67 साल बाद भी दलितों को क्या मिला है?

    • Author, विवेक कुमार
    • पदनाम, प्रोफेसर, जेएनयू

भारत अपना 68वां गणतंत्र दिवस मना रहा है लेकिन यह भारतीय समाज की विडंबना ही है कि वो अब भी समाज में मौजूद भेदभाव और बराबरी के लिए संघर्ष कर रहा है.

जब हम भारतीय समाज की प्रवृति और उसकी दशा का विश्लेषण करते हैं तो एक तरफ़ यह पाते हैं कि संसाधनों और सत्ता पर कुछ लोगों का एकाधिकार है.

बहुसंख्यक आबादी संसाधनों और सत्ता में हिस्सेदारी से वंचित है.

इस वजह से भारतीय समाज में कई तरह के वंचित तबक़े मौजूद हैं फिर वो चाहे अनुसूचित जाति हो, अनुसूचित जनजाति हो या फिर अल्पसंख्यक समुदाय.

समय-समय पर इन जाति समुदायों को लेकर कई आयोगों का गठन हुआ है और इन सभी आयोगों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सामान्य जाति के लोगों की तुलना में इन वंचित समूहों के लोग समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक मापदंडों पर पिछड़े हुए हैं.

अगर हम दलितों की बात करें तो उन्हें भारतीय समाज में घोर भेदभाव और बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़ साल 2014 में दलितों के ख़िलाफ़ 47,064 अपराध के मामले दर्ज किए गए हैं और साल 2015 में दलितों पर होने वाले अत्याचारों में इससे थोड़ा ही ज़्यादा और कम का अंतर है.

दूसरे शब्दों में इन आकड़ों को पेश करें तो दलितों पर प्रतिदिन 123 अत्याचार के मामले दर्ज होते हैं.

इसी तरह से एक समाजिक अध्ययन में यह कहा गया है कि दलित अभी भी भारत के गांवों में कम से कम 46 तरह के बहिष्कारों का सामना करते हैं.

जिसमें पानी लेने से लेकर मंदिरों में घुसने तक के मामले शामिल हैं.

हाल ही में महाराष्ट्र (खैरलांजी), आंध्र प्रदेश (रोहित वेमुला), गुजरात (उना), उत्तर प्रदेश (हामीरपुर), राजस्थान (डेल्टा मेघवाल) में हुए दलित उत्पीड़न के मामलों से यह साबित होता है कि संविधानिक गणतंत्र बनने के 67 साल बाद भी दलितों के साथ असमानता, अन्याय और भेदभाव वाला व्यवहार होता है.

67 साल पहले 1950 में जब हमने संवैधानिक गणतंत्र को अपनाया था तब सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक और धार्मिक रूप से बहिष्कृत जाति के लोगों को मौलिक और कुछ विशेष अधिकार मिले थे.

मौलिक अधिकारों के अलावा ये विशेष अधिकार संविधान ने उन्हें दिए थे. संविधान की धारा 330, 332 और 244 के मुताबिक़ उन्हें राज्य, देश और स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया.

धारा 335 के तहत उन्हें सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में प्रतिनिधित्व दिया गया. उन्हें शैक्षणिक संस्थानों में दाख़िला लेने में भी छूट दी गई.

हालांकि सामाजिक रूप से प्रताड़ना झेलने के अलावा दलितों को सरकारी संस्थानों में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है.

न्यायिक व्यवस्था, नौकरशाही, सरकारी महकमों, उच्च शिक्षण संस्थाओं, उद्योग-धंधों और मीडिया में दलितों की उपस्थित लगभग नहीं के बराबर है.

राजनीतिक दलों में भी दलितों के साथ-साथ भेदभाव होता है और शीर्ष नेतृत्व पर तथा-कथित ऊंची जातियों का दबदबा रहता है.

