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मुल्ला-मौलवियों का 'सियासी फ़रमान' कोई सुनता है?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
भारतीय मुसलमानों की एक अहम संस्था दारुल उलूम देवबंद के प्रमुख मुफ़्ती अबुल क़ासिम नोमानी ने चुनाव के दौरान संस्था के अंदर सियासी नेताओं से मुलाक़ात न करने का फैसला किया है. उनका कहना है कि दारुल उलूम एक मज़हबी और शैक्षिक संस्था है जिसका सियासत से कोई लेना-देना नहीं.
देवबंद ने अब तक खुल कर चुनाव में किसी का पक्ष नहीं लिया है. लेकिन कई मुस्लिम उलेमा और धर्म गुरु अक्सर उन उम्मीदवारों और पार्टियों का समर्थन करते आए हैं जो उनके मुताबिक़ मुस्लिम समुदाय के लिए काम करने को तैयार नज़र आता है.
लेकिन मुस्लिम वोटर पर मुस्लिम संस्थाओं और धार्मिक गुरुओं का कितना असर होता है?
दारुल उलूम देवबंद के मुफ़्ती अबुल क़ासिम नोमानी के अपनी संस्था में 11 मार्च तक यानी पांच राज्यों में चुनाव ख़त्म होने तक सियासी नेताओं से न मिलने के फैसले को आम तौर से सराहा जा रहा है.
पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब कहते हैं कि वे इस फ़ैसले का स्वागत करते हैं. उन्होंने कहा, "ये बयान बहुत समझदारी का बयान है. हमारी समस्याएं धार्मिक नहीं आर्थिक हैं. उलेमा को इससे दूर रहना चाहिए."
मोहम्मद अदीब कहते हैं कि चुनाव के अवसर पर नेता अक्सर मुस्लिम धर्म गुरुओं से मिलते हैं जिनमें से अक्सर बेअसर मौलवी होते हैं. "बहुत से सियासी मौलवी खड़े हो गए हैं जो चुनाव में अपनी क़ीमत लगवाते हैं और बहुत कम दाम पर वो मुसलमानों के वोटों को बाँट देते हैं."
लेकिन क्या धर्म गुरुओं और संस्थाओं की अपील का मुसलिम वोटर पर असर होता है? वरिष्ठ पत्रकार क़ुरबान अली कहते हैं कि नहीं.
उन्होंने कहा, "मैं पिछले 30 सालों से अधिक अरसे से पत्रकारिता कर रहा हूँ और कभी भी मैंने इस चीज़ को महसूस नहीं किया कि किसी धार्मिक संस्था की अपील का मुसलमानों पर असर होता है. कुछ सीटों को छोड़ दीजिए तो मुसलमान उसी तरह से वोट डालता है जिस तरह से दूसरे समुदाय के लोग करते हैं."
क़ुरबान अली कहते हैं कि मुस्लिम संस्थाओं और धर्म गुरुओं को चुनाव के दौरान इस्तेमाल करने का रिवाज केवल उत्तर भारत में है. उनके अनुसार दक्षिण भारत में ये रिवाज नहीं है. केरल में मुस्लिम आबादी 26 प्रतिशत है. लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम लीग जैसी सियासी पार्टी भी धर्म गुरुओं के पास नहीं जाती.
लेकिन उर्दू पत्रकार मासूम मुरादाबादी कहते हैं कि दारुल उलूम का ये फैसला ग़ैर ज़रूरी है. इस संस्था का चुनाव से कोई मतलब नहीं होना चाहिए. उनके अनुसार चुनाव के दौरान मुस्लिम समुदाय पर मुस्लिम संस्थाओं और मौलवियों का काफी हद तक असर होता है.
"असर तो होता है. कम से कम 50 प्रतिशत लोगों पर होता है. मुसलमानों का बहुमत उलेमा और मज़हबी नेताओं से काफी प्रभावित होता है."
लेकिन मासूम मुरादाबादी भी ये स्वीकार करते हैं कि मुस्लिम समुदाय एकजुट होकर एक राजनीतिक पार्टी को वोट नहीं देता. उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस पार्टी के बीच बंट जाता है.
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