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चाचा-भतीजे के बीच यह दूरी किसने पैदा की ?
- Author, रामदत्त त्रिपाठी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
चुनाव आयोग ने साइकिल तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सौंप दी है, पर अभी यह नहीं पता कि चाचा शिवपाल यादव को उस साइकिल के कैरियर पर बैठने की जगह मिलेगी या नहीं.
शिवपाल का अगला क़दम भी बहुत कुछ इसी बात पर निर्भर करता है कि अखिलेश की समाजवादी पार्टी में उनकी क्या जगह है.
शिवपाल और अखिलेश के बीच रिश्तों में गाँठ अब से पाँच साल पहले पड़ गई थी. मार्च 2012 में विधान सभा में बहुमत मिलने के बाद अखिलेश ने मुख्यमंत्री पद लेने का दबाव बनाया था.
उस समय शिवपाल और आज़म खान ने उन्हें रोकने के लिए यह प्रस्ताव रखा था कि 2014 के लोक सभा चुनाव तक मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री रहें. इससे लोक सभा चुनाव में बेहतर परिणाम आएंगे और फिर मुलायम केंद्र की राजनीति में जाने के बाद अखिलेश मुख्यमंत्री की गद्दी सम्भालें.
लेकिन अखिलेश अड़ गए. उस समय मुलायम सिंह की सेहत बहुत अच्छी नहीं थी. अखिलेश को डर लगा होगा कि बाद में चाचा उन्हें किनारे करके गद्दी पर दावा न ठोंक दें, इसलिए वह अड़ गए.
उस लड़ाई में दूसरे चाचा राम गोपाल ने अखिलेश का साथ दिया. इसलिए सरकार में अंदर ही अंदर राम गोपाल का महत्व बढ़ता गया और शिवपाल का महत्व घटता गया.
लेकिन शिवपाल ने पार्टी के अंदर अपनी राजनीतिक पकड़ बढ़ाने के लिए विधायकों और ज़मीनी कार्यकर्ताओं को पालना पोसना जारी रखा. वह आम लोगों से मिलने के लिए नियमित जनता दरबार लगाने लगे.
ये सब जाकर मुलायम के दरबार में शिवपाल की तारीफ़ करते और मुख्यमंत्री की आलोचना.
मुलायम ने खुले आम मुख्यमंत्री की आलोचना शुरू कर दी. इस तरह बाप बेटे में दूरियाँ बढ़ीं और दोनो भाई करीब आते गए.
उधर शिवपाल ने अपने बेटे आदित्य को उत्तर प्रदेश सहकारी संघ का अध्यक्ष चुनवाकर लखनऊ में स्थापित कर दिया.
समानांतर इमेज बिल्डिंग के लिए शिवपाल ने मीडिया के साथ रिश्ते भी बढ़ाए.
इन सबसे चाचा भतीजे के बीच खटास बढ़ने लगी.
माना जाता है कि शिवपाल और उनकी पत्नी सरला यादव ने अखिलेश की सौतेली माँ साधना गुप्ता से अपने सम्बंध प्रगाढ़ किए. अखिलेश को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई थी.
पिछले लोक सभा चुनाव में चर्चा चली थी कि मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक आज़मगढ़ से लोक सभा चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन अंत में मुलायम स्वयं लड़े और प्रतीक ने अपने को बिज़नेस में सीमित रखा इसलिए उस समय कलह सामने नहीं आई.
पर अभी कुछ समय पहले शिवपाल यादव ने प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव को लखनऊ कैंट से विधान सभा उम्मीदवार घोषित करके एक तरह से अखिलेश के मन में इस शंका को और मज़बूत कर दिया कि चाचा आगे चलकर विधान सभा चुनाव के बाद उनके नेतृत्व को चुनौती दे सकते हैं.
इसलिए अखिलेश चाहते थे कि उनको पहले से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए और चुनाव में टिकट बाँटने यानी उम्मीदवार तय करने का पूरा अधिकार उनको मिले.
शिवपाल ने यह दोनों काम नहीं होने दिए. इसलिए झगड़ा बढ़ता गया.
शिवपाल बराबर यह होशियारी बरतते हैं कि अपने को मुलायम का सेवक या हनुमान की तरह पेश करें.
दूसरी ओर अखिलेश ऊपर से तो पिता के प्रति आदर भाव दिखाते हैं लेकिन तमाम फ़ैसलों में उनकी अवहेलना करके राम गोपाल को ज़्यादा महत्व देते हैं.
मुलायम के लिए भी यह सम्भव नहीं कि वे अखिलेश को ख़ुश रखने के लिए लक्ष्मण जैसे भाई या छोटे बेटे के परिवार को छोड़ दें.
अखिलेश तो मुख्यमंत्री पिता के बेटे हैं और इसलिए कुर्सी के साथ सत्ता की कूटनीति भी उन्हें विरासत में मिली है.
लेकिन मुलायम सिंह और शिवपाल यादव दोनों किसान के बेटे हैं और संयुक्त परिवार के संस्कार उन्हें विरासत में मिले हैं.
