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क्या ये सिर्फ़ जल्लीकट्टू पर बैन का विरोध है?
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक वीएस नायपॉल ने एक बार लिखा था कि भारत अपने आप में लाखों छोटे-छोटे विद्रोहों का देश है.
ऐसा ही एक विरोध हाल के दिनों में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में समुद्र किनारे देखने को मिला.
तमिलनाडु के पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध के विरोध में समुद्र तट पर महिलाएं, पुरुष, छात्र, मज़दूर खुले आसमान के नीचे रातें काटते नज़र आए.
न कोई तीखे नारे ना ही कोई उपद्रव, ये लोग सुबह सुबह समुद्र तट को साफ़ करते हैं और खाना-पानी आपस में बांटते हैं. विद्रोह शांतिपूर्ण और ज़िम्मेदाराना रहा है.
चेन्नई के बाहर भी करीब 150 जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं.
अनुमान है कि शुक्रवार को हुए राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया और इस बीच तमिलनाडु सरकार ने भी हालात पर क़ाबू पाने के लिए कड़ी मशक्कत की.
एक दिन के बंद से तमिलनाडु में सार्वजनिक परिवहन प्रभावित हुआ, स्कूल-कॉलेज बंद रहे और बाज़ार बंद रहे.
इतना ही नहीं ऑस्कर जीतने वाले मशहूर संगीतकार एआर रहमान ने ट्वीट कर कहा कि वो जल्लीकट्टू के समर्थन में उपवास रखेंगे.
क्रिकेट और फ़िल्म जगत के सितारे भी जल्लीकट्टू पर बैन के विरोध में खुलकर बोल रहे हैं.
एक अख़बार ने तो इस विरोध को 'भारत का अरब बसंत' तक कह दिया है.
एक स्थानीय पत्रकार के मुताबिक 200 युवाओं से शुरू हुआ ये विरोध प्रदर्शन अब एक बड़ा आंदोलन बन चुका है.
एक ऐसा आंदोलन जिसका कोई नेता नहीं और ज़्यादातर शांतिपूर्ण आंदोलन.
जल्लीकट्टू, जिसे लेकर इतना हंगामा बरपा है वो जनवरी में तमिलनाडु में मनाए जाने वाले पोंगल के पर्व पर खेला जाने वाला एक खेल है.
इसे खेलने वाले मज़बूत नौजवान, सांड को काबू में करने की कोशिश करते हैं.
जल्लीकट्टू में जिन सांडों का इस्तेमाल होता है वो ज़्यादातर मंदिरों के होते हैं.
बाड़ों से सांडों को छोड़ा जाता है, इनाम तब मिलता है जब खेल में हिस्सा लेने वाले नौजवान सांडों के कूबड़ को 15 से 20 मिनट तक पकड़े रहें या फिर सांड तीन बार कूद जाए.
जल्लीकट्टू का विरोध कर रहे कार्यकर्ता इसे जानवरों की साथ क्रूरता करार देते हैं.
वहीं सांडों के मालिकों और जल्लीकट्टी के समर्थक इस आरोप को ख़ारिज करते हैं.
वो कहते हैं कि करीब 2000 साल पुरानी ये परंपरा तमिलनाडु के लोगों की जीवनशैली का हिस्सा है.
यहां तक कि पशुओं के मालिकों का कहना है कि वे अपने जानवरों की अच्छी देखभाल करते हैं.
केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस पर्व को हिंसा और हत्या का दिन करार दिया, उन्होंने कहा कि ये वो दिन है जब लड़के सांडों पर कूदते हैं और उनके सींग उखाड़ने की कोशिश करते हैं.
मेनका गांधी ने लिखा है कि भारत में सभी इसे नीची नज़रों से देखते हैं, वैसे ही जैसे सभ्य लोगों को देखना चाहिए. इस बात के लिए मेनका गांधी का विरोध भी हुआ.
