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सिद्धू कांग्रेस के लिए चुनावी पिच पर चौके-छक्के लगा पाएँगे ?
- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ने वाले नवजोत सिंह सिद्धू अमृतसर में अमरिंदर सिंह के साथ चुनाव प्रचार शुरू करेंगे और तब सिद्धू के विरोधी उन्हें अपना पुराना बयान याद ज़रूर दिलाएँगे जब सिद्धू ने कहा था- "कांग्रेस तो मुन्नी से ज़्यादा बदनाम है, अब तो मुन्नी भी इन पर शर्मिंदा हो रही है."
एक ज़माना था जब नवजोत सिंह सिद्धू की सिद्धूवाणी में निशाने पर अक्सर कांग्रेस और 'राहुल बाबा' रहा करते थे.
वहीं नरेंद्र मोदी के लिए कभी सिद्धू ने कहा था, "कोई तिनका बहता-बहता नर्मदा माई में, किसी शिवलिंग पर टिक जाए तो कैसा महसूस करेगा. ठीक वैसा नवजोत सिंह सिद्धू नरेंद्र भाई मोदी की संगत में आकर महसूस कर रहा है."
पिछले साल भारतीय जनता पार्टी छोड़ने के बाद से ही उनके आम आदमी पार्टी और फिर बाद में कांग्रेस में शामिल होने के कयास लगते रहे. आलोचकों ने कहा कि सिद्धू न तो घर के रहेंगे न घाट के और उनके पास कोई रास्ता नहीं बचेगा.
हर बात पर 'ठोको ताली' कहने वाले सिद्धू इस बीच ख़ामोश रहे मानो मन ही मन अपना फ़ेवरेट जुमला दोहरा रहे हों -
"दरिया हैं हम हमें अपना हुनर मालूम है,
गुज़रेंगे जिधर से रस्ता हो जाएगा".
सिद्धू चुनाव प्रचार में तब उतरे हैं जब पंजाब विधानसभा चुनाव में क़रीब 15 ही दिन बाक़ी हैं. ऐसे में उनके सामने क्या चुनौतियाँ होंगी?
वरिष्ठ पत्रकार विपिन पब्बी कहते हैं, "समय रहता तो सिद्धू पूरे पंजाब में प्रचार करते. कांग्रेस ने तो सोचा होगा कि वे धुँआधार प्रचार करेंगे. लेकिन अब लगता है कि वो अमृतसर और कुछ चुनिंदा इलाक़ों में ही प्रचार कर पाएंगे. प्रचार के लिए ये बहुत कम समय है."
अब जब सिद्धू ने कांग्रेस की ओर से पंजाब के चुनावी दंगल में चुनौती मोल ले ही ली है तो उनका सामना कई तरह के प्रतिद्वदियों से होगा.
एक तरफ़ सुखबीर बादल जैसे मंझे हुए खिलाड़ी हैं जो राजनीति का खेल बखूबी समझते हैं, वहीं आम आदमी पार्टी की ओर से भगवंत मान जैसे नेता हैं जिनके पास अपने चुटीले अंदाज़ से जनता से जुड़ने का हुनर है.
सिद्धू की ख़ूबियों और ख़ामियों पर पत्रकार विपिन पब्बी कहते हैं, "पंजाब में सिद्धू जाना-माना नाम है. उनकी हाज़िरजवाबी ग़ज़ब की है. अपनी वन लाइनर से वो जवाब देना ख़ूब जानते हैं."
"लेकिन उन्हें राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी नहीं कहा जा सकता. टीवी पर तो वो ख़ूब बोलते हैं, लेकिन सांसद रहते हुए उनकी छवि ऐसी नहीं रही कि वो सियासी मुद्दों को खुलकर उठाते थे."
कभी क्रिकेट के मैदान पर 'सिक्सर सिद्धू' कहे जाने वाले सिद्धू क़रीब 13 साल से राजनीति में है. सिद्धू के पिता सरदार भगवंत सिंह सिद्धू पटियाला में ज़िला कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे.