दलितों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के तहत रखा जाता है और वो सिर्फ़ आरक्षित सीटों पर सामान्य जाति के वोटरों के रहमो-करम पर ही चुने जाते हैं.

जो दलित नेता राजनीति में अपनी ताक़त दिखाने की कोशिश करता है, उसे बाहर का दरवाज़ा दिखा दिया जाता है.

वैसे दब्बू दलित नेताओं को तरजीह दी जाती है जो पार्टी के निर्णायक मंडल में नहीं होते हैं.

इन्हें सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक दल अपने मंत्रिमंडल में महत्व नहीं देते हैं.

उनके लिए सशक्तिकरण और न्याय से जुड़ा हुआ मंत्रालय एक तरह से तय रहता है. (आप मौजूदा केंद्र सरकार का मंत्रिमंडल भी देख सकते हैं.)

हम देख सकते हैं कि कैसे लोकतंत्र का इस्तेमाल दलितों के राजनीतिक संघर्षों को कुचलने के लिए किया जाता है.

दलित राजनीतिक पार्टियों को जानबूझ कर दलबदल-विरोधी क़ानून के तहत फंसाया जाता है.

वहीं दूसरी ओर इस मामले में कोर्ट में भी देरी से फ़ैसला आता है.

1990 के दशक से लेकर अब तक दलितों के आर्थिक बहिष्कार को एक तरह से सभी सरकारों की ओर से मान्यता मिली हुई है.

कांग्रेस की सरकार ने अपने नव-उदारवादी एजेंडे के तहत दलित उद्यमियों की गोलबंदी की थी जिसे दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डीआईसीसीआई) का नाम दिया गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस संगठन को दिसंबर 2015 में फिर से लॉन्च किया.

दोनों ही सरकारें यह साबित करने में नाकाम रही हैं कि भूमंडलीकरण दलितों के लिए फ़ायदेमंद है.

हालांकि ये सरकारें डीआईसीसीआई को एफ़आईसीसीआई के साथ ले आने में नाकाम रही. अगर भूमंडलीकरण और नवउदारवाद दलितों का उद्धार करने वाला क़दम था तो फिर डीआईसीसीआई को एफ़आईसीसीआई के साथ होना चाहिए.

दलितों के लिए अलग से इस तरह के संगठन की ज़रूरत ही नहीं थी. यह एक तरह का पीछे ले जाने वाला और अलगाव की भावना को बढ़ाने वाला क़दम है.

लगातार इसतरह के भेदभाव का शिकार होने के कारण दलितों ने आंदोलन छेड़ रखे हैं. इसलिए पिछले 67 सालों में हम सामाजिक-आर्थिक सुधारों के लिए आंदोलन, राजनीतिक आंदोलन, दलित कामगारों का आंदोलन और दलित साहित्य का आंदोलन देख चुके हैं.

दलितों ने अपने प्रतीक पुरुष और महिलाएं खड़े किए हैं जो दलितों को लामबंद कर सकें.

इनमें बुद्ध, रविदास, कबीर और दादु, ज्योतिबा फुले और सावित्री फुले, नारायण गुरु, छत्रपति शिवाजी, इवी रामासामी नाइकर (पेरियार) और सबसे ऊपर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का नाम शामिल हैं.

बाबा साहब ने दलितों में एक नया विश्वास पैदा किया था.

दलित आंदोलन दूसरे वंचित तबक़ों के साथ मिलकर एक व्यापक गठबंधन तैयार करने की कोशिश में लगा हुआ है.

हम 68वें गणतंत्र दिवस के इस मौक़े पर यह कह सकते हैं कि देश में लोकतंत्र की कमी है और इसकी वजह से दलितों को भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है और वे आंदोलनरत हो रहे हैं.

हालांकि यह भी सच है कि इस तरह के आंदोलनों की मौजूदगी यह बताती है कि अभी भी इस लोकतंत्र के अंदर गुंजाइश बची हुई है.

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