विज़न इंडिया फ़ाउन्डेशन के शोध सहायक श्याम कृष्ण कुमार ने कहा कि ये बयान उस महानगरीय सोच को दिखता है जो कि खुद को तो आधुनिक, प्रगतिशील समझता है जबकि ग्रामीण भारत को पिछड़ा हुआ और बर्बर दिखाता है. इससे ऐसा लगता है कि ग्रामीण भारत को बचाने की ज़रूरत है.
श्याम कृष्ण कुमार कहते हैं कि वाकई लोगों के जीवन से जुड़ने की कोशिश गंभीर कोशिश नहीं हो रही बल्कि उन्हें सभ्य बनाने का मिशन है जो जबरन थोपा जा रहा है.
पिछले करीब एक दशक से अदालत में जल्लीकट्टू के भविष्य की लड़ाई लड़ी जा रही है.
साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा पर बैन लगा दिया और अदालत के फ़ैसले के खिलाफ़ पिछले साल एक अपील पर इस बैन को जारी रखा.
लेकिन जनवरी में शुरू हुए 'टेकिंग द बुल्स बाय हॉर्न्स' अभियान जैसा कुछ मैंने हाल के समय में नहीं देखा है.
एक तरह से लोगों के जुड़ते जाने पर शुरू हुए इस विरोध का नेतृत्व कोई राजनीतिक दल नहीं कर रहा.
तमिलनाडु के जातीय समीकरणों और विभाजनों से ऊपर उठकर लोग इसमें जुड़ रहे हैं.
इनमें छात्र हैं, इंफ़ोटेक इंजीनियर, फ़ैक्ट्री मज़दूर, परमाणु संयंत्रों का विरोध करने वाले कार्यकर्ता और अन्य आम लोग इसमें शामिल हो रहे हैं.
नोटबंदी और उसके बाद नक़दी की कमी, सिनेमा हॉल में फ़िल्म से पहले और बाद में अनिवार्य रूप से राष्ट्रगान बजाने के अदालत के फ़ैसले पर भी लोगों की नाराज़गी यहां झलक रही है.
जीएम फ़सलों और तमिलनाडु में परमाणु संयंत्र का विरोध करने वालों ने इसे अपनी बात रखने का मौका बना लिया है.
यहां तमिलनाडु के वो किसान भी पहुंच रहे हैं जो कर्नाटक से जारी जल विवाद को लेकर चिंतित हैं कि उन्हें उनके हिस्से का पानी नहीं मिल रहा.
लेकिन बात जल्लीकट्टू की है, चेन्नई के समुद्र किनारे जमा हुए लोगों में से बहुतों का कहना है कि उन लोगों की इस बात की चिंता है कि केंद्र सरकार, अदालतें और दिल्ली में बैठे रसूखदार लोग तमिलनाडु की स्थानीय परंपराओं और संस्कृति का अपमान कर रहे हैं.
यहां से उठने वाली आवाज़ों में कहीं न कहींदेश को एकरूपता के धागे में बांधने की केंद्र के आकाओं की कथित मंशा के विरोध की गूंज सुनाई देती है.
इतिहासकार ए आर वेंकटचालापथी कहते हैं , ''जल्लीकट्टू सिर्फ़ एक ट्रिगर था, दरअसल ये विरोध तमिलनाडु के लोगों के केंद्र और न्यायापालिका के बीच भरोसे की खाई दिखाता है.''
वेंकटचालापथी कहते हैं कि कई लोग दिल्ली के मीडिया पर भी भरोसा नहीं करते. वो मानते हैं कि मीडिया तमिल लोगों और उनकी प्रथाओं की अजीब छवि पेश करता है.
हालांकि अन्य आंदोलनों की तरह चेन्नई के समुद्र तट पर हो रहे इस विरोध की भी हवा निकलना लगभग तय है क्योंकि राज्य सरकार ने अस्थाई कानून लाकर फ़िलहाल जल्लीकट्टू का आयोजन करवाने का रास्ता साफ़ करने का आश्वासन दिया है.
यहां जमा लोग वैश्वीकरण में अपनी पहचान और संस्कृति के खो जाने के डर का आईना हैं लेकिन शायद सरकारों को इसकी परवाह नहीं.
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