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जल्लीकट्टू: 'जानवर कोई इंसान नहीं होते'
- Author, निखिल रंजन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
तमिलनाडु में जल्लीकट्टू को प्रतिबंधित करने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदलवाने के लिए तमिलनाडु सरकार शनिवार को एक अध्यादेश लेकर आई.
मामले के स्थायी समाधान के लिए राज्य में कई जगहों पर जारी प्रदर्शनों के मद्देनज़र विधानसभा में मौजूदा क़ानून में बदलाव कर पशु क्रूरता निवारण (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम, 2017 प्रस्ताव पारित किया गया.
तमिल नव वर्ष पोंगल के मौक़े पर जल्लीकट्टू में एक सांड को कई लोग क़ाबू करने की कोशिश करते हैं और उसकी सींग से बंधे कपड़े को खोलते हैं.
पशु कल्याण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं की एक अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था. कार्यकर्ताओं का कहना था कि जल्लीकट्टू खेल के दौरान बैलों के साथ क्रूरता की जाती है.
नया क़ानून बनाकर जल्लीकट्टू को जारी रखना क्या जानवरों के साथ क्रूरता नहीं है?
इस सवाल के जवाब पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू कहते हैं, "भारत बड़ी विभिन्नताओं का देश है, अगर हमें इसे एकजुट रखना है तो भारत के सभी भागों की परपंराओं और भावनाओं का ख़्याल रखना होगा. जल्लीकट्टू तमिलनाडु का एक परंपरागत खेल है जो सैकड़ों सालों से चला आ रहा है. अगर इस खेल में कुछ क्रूरता होती है जैसे जानवर के आंख में मिर्ची रगड़ना, दुम काट देना या शराब पिलाना, तो इसे प्रतिबंधित कर देना चाहिए. वरना यह एक खेल है, इसमें क्या हर्ज़ है? उसमें जानवर को मारा नहीं जाता है जैसे स्पेन में बुल फाइटिंग के दौरान जानवर को मारा जाता है."
मार्कंडेय काटजू कहते हैं कि जहां तक क्रूरता की बात है अगर आप मछली पकड़ते हैं तो उसमें भी क्रूरता है.
उन्होंने कहा, "आप मछली को पानी के बाहर निकालेंगे, जिससे वो हवा में सांस नहीं ले सकती और तड़प-तड़प कर मर जाती है, तो क्या मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? तमाम लोग हलाल मीट खाते हैं जिसमें जानवर की गर्दन धीरे-धीरे काटी जाती है, तो क्या मीट और ख़ासकर हलाल मीट पर पाबंदी लगा दी जाए?"
काटजू कहते हैं कि घुड़सवारी के दौरान घोड़े को तेज़ दौड़ाने के लिए उसके पेट में घुड़सवार अपने तलवे से मारता है और घोड़े को रोकने के लिए उसके मुंह में लोहे की लगाम डाली जाती है, तो क्या ये घोड़े के प्रति क्रूरता नहीं हुई? वे कहते हैं कि इसी तरह आप जब कुत्ते को ट्रेनिंग देते हैं तो भी कुछ क्रूरता होती है. इसी तरह हर जानवर के साथ कुछ ना कुछ क्रूरता तो होती ही है. वरना आप जानवरों से दूर रहिए. हालांकि काटजू मानते हैं कि जानवरों पर अत्यंत क्रूरता नहीं होनी चाहिए.
काटजू कहते हैं, "जानवर कोई इंसान तो होता नहीं है. आप जानवर को इंसान के बराबर नहीं मान सकते".
हालांकि एक सवाल ये भी उठता है कि जल्लीकट्टू को प्रतिबंधित करने का फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट ने काफी विचार विमर्श के बाद किसी आधार पर किया होगा. जल्लीकट्टू पर अब राज्य सरकार के रूख़ से क्या सरकार और न्यायपालिका के बीच दूरी बढ़ने की आशंका नहीं है?
इस सवाल के जवाब में पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू कहते हैं कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को नहीं बदल रही है. सरकार क़ानून को बदल रही है जो हमेशा बदला जा सकता है.
वो कहते हैं कि फ़ैसले को कभी भी रद्द नहीं किया जा सकता लेकिन उसके क़ानूनी आधार को बदला जा सकता है.
काटजू कहते हैं, "पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया. अगर इस क़ानून को बदल दीजिए तो वो फ़ैसला तमिलनाडु में नहीं लागू होगा. इससे पहले भी ऐसा कई बार हुआ है कि जब कोई केस अदालत में चल रहा था तो उस वक़्त क़ानून में बदलाव किए गए."
कुछ लोगों का कहना है कि लोगों की भीड़ और प्रदर्शन के दबाव में सरकार ने कार्रवाई की है.
इस पर काटजू सवाल करते हैं कि "तो क्या जनता को दबाव डालने का अधिकार नहीं है? तो फिर लोकतंत्र होता क्या है? जनता की आवाज़ ना सुनी जाए? जनता अपनी आवाज़ न उठाए तो फिर लोकतंत्र कहां बचा?"
कल को किसी अन्य मसले पर जनता की भीड़ सरकारों को फ़ैसले बदलने के लिए इसी तरह मजबूर कर सकती है?
इस आशंका पर मार्कंडेय काटजू कहते हैं, "जल्लीकट्टू तमिलनाडु की संस्कृति का हिस्सा है. 2000 साल पुराने तमिल संगम साहित्य में जल्लीकट्टू का वर्णन है. तमिल लोगों को जल्लीकट्टू से बड़ा लगाव है. हमें इसका ध्यान रखना पड़ेगा. वो आवाज़ उठा रहे हैं कि इसे जारी रखे दिया जाना चाहिए. हमारे उत्तर भारत के लोगों के जल्लीकट्टू से प्रेम नहीं हो, मगर तमिलनाडु के लोगों को है, तो उनकी भावनाओं और परंपराओं को आप बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर सकते हैं? तो फिर कैसे भारत एकजटु रहेगा?"
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