पार्टी के अब तक घोषित 304 प्रत्याशियों की सूची में क़रीब 80 प्रत्याशी बाहरी और बड़े नेताओं के परिजन अथवा कृपा-प्राप्त बताए जाते हैं. बग़ावत पर उतरे ज़्यादातर भाजपाइयों की शिकायत यह है कि पार्टी को खड़ा करने, प्रचार करने और जीत की ज़मीन तैयार करने के लिए लंबे समय से मेहनत हम लोगों ने की मगर उन लोगों को टिकट दे दिए गए जो चंद सप्ताह पहले तक दूसरे दलों में रहते हुए भाजपा के ख़िलाफ़ सक्रिय थे.
कानपुर की बिठूर सीट से भाजपा ने जिसे टिकट दिया है उन्होंने विरोधी दल में रहते हुए बिल्कुल हाल में नोटबंदी के ख़िलाफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला जलाया था. वहां के कार्यकर्ता ग़ुस्से में नारे लगाते हुए लखनऊ आ पहुंचे. उन्होंने पार्टी नेतृत्व से सवाल पूछा है कि क्या टिकट पाने के लिए प्रधानमंत्री का पुतला फूकना पड़ेगा?
ख़बर तो यह भी है कि भाजपा में हाल में शामिल हुए कुछ बड़े नेता भी ख़ुश नहीं. बसपा से आए स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे पिछड़ी जातियों के बड़े नेता अपने अलावा कुछ परिजनों एवं समर्थकों के लिए भी टिकट चाहते हैं. पार्टी में शामिल होते वक़्त किए गए सभी वादे निभाना अब भाजपा नेताओं के लिए मुश्किल हो रहा है.
एक ही क्षेत्र के कुछ पुराने विरोधियों के पार्टी में आ जाने से उनको संतुष्ट कर पाना बहुत कठिन हो रहा है. इस गणित में पार्टी के पुराने नेता-कार्यकर्ता उपेक्षित हो जा रहे हैं.
भाजपा ने हाल के महीनों में दूसरे दलों से बड़े पैमाने पर दल बदल कराए. उसकी रणनीति यूपी के ताक़तवर क्षेत्रीय दलों को कमज़ोर करने और अपना पाला मज़बूत करने की रही. बसपा ख़ासकर उसका निशाना बनी, जिसके कई पूर्व सांसदों और विधायकों को ख़ुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने गाजे-बाजे के साथ पार्टी में शामिल कराया.
इनमें दलित व पिछड़े नेता ही नहीं, सवर्ण भी हैं. कांग्रेस और सपा में भी सेंध लगाई गई. बेहतर संभावना देख कर बड़ी संख्या में नेता और टिकटार्थी ख़ुद भाजपा में आना चाहते थे. टिकट पाना सबकी शर्त थी.
दरअसल यूपी की सत्ता में आने के लिए इस बार भाजपा बहुत बेचैन है. दिल्ली और बिहार की पराजयों के बाद यह उसे यह बहुत महत्वपूर्ण लगता है, प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का जादू बनाए रखने के लिए और 2019 के लोक सभा चुनाव में बढ़त हासिल करने के लिए भी.
यूपी जीतने के लिए मोदी और शाह की रणनीति में दलितों-पिछड़ों पर मुख्य फ़ोकस है. प्रत्याशियों की अब तक घोषित सूची में इन जातियों के उम्मीदवारों को तवज्जो दी गई है. बाहरी नेताओं को बड़ी संख्या में टिकट देने की यह भी मजबूरी रही है.
दलबदलुओं का बाहें पसार कर स्वागत करते समय भाजपा नेतृत्व को निश्चय ही अंदाज़ा रहा होगा कि उन्हें अपनों की नाराज़गी झेलनी पड़ेगी. लेकिन यह इतनी बड़े पैमाने पर होगी, इसका अनुमान शायद न रहा हो.
भाजपा नेताओं-कार्यकर्ताओं का ग़ुस्सा अकारण नहीं है. 2014 के लोक सभा चुनाव के बाद से ही उन्हें विधान सभा चुनावों का बेसब्री से इंतज़ार रहा है. उन्हें लगता है कि लंबे समय बाद अब भाजपा के सत्ता में आने की प्रबल संभावना है. इस संभावना से पार्टी के भीतर ही प्रत्याशियों की लंबी सूची बनती गई.
वे अपने-अपने क्षेत्रों में पहले से ख़ूब मेहनत करते आए हैं. अब अचानक उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया और अपना विरोधी टिकट लूट ले गए.
भाजपा को ज़मीनी स्तर पर इस व्यापक असंतोष का नुक़सान होगा. सभी बाग़ियों को मनाना संभव नहीं होगा. ग़ुस्साए कार्यकर्ता अपने क्षेत्र में अपने ही विरोधी रहे बाहरी को जिताने में मेहनत नहीं कर पाएंगे. अमित शाह की टीम के लिए निश्चय ही यह बड़ी चुनौती है.
यूपी में भाजपा की मुख्य चिंता दलित-मुस्लिम एकता की संभावना थी. सपा के झगड़े और पार्टी में विभाजन से विचलित मुसलमान मतदाताओं के बसपा के साथ चले जाने के आसार बन रहे थे.
भाजपा विरोधी कुछ अन्य समूह भी तब बसपा के साथ जाते. इसकी काट भाजपा के लिए मुश्किल थी. सपा पर अखिलेश के एकछ्त्र नियंत्रण और कांग्रेस से उसके गठबंधन से यह संभावना क्षीण हुई है. अब मुसलमान भाजपा को हराने के लिए इस गठबंधन के साथ रह सकते हैं. यह भाजपा के लिए नई चुनौती होगा लेकिन इसका मुक़ाबला वह हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण से करने को पहले से तैयार हैं.
दलित वोटों के लिए मोदी और शाह ने काफ़ी प्रयास किए थे लेकिन बिहार की तरह यहां भी आरएसएस के एक पदाधिकारी ने भरभंड कर दिया. उसका कितना असर होगा? ग़ैर-यादव कुछ पिछड़ी जातियां उसका कितना साथ देंगी? अखिलेश यादव का बढ़ता लोकप्रियता ग्राफ़ क्या रंग लाएगा? नोटबंदी से उपजी और अब तक क़ायम ग्रामीण क्षेत्र की नाराज़गी कितना नुक़सान करेगी?
ये कुछ सवाल हैं जो भाजपा नेताओं की चिंता का सबब हैं. अपनों का व्यापक विद्रोह भी अब इसमें शामिल हो गया.
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