सिद्धू की राजनीति में उन अलग-अलग तजुर्बों का रस और मेल है जो उन्होंने बतौर क्रिकेटर, कमेंटेटर और टीवी एंटरटेनर हासिल किए हैं.
क्रिकेट की बात करें तो अपने करियर के शुरुआती दौर में उन्हें अपने खेल के लिए काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी. एक अख़बार के आर्टिकल में तब हेडलाइन छपी थी- "सिद्धू : द स्ट्रोकलेस वंडर". लेकिन 1987 के वर्ल्ड कप में उन्होंने ज़बरदस्त प्रदर्शन किया था.
तब उसी पत्रकार ने जिसने सिद्धू के खेल की धज्जियाँ उड़ाते हुए स्टोरी की थी, उन्होंने अपने आर्टिकल में लिखा था- "सिद्धू फ़्रॉम स्ट्रोकलेस वंडर टू पाम-ग्रोव हिटर".
टीवी पर क्रिकेट कमेंट्री के दौरान वे अपने जुमलों के लिए मशहूर रहे हैं जो किसी को 'अजब' लगे तो किसी को 'ग़ज़ब'.
साथ ही टीवी कॉमेडी शो पर 'गुरु हो जाओ शुरु' और 'ठोको ताली' वाले उनके अंदाज़ पर कुछ लोग हँसे तो कुछ चिढ़े भी. इन सब पैंतरों को वो राजनीति में भी आज़माते रहे हैं.
पिछले साल भाजपा छोड़कर पहले आम आदमी पार्टी के 'क़रीब' जाना, फिर अपनी नई संस्था बनाई जो क़ामयाब नहीं हो सकी. फिर लंबे सस्पेंस के बाद दल बदलकर सिद्धू उसी कांग्रेस में शामिल हो गए जिसकी वो हमेशा आलोचना करते रहे हैं.
पंजाब की राजनीति पर नज़र रखने वाले पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं, "जो कुछ हुआ उससे सिद्धू ने अपनी छवि को नुकसान पहुँचाया है. 2014 में सिद्धू ने अपनी लोकसभा सीट अरुण जेटली को दिए जाने के बाद दूसरी सीट से चुनाव न लड़ने का फ़ैसला किया था. लेकिन इस बार वो समय रहते फ़ैसला ही नहीं कर पाए."
वो कहते हैं, "अब उनकी पहले जैसी छवि नहीं रही. लोग उनको मौक़ापरस्त कहेंगे."
जगतार सिंह कहते हैं कि अकाली दल और कांग्रेस दोनों के अपने वफ़ादार वोटर हैं. लेकिन असली चुनौती उन वोटरों को लुभाने की है जिन्होंने अभी अपना मन नहीं बनाया है या जो आप को वोट दे सकते हैं और ऐसे वोटरों को अगर सिद्धू खींच पाए तो उनकी वाहवाही होगी.
सिद्धू के आलोचक और पुराने राजनीतिक साथी बेशक़ उन्हें उनके भाजपा वाले अतीत के लिए घेरेंगे और सवाल पूछेंगे जिसका जवाब भी शायद सिद्धू अपने एक फ़ेवरेट जुमले से ही देना पसंद करेंगे-
"अतीत ख़ुद जवाब है, उसपर सवाल नहीं होते,
मिट्टी में डूबे बिना ग़ुलाब नहीं होते"
या फिर सिद्धू अपने आलाचकों के लिए वो जुमला इस्तेमाल करें जो टीवी कमेंटरी के दौरान अक्सर उन क्रिकेटरों के बारे में कहते हैं जो मुश्किल हालात में बेहतर पारी खेलकर जाते हैं.
"पान के चबाने से,
दही के मथने से,
सोने को तपाकर पीटने से उसके गुण बढ़ते हैं".
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