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मुलायम सिंह यादव अब क्या करेंगे?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
लंबी जद्दोजहद के बाद समाजवादी पार्टी में आख़िरकार ये तय हो गया कि उसके असली नेता अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही हैं लेकिन मुलायम-शिवपाल का प्रतिद्वंद्वी खेमा उन्हें चैन से चुनाव लड़ने देगा या नहीं, इस पर संशय अभी भी बना हुआ है.
सोमवार को देर शाम चुनाव आयोग ने तो समाजवादी पार्टी के असली हक़दार के तौर पर अखिलेश के नाम पर मुहर लगा दी और पहले चरण के चुनाव के नामांकन के साथ ही चुनावी प्रक्रिया भी मंगलवार से शुरू हो रही है.
समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल के साथ होने वाले गठबंधन पर से भी एक-दो दिन में शायद पर्दा उठ जाए लेकिन मुलायम खेमा असली समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में उतरेगा या फिर कोई और रास्ता चुनेगा, अभी पता नहीं.
साइकिल चुनाव निशान की लड़ाई यूं तो परिवार के भीतर की लड़ाई थी लेकिन जब चुनाव आयोग ने इसका फ़ैसला अखिलेश के हक़ में सुनाया तो कार्यकर्ताओं ने इसका जश्न चुनावी जीत के रूप में मनाया. नारे लगाए गए, पटाखे छोड़े गए और एक दूसरे को मिठाइयां खिलाई गईं.
वहीं अखिलेश यादव भी इस जीत के बाद पहला आशीर्वाद लेने अपने पिता मुलायम सिंह के पास गए जो इस लड़ाई में उनके सीधे प्रतिद्वंद्वी थे.
लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित समाजवादी पार्टी के दफ़्तर के बाहर सोमवार को सुबह से ही गहमागहमी थी.
सुबह-सुबह मुलायम सिंह यादव अखिलेश की आलोचना काफी सख़्त भाषा में की थी जिसका परिणाम ये हुआ कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कमरे के बाहर लगी उनकी नेमप्लेट के नीचे अखिलेश के नाम की भी तख़्ती लगा दी गई. ये अलग बात है कि शाम तक इसे चुनाव आयोग ने भी अपनी स्वीकृति दे दी.
वहीं दिल्ली में इस जीत से खुश दिखे रामगोपाल यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन के भी कुछ सूत्र खोले लेकिन कांग्रेस पार्टी अभी भी 403 सीटों पर ही चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. कांग्रेस प्रवक्ता वीरेंद्र मदान कहते हैं कि प्रदेश की स्क्रीनिंग कमेटी ने सभी 403 सीटों पर 2 या तीन उम्मीदवारों की सूची सेंट्रल कमेटी को भेज दी है जिसकी मंगलवार को बैठक संभावित है. बैठक के बाद इसे अंतिम रूप दे दिया जाएगा.
लेकिन सवाल ये है कि चुनाव आयोग से लड़ाई हार चुका मुलायम खेमा अब क्या करेगा, और बिना मुलायम के होने वाले गठबंधन को इसका कितना फ़ायदा मिल सकेगा.
लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार श्रवण शुक्ल कहते हैं, "गठबंधन मुख्य रूप से मुस्लिम वोटों के लिए हो रहा है और मुसलमान आज भी मुलायम सिंह को ही नेता मानता है. मुलायम सिंह ख़ुद ही अखिलेश को मुसलमानों का विरोधी बता चुके हैं. दूसरे बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए वो कांग्रेस को आज तक माफ़ नहीं कर पाया है. ऐसे में बिना मुलायम के गठबंधन कोई फ़ायदा पाएगा, कहना मुश्किल है."
बहरहाल, गठबंधन होगा या नहीं, इसका फ़ैसला एक-दो दिन में हो जाएगा. लेकिन असली सवाल अभी यही है कि क्या अखाड़े के पहलवान और राजनीति के कुशल खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव बेटे के हाथों मिली हार को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे या फिर बेटे को पछाड़ने के लिए उनके पास अभी कोई और दांव है.