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क्या गोवा में फिर आएगा राजनीतिक अस्थिरता का दौर?
- Author, डॉ. राहुल त्रिपाठी
- पदनाम, प्रोफ़ेसर, गोवा यूनिवर्सिटी, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
गोवा मूल के पुर्तगाली प्रधानमंत्री अंटोनियो डि कोस्टा जब हाल में गोवा के दौरे पर आए तो उन्होंने पोंडा के नज़दीक शताब्दियों पुरानी मांगुशी मंदिर में जाकर पूजा अर्चना की. यह इस राज्य का ख़ास मंदिर है जो गोवा की पारंपरिक पहचान का हिस्सा है.
कोस्टा का ये दौरा इसलिए ख़ास था क्योंकि इन दिनों गोवा में चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज़ हैं. राज्य में चार फरवरी को चुनाव होने हैं. संयोग ऐसा है कि चार फरवरी, 2017 को गोवा के उस ऐतिहासिक जनमत सर्वेक्षण के पचास साल पूरे हो रहे हैं जो अपनी तरह का भारत का पहला सर्वेक्षण था. इसे 1967 में गोवा के भविष्य की पहचान के मुद्दे पर करवाया गया था.
करीब साढ़े चार सौ साल पुराने पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन काल का गोवा की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत पर काफी असर पड़ा था. 1961 में गोवा पुर्तगाल से मुक्त हुआ, लेकिन उसकी पहचान का मुद्दा राज्य की राजनीति को प्रभावित करता रहा.
पुर्तगाल से आज़ाद होने के बाद गोवा केंद्र शासित प्रदेश रहा. 1967 के ऐतिहासिक जनमत सर्वेक्षण में लोगों ने अपनी अलग पहचान को कायम रखते हुए महाराष्ट्र के साथ विलय के सुझाव को ख़ारिज कर दिया था.
राज्य में दूसरी बार पहचान का मुद्दा बेहद अहम राजनीतिक मुद्दा तब बना जब 1980 में कोंकणी भाषा को लेकर काफी विरोध प्रदर्शन हुए. शुरुआती लड़ाई का नतीजा ये निकला कि गोवा 1987 में पूर्ण राज्य बना और कोंकणी को राज्य भाषा का दर्जा मिला.
हाल फिलहाल में पहचान से जुड़ा मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक हलकों में विभिन्न स्तर पर गर्माता रहा है. ये मुद्दा इसलिए भी गर्माया हुआ है क्योंकि बीते दो दशक के दौरान गोवा में बाहरी लोगों का दबदबा लगातार बढ़ रहा है, ख़ासकर ख़नन, रियल एस्टेट और टूरिज़्म के क्षेत्र.
इसके चलते ही गोवा के आम लोगों के बीच इस बात की धारणा बढ़ रही है और वे विभिन्न सेगमेंट में स्पेशल स्टेटस की मांग कर रहे हैं, जिसे पहले केंद्र ख़ारिज कर चुका है.
बीते दो चुनाव के दौरान ये विवाद इतना बढ़ा है कि गोवा आरएसएस में विभाजन होकर गोवा सुरक्षा मंच (जीएसएम) बन गया. यह राजनीतिक फ्रंट राज्य की बीजेपी सरकार के उस फ़ैसले का विरोध कर रहा है जिसके मुताबिक सरकार अंग्रेजी माध्यम में प्राथमिक शिक्षा देने वाले स्कूलों को अनुदान दे रही है जबकि कोंकणी और मराठी भाषी स्कूलों को नहीं.
इस मसले के चलते राज्य में काफी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ है और बहुत संभावना इस बात की है कि कैथोलिक वोट इस बार बीजेपी को ना मिल सके. इन लोगों के वोट से ही 2012 में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई थी.
सतारूढ़ गठबंधन में एक और धड़ा अलग हुआ जब महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी), जिसने महाराष्ट्र के साथ गोवा के विलय का प्रस्ताव रखा था और हाल फिलहाल तक वह बीजेपी की जूनियर सहयोगी पार्टी थी.
एमजीपी ने नीतियों पर असहमति के कारण बीजेपी से गठबंधन तोड़कर जीएसएम का दामन थाम लिया.
प्रधानमंत्री कोस्टा की गोवा यात्रा के दौरान नए बने गठबंधन ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का मौका नहीं गंवाया. एमजीपी ने पुर्तगाली प्रधानमंत्री से माफ़ी मांगने की मांग की. उनसे पुर्तगाली औपनिवेशिक काल के दौरान किए अत्याचार के बदले में माफ़ी मांगने को कहा गया.
इस मांग के ज़रिए एमजीपी ने राज्य बीजेपी के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने असमंजस की स्थिति पैदा की क्योंकि मोदी ने बेंगलुरु में हाल में आयोजित अप्रवासी भारतीय सम्मेलन में कोस्टा को सम्मानित किया था.
इन सब वजहों से 2017 का गोवा चुनाव इतिहास, पहचान और राजनीति के चलते बेहद दिलचस्प बन गया है. गोवा के इतिहास में किसी चुनाव के दौरान इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप देखने को नहीं मिले.
प्रत्येक पार्टी के समर्थकों की संख्या इतनी कम है कि अगर मतदाताओं के रूख में थोड़ा भी स्विंग दिखा तो उसका नतीजों पर बहुत बड़ा असर पड़ सकता है.
हाल ही में गोवा के मशहूर कार्टूनिस्ट एलेक्सज़ ने एक कार्टून बनाया था जिसमें गोवा के पुर्तगाली शासन के पूरे चक्र को दिखाया गया है. ऐसे में लोग बस यही उम्मीद कर रहे हैं कि गोवा में 1990 के दशक की अस्थिरता वाला दौर वापस नहीं लौटे जब लोग अकेले दम पर सरकार बनाने और गिराने लगे थे और तब सरकारें सप्ताहों में बदलने लगी थीं.
( लेखक राहुल त्रिपाठी गोवा यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं.)
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