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'जल्लीकट्टू हमारे गौरव और संस्कृति का प्रतीक है'
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
आज गुरुवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात की जिसमे मोदी ने कहा कि जल्लीकट्टू का मामला अदालत का है इसलिए वो इसमें दखल नहीं दे सकते. लेकिन प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री को ये ज़रूर आश्वासन दिया कि जल्लीकट्टू मुद्दे पर केंद्र सरकार राज्य सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का समर्थन करेगी.
प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के बयान से असंतुष्ट हैं. उन्होंने कहा कि उनका आंदोलन जारी रहेगा जो पिछले तीन दिनों से चेन्नई और तमिलनाडु के दूसरे शहरों में जारी है. जल्लीकट्टू पर लगी पाबंदी के खिलाफ प्रदर्शन दिल्ली में भी जारी है
आखिर जल्लीकट्टू है क्या और उस पर लगी पाबंदी से तमिल समुदाय इतना नाराज़ क्यों है?
जल्लीकट्टू है क्या?
जल्लीकट्टू तमिल नाडु के ग्रामीण इलाक़ों का एक परंपरागत खेल है जो पोंगल त्यौहार पर आयोजित कराया जाता है और जिसमे बैलों से इंसानों की लड़ाई कराई जाती है. जल्लीकट्टू को तमिलनाडु के गौरव तथा संस्कृति का प्रतीक कहा जाता है. तमिलनाडु से सुप्रीम कोर्ट के वकील वी. सालियन के अनुसार ये 5000 साल पुराना खेल है जो उनकी संस्कृति से जुड़ा है.
इस तरह का खेल स्पेन में भी होता है जिसे बुल फाइट कहते हैं और वहां ये खेल काफी लोकप्रिय है.
जानवरों की सुरक्षा वाली संस्था पेटा के अनुसार जल्लीकट्टू खेल के दौरान बैलों के साथ क्रूरता की घटनाएं होती हैं. इलज़ाम ये भी है कि बैलों को नशीले पदार्थ खिलाये जाते हैं. लेकिन प्रदर्शनकारियों के अनुसार ये सारे आरोप ग़लत हैं.
चेन्नई से दिल्ली आये एक प्रदर्शनकारी बल्ली कुमार कहते हैं कि स्पेन के बुल फाइट में जानवरों के साथ क्रूरता का बर्ताव होता है लेकिन तमिल नाडु में नहीं. वो कहते हैं, "हम सालों से बैल को अपने एक परिवार के सदस्य की तरह पालते हैं. खेल के दौरान उनके साथ क्रूरता नहीं होती."
इस खेल पर प्रतिबन्ध कब लगा?
जानवरों की सुरक्षा करने वाली संस्था पेटा इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गयी. अदालत ने 2014 में इस खेल पर पाबंदी लगाने का फैसला सुनाया.
लेकिन अब प्रदर्शन क्यों?
प्रदर्शनकारी बल्ली कुमार ने कहा, "हमने दो साल इंतज़ार किया कि पाबंदी उठाने की हमारी मांग पूरी की जायेगी लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो अब हम सड़कों पर आने पर मजबूर हुए." कुमार के अनुसार अब वो अपना आंदोलन उसी समय समाप्त करेंगे जब उनकी मांग पूरी होगी.
सहज विरोध प्रदर्शन है या इसकी पहले से तैयारी चल रही थी?
दिल्ली के प्रदर्शन में मौजूद लोगों के अनुसार ये प्रदर्शन खुद से शुरू हुआ. इसे किसी पार्टी या नेता ने नहीं शुरू किया. इसकी तुलना पिछले साल होने वाले मराठा आंदोलन से की जा सकती है जिसका नेतृत्व किसी नेता या पार्टी ने नहीं किया था.
चेन्नई के मरीना बीच में हज़ारों की संख्या में विद्यार्थियों, तकनीकी कामगारों, अभिनेताओं और अनन्य अहम लोगों ने पिछले तीन दिनों से प्रदर्शन जारी रखा हुआ है. कुमार ने कहा कि ये अब एक जन आंदोलन में बदल गया है.
लेकिन एक तमिल चैनल के पत्रकार ने कहा कि कुछ लोगों का मानना है कि राज्य की ख़ास विपक्षय पार्टी डीएमके इसके पीछे हो सकती है. सत्ता चलाने वाली एआईएडीएमके पार्टी के दौर में पाबंदी लगी थी जिसका इस पार्टी ने उस समय विरोध नहीं किया था.
इसी लिए डीएमके को लगता है कि इस मुद्दे के ज़रिये एआईडीएमके के खिलाफ माहौल बनाया जा सकता है.
तमिल पहचान पर प्रहार?
लेकिन प्रदर्शनकारी कहते हैं कि इस आंदोलन में सब एक साथ हैं. कुमार के साथी सलील ने कहा, "ये हमारी तमिल पहचान पर प्रहार है. ये हमारी संस्कृति पर हमला है. इस में सब मिल कर प्रदर्शन कर रहे हैं"
प्रदर्शनकारियों में क्रोध क्यों?
दिल्ली में तमिल नाडु हाउस के बाहर और जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारी उत्तेजित नज़र आ रहे थे. वो बार-बार पेटा और दीगर एनजीओ के खिलाफ नारे लगा रहे थे.
कुछ लोगों के इस सुझाव पर कि ये प्रधर्शन ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले नागरिकों बनाम शहरों में बसने वाले लोगों के बीच एक सांस्कृतिक मतभेद का नतीजा है.
वहां प्रदर्शन में भाग लेने वालों ने कहा कि ये तर्क सही नहीं है. उन्हों ने इस सुझाव को भी खारिज कर दिया कि ये उच्च जाति बनाम निम्न जाति की लड़ाई है. कहा जाता है कि उच्च जाति के लोग जल्लीकट्टू पर लगी पाबंदी का समर्थन करते हैं.
प्रदर्शनकारी कहते हैं ये उन्हें विभाजित करने की मीडिया की एक चाल है. कुछ लोगों का ये भी तर्क है कि ये प्रदर्शन उत्तर भारत के कथित प्रभुत्व के खिलाफ एक भावुक आवाज़ है. लेकिन इस तर्क को भी प्रदर्शन में मौजूद लोगों ने खारिज कर दिया.
प्रदर्शन ज़ोर पकड़ता जा रहा है. चेन्नई के मरीना बीच पर मंगलवार रात से ही हज़ारों लोग इकट्ठा हो गए थे जो अब तक प्रदर्शन कर रहे हैं. राज्य के अनन्य शहरों में भी प्रदर्शन हो रहे हैं.
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