'हिंदुस्तानियों की ऐशगाह है यूएई'

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    • Author, पुष्पेश पंत
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक

संयुक्त अरब अमीरात के घटक देश आबू धाबी के युवराज इस वर्ष भारत के गणतंत्र दिवस के शाही मेहमान हैं और जिस गर्मजोशी से उनका स्वागत किया जा रहा है उसे देख कर ऐसा लगता है कि खाड़ी देश आने वाले दिनों में हमारे राजनय में अभूतपूर्व सामरिक संवेदनशीलता का क्षेत्र बनने वाले हैं.

यों, जिस तरह मोदी की मेहमाननवाजी वहां हुई थी उसे देखते इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं.

'प्रोटोकॉल' तोड कर किसी मेहमान की अगवानी के लिए प्रधानममत्री का हवाई अड्डे पर पहुंचना भी कोई नई बात नहीं.

हमारा मानना है कि अधिकांश हिंदुस्तानियों के लिए आबू धाबी, दुबई आदि ऐसी ऐशगाहें है जहां वह अपनी सब अतृप्त वासनाओं को संतुष्ट कर सकते हैं.

वह सोने के गहनों की खरीददारी हो या आधुनिकतम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लैस हो कर घर लौटना.

विडंबना यह है कि जब तक ऐसी उपभोक्ता सामग्री स्वदेश में दुर्लभ थी तब दुबई के करमुक्त बाजार चाहे कितना ही लुभावने रहे हों आज इनका आकर्षण चुंबकीय नहीं समझा जा सकता.

संयुक्त अरब अमीरात

हां, यह जरूर सही है कि जो देसी पर्यटक यूरोप या अमेरिका में गोरी चमडी से आतंकित रहते हैं उन्हें सैर सपाटे के लिए रेगिस्तान में बसाया यह कृत्रिम नखलिस्तान ही रास आता है.

केरल और अन्य भारतीय राज्यों से बडे पैमाने पर मजदूर-कारीगर और पेशेवर खाडी सल्तनतों में पहुंचते हैं और लगभग घर जैसे माहौल में मलयालम्, तामिल या हिंदी-पंजाबी बोलते मजे में अपनी गुजर कर लेते हैं.

थोडे समय की तकलीफ बर्दाश्त करके काफी कमाई करने के लिए 'यूएई' बेहतरीन मंजिले मकसूद समझी जाती है.

दिहाडी कमाने वाले ही नहीं फिल्मी सितारों और क्रिकेट खिलाडियों जैसी मशहूर हस्तियां भी किसी कुबेरनुमा अरब शेख की मजलिस में झलक दिखला कर मुंहमांगी बख्शीश वसूलते रहे हैं.

कुख्यात अपराधी दाऊद के साथ चाय पीने का जिक्र चिंटू कपूर अपनी आत्मकथा 'खुल्लम खुल्ला' में कर चुके हैं.

कुछ बरस पहले यह चर्चा गर्म रही थी कि किस उदीयमान तारिका को किस चाहने वाले ने कई लाख रुपयों की जवाहरातों से जड़ी कलाई घडी उपहार में दी थी.

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इस रिश्ते का एक पक्ष अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध से जुडा है.

मादक द्रव्यों की तस्करी हो या आतंकवादियों का अंतरिम मुकाम इन देशों की भूराजनैतिक अहमियत भारत की सुरक्षा के लिए काफी बडी है.

यह सुझाना नाजायज़ नहीं कि मोदी सरकार इस कांटे को निकाल फैंकने के लिए ही खाडी देशों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास कर रही है.

कुछ ही समय पहले यह समाचार मिला था कि दाऊद की संपत्तियों को दुबई में जब्त कर लिया गया है.

इशारों-इशारों में यह प्रचार किया गया था कि यह भारत सरकार की राजनयिक उपलब्धि है.

बीच-बीच में खाडी देशों में काम करने वाले गरीब तबके के हिंदुस्तानियों की दुर्दशा, उनके शोषण उत्पीडन की चिंताजनक खबरें भी मिलती रही हैं.

झांसा दे कर मासूम श्रमिकों को खाडी पहुंचाने वाले दलाल लंबे अरसे से सक्रिय रहे हैं.

यहां काम करने वाले भारतीयों की रक्षा का दायित्व यहां तैनात राजदूतों की कठिन जिम्मेदारी समझी जाती है.

यह काम भी आबू धाबी के शहजादे की सफल भारत यात्रा के बाद आसान हो सकता है.

काफी समय से भारत की कोशिश यह रही है कि वह पाकिस्तानी अवरोध को नाकाम कर ईरानी पोत चाबहार तक सीधा पहुंच सके.

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वह ओमान के जरिए पाकिस्तान की दखलंदाजी से दूर नए 'सागर मार्ग निर्माण' में जुटा रहा है.

इस परियोजना को भी खाडी के साझीदारों को शामिल कर गतिशील बनाया जा सकेगा ऐसी अपेक्षा हमारी सरकार की जान पडती है.

लुब्बो-लुबाब यह है कि आबू धाबी जैसे खाडी देश सिर्फ तेल उत्पादक होने के कारण ही आज महत्वपूर्ण नहीं समझे जाते.

भारत के राष्ट्रहित के संदर्भ में इनकी आर्थिक सामरिक उपयोगिता वास्तव में बहुआयामी है.

यह संतोष का विषय है कि इस घड़ी गणतंत्र दिवस परेड के सलामी मेहमान के बहाने ही आम आदमी का ध्यान 'दुबई खरीददारी धमाके' और 'बुर्ज खलीफा' की बुलंदी से हट कर दूसरे मुद्दों की ओर खींचा जा रहा है.

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