मुलायम को पुत्र मोह ज़रूर होगा, पर उन्हें यह भी मालूम है कि अगर भाई शिवपाल खुलकर बाग़ी हो गए तो बेटे का नुक़सान हो जाएगा.
शिवपाल के मीडिया सलाहकार दीपक मिश्रा कहते हैं कि बड़े भाई का प्रेम शिवपाल की ताक़त भी है और कमज़ोरी भी.
1967 में शिवपाल जब मात्र बारह वर्ष के थे, बड़े भाई मुलायम उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य हो गए. यह वह दौर था, जब राजनीति का मतलब संघर्ष होता था. लाठी खाना, जेल जाना और विरोधियों की लाठी बंदूक़ का मुक़ाबला करना. मुलायम यह बात कहते भी हैं शिव पाल ने मेरे लिए कई बार जान को जोखिम में डाला.
मलखान सिंह, छविराम और फूलन देवी के इलाक़े में अपनी जगह बनाने के लिए राजनीतिक सिद्धांत और विचारधारा के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए होता था.
इसलिए शिवपाल के ज़िम्मे जसवंत नगर में पर्चे बाँटने और पोलिंग बूथ सम्भालने के अलावा भी बहुत से काम थे.
बचपन से राजनीति में सक्रिय शिवपाल ने स्नातक तक की पढ़ाई इटावा में की और उसके बाद लखनऊ से टीचर की ट्रेनिंग ली. मगर मास्टर बनने के बजाय वह भाई के राजनीतिक सहायक बने.
मुलायम सिंह 1977 में कैबिनेट मंत्री बन गए थे और उसके बाद से ही प्रदेश की राजनीति में ज़्यादा दिलचस्पी ले रहे थे इसलिए इटावा और आसपास संगठन का काम शिवपाल के ज़िम्मे था.
ज़मीनी स्तर पर सहकारिता आंदोलन ज़मीनी राजनीति की पहली सीढ़ी होती है.
शिवपाल इसी सीढ़ी पर चढ़कर आगे बढ़े. वह 1988 में ज़िला सहकारी बैंक और ज़िला पंचायत के अध्यक्ष और फिर 1994 में उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक के अध्यक्ष हुए.
इस तरह वह प्रदेश भर में ज़मीनी राजनीतिक कार्यकर्ताओं से जुड़े.
1996 के विधान सभा चुनाव में मुलायम ने उन्हें अपना जसवंत नगर विधान सभा क्षेत्र सौंप दिया.
इसके बाद वह मुलायम सरकार में सबसे मज़बूत मंत्री रहे. 2007 की पराजय के बाद वह विधान सभा में नेता विरोधी दल रहे.
इसके बाद अगर उनके मन में कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी का भी ख़्याल आया हो तो न यह नामुमकिन है और न ही अस्वाभाविक.
शिवपाल जैसे-जैसे राजनीति में आगे बढ़े, चचरे भाई राम गोपाल से उनकी कटुता बढ़ती गई. राम गोपाल, शिव पाल को दूसरे नम्बर पर बढ़ते नहीं देखना चाहते थे. शिव पाल को काटने के लिए उन्होंने अखिलेश का इस्तेमाल किया.
शिवपाल यादव ने बिहार विधान सभा चुनाव के समय जनता परिवार को एकजुट करने और मुलायम को उसका नेता बनाने के अभियान में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी ली थी.
उसके पीछे भी शायद यह भावना रही होगी की एक बड़े प्लेटफ़ॉर्म पर जहाँ तमाम दूसरे नेता होंगे, वह भतीजे अखिलेश को कंट्रोल कर सकेंगे.
अखिलेश और राम गोपाल ने शिव पाल का यह खेल ख़राब कर दिया.
कुछ महीने पहले मुलायम को लगा कि बेटा अब स्वतंत्र राजनीति करने जा रहा है और विशेषकर कांग्रेस से गठबंधन करके. तब मुलायम ने अखिलेश को हटाकर शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया.
मुलायम बेटे के ख़िलाफ़ भाई को हथियार बना रहे थे और वह बने.
जवाब में अखिलेश ने शिवपाल और उनके साथियों को मंत्रिमंडल के बाहर का रास्ता दिखा दिया.
मुलायम की लड़ाई लड़ते-लड़ते शिवपाल सरकार और संगठन दोनों से बाहर हो गए हैं. अब उनके पास खोने को कुछ नहीं बचा.
शिवपाल के मीडिया सलाहकार दीपक मिश्रा के अनुसार, वह मुलायम की लड़ाई लड़ रहे हैं और उन्हीं पर निर्भर है कि शिव पाल का अगला क़दम क्या होगा.
चर्चा है कि पुराने लोक दल और पुरानी सोशलिस्ट पार्टी के लोग शिव पाल से सम्पर्क कर रहे हैं. अगर शिवपाल किसी भी मंच से अपनी अलग राजनीति करते हैं तो वह अपना भला भले ना कर पाएँ, पर अखिलेश को कुछ न कुछ नुक़सान ज़रूर पहुँचाने की क्षमता रखते हैं.
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